अष्टान्हिका पर्व के अवसर पर सिद्धचक्र महामण्डल विधान एवं शांति महायज्ञ की स्थापना….
कल से श्री दिगम्बर जैन मंदिर सेक्टर 27 बी, चंडीगढ़ में सिद्धचक्र महामण्डल विधान की स्थापना की जा रही है। यह विधान 21 july से आरम्भ होकर 29 july तक चलेगा जिसमे की 100 से अधिक दम्पति भाग लेंगे। ब्रह्मचारिणी आशा दीदी इस कार्यक्रम का निर्देशन करेंगी। सभी आठ दिनों में पूजा प्रातः 6.30 बजे से आरम्भ होकर 12 बजे तक चलेगी। कल प्रातः अभिषेक शांतिधारा ध्वजारोहण एवं घट यात्रा से कार्यक्रम का आरम्भः किया जायेगा। इन पुरे आठ दिन सभी सम्मिलित दम्पति केवल एक समय शुद्ध सात्विक भोजन ही लेते है, व् पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। सात्विक भोजन की व्यवस्था मंदिर जी परिसर में ही की गयी है।
जैन धर्म में अष्टान्हिका पर्व वर्ष के सर्वाधिक पवित्र एवं आध्यात्मिक पर्वों में से एक है। यह पर्व वर्ष में तीन बार—आषाढ़, कार्तिक एवं फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक—आठ दिनों तक मनाया जाता है। इन आठ दिनों का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि इन दिनों विशेष पूजा-अर्चना की जाती है, बल्कि इसलिए भी कि जैन आगमों के अनुसार यही वह समय है जब स्वर्ग के देवगण नन्दीश्वर द्वीप में स्थित जिनालयों में जाकर चौबीस तीर्थंकरों की भक्ति एवं महापूजा करते हैं। पृथ्वी पर रहने वाले श्रद्धालु उसी दिव्य आराधना का भावपूर्वक अनुसरण करते हैं।
जैन ब्रह्माण्ड विज्ञान (लोक-विज्ञान) के अनुसार सम्पूर्ण लोक (Universe) अनेक द्वीपों और समुद्रों से निर्मित है। इनमें मध्यलोक में स्थित अनेक द्वीपों में से एक अत्यंत पवित्र द्वीप नन्दीश्वर द्वीप है। यह कोई सामान्य भौगोलिक स्थान नहीं है, बल्कि एक दैवी एवं दिव्य क्षेत्र है जहाँ मनुष्य नहीं पहुँच सकते। वहाँ केवल देवगण ही जाकर भगवान जिनेन्द्र की पूजा-अर्चना कर सकते हैं।
जैन शास्त्रों के अनुसार नन्दीश्वर द्वीप पर बावन (52) जिनालय स्थित हैं। इन जिनालयों में अनादि काल से तीर्थंकर भगवानों की प्रतिमाएँ विराजमान हैं। देवगण वहाँ दिव्य पुष्पों, सुगंधित द्रव्यों, संगीत और नृत्य के साथ जिनेन्द्र भगवान की महापूजा करते हैं। इस कारण नन्दीश्वर द्वीप को शाश्वत पूजा का केन्द्र माना गया है।
जैन दर्शन में इस पूजा का उद्देश्य भगवान से कुछ माँगना नहीं है। उनकी पूजा उनके गुणों को अपने जीवन में धारण करने की प्रेरणा प्राप्त करने के लिए की जाती है।
अष्टान्हिका पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि देवों की पूजा-परम्परा में सहभागी बनने का आध्यात्मिक अवसर है।
अष्टान्हिका पर्व में क्या क्या पालन किया जाता है :
इन आठ दिनों में श्रद्धालु विशेष रूप से—प्रातःकाल अभिषेक एवं शांतिधारा करते हैं।नन्दीश्वर पूजा एवं अष्टद्रव्य पूजा करते हैं।नवकार मंत्र का अधिकाधिक जाप करते हैं।सामायिक, स्वाध्याय एवं ध्यान में समय व्यतीत करते हैं।उपवास, एकासन, आयम्बिल जैसे तप करते हैं।दया, क्षमा, विनय एवं संयम का अभ्यास करते हैं।क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों को कम करने का प्रयास करते हैं।जिनवाणी का अध्ययन एवं प्रवचन श्रवण करते हैं।
अष्टान्हिका पर्व जैन धर्म में भक्ति, तप, संयम और आत्मजागरण का अद्वितीय पर्व है। नन्दीश्वर द्वीप दिव्य जिनभक्ति का शाश्वत प्रतीक है, जहाँ देवगण भगवान जिनेन्द्र की पूजा करते हैं। पृथ्वी पर मनुष्य उसी दिव्य भावना का अनुसरण करते हुए इन आठ दिनों में विशेष आराधना करते हैं। इस प्रकार अष्टान्हिका पर्व हमें बाहरी उत्सव से अधिक आंतरिक परिवर्तन, आत्मशुद्धि और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा प्रदान करता है।
कार्यक्रम के बारे में श्री धर्म बहादुर जैन अध्यक्ष श्री दिगम्बर जैन सोसाइटी ने बताया कि जैन आगम के अनुसार अष्टान्हिका क आठ दिन भक्ति एवं आतम शुद्धि करने के लिए सबसे पवित्र दिन होते हैं, पुरे आठ दिन प्रातः कालीन पूजाएं एवं रात्रि में महा आरती, धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जायेगा।


