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दान दें तो प्रसन्नता के साथ – आचार्य श्री 108 सुबल सागर जी महाराज…

चडीगढ़ दिगम्बर जैन मंदिर सेक्टर-27B में चातुर्मास कर रहे परम पूज्य गुरुदेव श्री सुबलसागर जी महाराज ने धर्म सभा को उपदेश देते हुआ कहा कि हे प्रियात्माओं ! श्रावक धर्म में श्रावक के लिए 6 आवश्यक कर्तव्य बताये हैं- देव पूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, दान, तप । और आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी महाराज ने कहा कि अगर श्रावक यह भी नहीं कर पायें तो विशेष रूप से 2 कर्तव्यों को कह दिया, इन दो कर्तव्यों में ही 6 कर्तव्यों की पूर्णिता हो जाती है। वह है मुख्य रूप से दान और पूजा।

आगे कहते है श्रावक किसे कहते है तो हमारे आगम ग्रंथों में श्रद्धावान, विवेकवान, क्रियावान इनको श्रावक की उपमा दी गई। अर्थात् अपने कार्यों को करते यह ध्यान रखना कि जो में कर रहा हूँ वह मेरे कल्याण के लिए है या अकल्याण के लिए है।

दान देना पहला कर्तव्य बताया गया हैं, दान किसे देना। सत् पात्रों को दान देने का उपदेश दिया, सुपात्रों में गुरु-निर्ग्रन्थ है जो वे उत्तम पात्र कहे गए है। दान देने के साथ वचनों की मधुरता आवश्यक है। प्रिय वचनों से ही मन की प्रसन्नता समझ में आती है। दान देने वाला यदि खुश होकर दान देता है तो लेने वाले को भी आनंद आता है और उसे दान बोझ नहीं लगता है। वस्तुत: देने वाले को इस बात की खुशी होना चाहिए कि चलो अच्छा अवसर आया, जो आज मेरा बोझ मेरे मन का भार हल्का हो गया। भार हल्का होने में तो आनंद आता ही है। यदि बेमन से दान दिया जाता है तो उससे लेने वाले को भी प्रसन्नता नहीं होती और “वह उस को भार महसूस करता है। भिखारी भी अनादर से नहीं लेता, और यदि माँ क्रोध में होती है तो बच्चा भी माँ का दूध नहीं पीता।

आहार दान, शास्त्र दान, उभयदान और औषधी दान। यह 4 प्रकार के दान देने का वर्णन आगम ग्रंथों में आया है। दान की महिमा को समझाते हुए एक कहानी है कि एक मुनिराज वन भ्रमण करते हुए एक गुफा में बैठ गए ध्यान करने लिए, वह गुफा शेर की थी, मुनिराज को पता नहीं था, वहाँ पर ही एक सूअर भी रहता था उसने देखा कि गुफा तो शेर की है, अभी शेर आयेगा, तो मुनिराज को रखा जाएगा इसलिए वह सूअर मुनि रक्षा करने के लिए गुफा के बाहर ही ठहर जाता है मुनिराज को तो कुछ भी नही पता वह तो अपने ध्यान में एकाग्रित । साँझ होते समय शेर आता है और गुफा की तरफ जाता है तो सुअर उसे रोकता है दोनों के बीच बहुत भयानक युद्ध होता है उस युद्ध में दोनों ही मरण को प्राप्त हो जाते है लेकिन सुअर मरकर देवगति को प्राप्त होता है क्योंकि उसके भाव मुनिराज की रक्षा के थे और शेर भी मरण को प्राप्त होकर नरक गति को प्राप्त होता है क्योंकि वह मुनिराज को खाना चाहता था इससे वह दुर्गति को प्राप्त होता है। तिर्यंच गति का जीव भी मुनिराज की रक्षा कर उभयदान देकर देवगति को पाता है। यह दान की महिमा है यह जानकारी संघस्थ बाल ब्र. गुंजा दीदी एवं धर्म बहादुर जैन जी ने दी।