10 अरब डॉलर की उत्प्रेरक पूंजी (कैटेलिटिक कैपिटल) भारत के जलवायु लक्ष्यों के लिए 500 अरब डॉलर जुटाने में मदद कर सकती है: सीईईडब्ल्यू-टाटा संस रिपोर्ट….
भारत के जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने के लिए 2030 तक कम कार्बन उत्सर्जन वाली 20 तकनीकों में 500 अरब डॉलर के निवेश की जरूरत होगी। लेकिन ब्लेंडेड फाइनेंस को एक बुनियादी साधन के रूप में इस्तेमाल करके इसमें आगे बढ़ने की शुरुआत की जा सकती है। यह रिपोर्ट बताती है कि अगर इससे बहुत कम राशि, यानी 500 अरब डॉलर का 10 प्रतिशत या 50 अरब डॉलर ब्लेंडेड फाइनेंस के रूप में जुटा लिया जाए तो एक ट्रैक रिकॉर्ड तैयार हो सकता है, जिससे शेष राशि बगैर किसी सहायता से जुटाने में मदद मिल सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ये 50 अरब डॉलर सिर्फ 10 अरब डॉलर की उत्प्रेरक पूंजी से जुटाए जा सकते हैं। इसका अर्थ है कि उत्प्रेरक पूंजी का प्रत्येक डॉलर ब्लेंडेड फाइनेंस के रूप में पांच डॉलर जुटाता है, यानी इसका सांकेतिक लीवरेज मल्टीपल 5 गुना है। इसमें उत्प्रेरक पूंजी के एक डॉलर के साथ बाजार की शर्तों पर वित्त उपलब्ध कराने वाली वाणिज्यिक पूंजी के चार डॉलर जुड़ते हैं। यह सभी जानकारियां आज मंगलवार को ‘काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर’ (सीईईडब्ल्यू) के ग्रीन फाइनेंस सेंटर (CEEW-GFC) और टाटा संस की ओर से संयुक्त रूप से जारी रिपोर्ट “ब्लेंडेड फाइनेंस फॉर इंडियाज क्लाइमेट गोल्स” से सामने आई है।
सीईईडब्ल्यू-टाटा संस की यह रिपोर्ट अपनी तरह का पहला अध्ययन है हो जो बताता है कि देश के ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 70 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले बिजली, उद्योग और परिवहन क्षेत्रों के डीकार्बनाइजेशन के 2030 के लक्ष्यों को पाने में ब्लेंडेड फाइनेंस कितनी मदद कर सकता है। भारत को 2030 तक इन क्षेत्रों के लिए कम कार्बन उत्सर्जन वाली 20 तकनीकों में 500 अरब डॉलर के जलवायु निवेश करने की जरूरत है। इसमें बिजली और अक्षय ऊर्जा में 198 अरब डॉलर (कुल निवेश का 39.6 प्रतिशत), ग्रीन हाइड्रोजन में 115 अरब डॉलर (23 प्रतिशत), और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में 187 अरब डॉलर (37.4 प्रतिशत) निवेश करने की जरूरत होगी।
किसी स्वच्छ तकनीक को कितनी उत्प्रेरक पूंजी की जरूरत होती है, यह उसकी तकनीकी-आर्थिक परिपक्वता (techno-economic maturity) और ट्रैक रिकॉर्ड पर निर्भर करता है। सीईईडब्ल्यू-टाटा संस रिपोर्ट ने एक ‘लीवरेज मल्टीपल’, यानी उत्प्रेरक पूंजी के प्रत्येक डॉलर पर जुटाए जाने वाले कुल निवेश, का पता लगाया है। उदाहरण के लिए, सौर ऊर्जा के लिए यह लीवरेज मल्टीपल 35 गुना है, क्योंकि सौर ऊर्जा एक परिपक्व तकनीक है, जिसे मुख्य रूप से क्रेडिट एन्हांसमेंट गारंटी की जरूरत होती है। वहीं, ग्रीन हाइड्रोजन के लिए लीवरेज मल्टीपल सिर्फ 2 गुना है, क्योंकि ग्रीन हाइड्रोजन अभी शुरुआती अवस्था की तकनीक है, जिसे इक्विटी के रूप में अधिक सहायता की जरूरत है। क्षेत्रवार देखें तो 2030 तक बिजली और अक्षय ऊर्जा को 1.5 अरब डॉलर, ग्रीन हाइड्रोजन को 5.9 अरब डॉलर और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को 2.7 अरब डॉलर उत्प्रेरक पूंजी की जरूरत है। स्वाभाविक है कि अधिक परिपक्व क्षेत्रों को अधिक वाणिज्यिक पूंजी जुटाने के लिए कम उत्प्रेरक पूंजी की जरूरत होती है, इसलिए कम परिपक्व क्षेत्रों की तुलना में उनका लीवरेज मल्टीपल अधिक होता है।
*एन. चंद्रशेखरन, चेयरमैन, टाटा संस*, ने कहा, “भारत की विकास यात्रा की मांग है कि हम औद्योगीकरण, शहरीकरण और समृद्धि के विस्तार को जारी रखते हुए डीकार्बनाइजेशन के रास्ते पर भी आगे बढ़ें। ये दोनों जरूरतें हमारी ऊर्जा प्रणालियों, उद्योगों और परिवहन नेटवर्क के सामने असाधारण मांग पैदा करती हैं। 2030 की अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए इन क्षेत्रों में आधे ट्रिलियन डॉलर से अधिक के निवेश की जरूरत होगी। सिर्फ पारंपरिक वित्त इसके लिए पर्याप्त नहीं होगा, इसलिए भारत को ऐसी पूंजी की जरूरत है, जो शुरुआती जोखिम उठाने को तैयार हो, धैर्य रख सके और दीर्घकालिक बड़े लाभों के लिए निकट भविष्य में कम लाभों को स्वीकार करे। यहीं पर ब्लेंडेड फाइनेंस की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। उपयुक्त वित्तीय ढांचे और प्रोत्साहनों वाला भारत का क्लाइमेट ट्रांजिशन इनोवेशन, प्रतिस्पर्धा, ऊर्जा सुरक्षा और सतत आजीविका का एक मजबूत इंजन बन सकता है।”
*गगन सिद्धू, डायरेक्टर, सीईईडब्ल्यू ग्रीन फाइनेंस सेंटर*, ने कहा, “भारत का क्लाइमेट ट्रांजिशन वित्तीय प्रणाली के लिए एक स्ट्रेस टेस्ट जैसा है। सवाल है कि क्या यह प्रणाली इतनी तेजी से बदल सकती है कि आगे खड़ी चुनौती के विस्तार और तात्कालिकता का सामना कर सके? कम कार्बन उत्सर्जन वाली तकनीकों की परिपक्वता अलग-अलग अवस्थाओं में है, और प्रत्येक तकनीक की वित्तीय जरूरतें भी अलग-अलग हैं। चूंकि पारंपरिक वित्तीय ढांचा इतने जटिल बदलावों के लिए नहीं बनाया गया था, इसलिए यहीं पर ब्लेंडेड फाइनेंस एक पुल का काम कर सकता है। हमने पाया है कि 2030 तक भारत के आधे ट्रिलियन डॉलर के वित्तीय अवसरों में से ब्लेंडेड फाइनेंस के उपायों को सिर्फ 10 प्रतिशत हिस्से पर ध्यान देने की जरूरत है। सिर्फ 10 अरब डॉलर की उत्प्रेरक पूंजी से ये 50 अरब डॉलर जुटाए जा सकते हैं, जिससे बाकी रकम बिना किसी अतिरिक्त मदद के जुटाने का रास्ता खुल जाएगा। अब जरूरत एक ऐसे संस्थागत ढांचे की है, जो इस उत्प्रेरक पूंजी को सटीक तरीके से जमीन पर उतार सके। एक नेशनल ग्रीन फाइनेंस इंस्टीट्यूशन (National Green Finance Institution) भारत की जलवायु महत्वाकांक्षाओं और वित्तीय प्रणाली को जोड़ने वाली कड़ी बन सकता है।”
2010 से 2022 के बीच भारत में 5.6 अरब डॉलर के ब्लेंडेड फाइनेंस के लेन-देन दर्ज किए गए। यह वैश्विक बाजार का 3.4 प्रतिशत था, जिसमें उत्प्रेरक पूंजी सिर्फ 17 प्रतिशत थी। कम कार्बन उत्सर्जन वाली तकनीकों के लिए ब्लेंडेड फाइनेंस का उपयोग बढ़ाने के लिए इस रिपोर्ट में एक नेशनल ग्रीन फाइनेंस इंस्टीट्यूशन बनाने का प्रस्ताव दिया गया है, जैसा कि नीति आयोग ने सिफारिश की थी। यह संस्था सरकारों, दानकर्ता संस्थाओं और विकास हितधारकों से उत्प्रेरक पूंजी को जुटाएगी और उसे ब्लेंडेड फाइनेंस ढांचों के जरिए वितरित करेगी। भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं को देखते हुए, रिपोर्ट देश के भीतर विकल्प तलाशने और घरेलू दानकर्ता संस्थाओं की उत्प्रेरक पूंजी का इस्तेमाल करने का भी प्रस्ताव देती है, ताकि वाणिज्यिक पूंजी को अधिक प्रभावी ढंग से आकर्षित किया जा सके। साथ में, रिपोर्ट में इसके लिए अनुकूल नीतिगत/नियामकीय वातावरण बनाने की भी अपील की गई है।
Amlan Bibhudatta, Gagan Sidhu, Arjun Dutt और Labanya Prakash Jena (सीईईडब्ल्यू टीम) व Roopa Purushothaman, Vishal Vaibhaw और Kartikey Vaid (टाटा संस टीम) की रिपोर्ट Blended Finance for India’s Climate Goals पढ़ने के लिए यहां पर क्लिक करें- https://www.ceew.in/gfc/publications/Blended-Finance-for-India


