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सात समन्दर की मसि करूँ, लेखन सब वन राय। सब धरती कागज़ करूँ, गुरु गुण लिखा ना जाए॥…

ऐसा व्यक्तित्व जिनके विषय में अगर लिखना चाहें तो लेखन कला गौण हो जाती है और बोलना चाहें तो जिह्वा मौन हो जाती है। ऐसे परम वीतरागी, निस्पृही, जन-जन की आस्था व श्रद्धा के केन्द्र, आत्मान्वेषी सन्त के व्यक्तित्व का गुणगान कर पाना सामान्य जनमानस के वश की बात नहीं हैं। साक्षात् देवगुरु बृहस्पति सम प्रज्ञा वाले विज्ञ पुरुष भी गुरु गुणों को लिखने में किञ्चित् समर्थ हो पाते हैं किन्तु फिर भी भक्तिवश गुरु चरणों में विनयाञ्जलि समर्पित करने का एक तुच्छ प्रयास मुझ अकिञ्चित् द्वारा भी किया जा रहा है, इसे मेरी धृष्टता ही समझिये।
10 अक्टूबर 1946, शरद पूर्णिमा की उस उज्ज्वल रात्रि को और अधिक दैदीप्यमान करने एक चन्द्र सम तेजस्वी बालक कर्नाटक के सदलगा ग्राम में माँ श्रीमती की कुक्षी से, पिता मल्लप्पा जी के आंगन में अवतरित हुआ।

विद्याधर नाम को सार्थक करते हुए यह बालचन्द्र समस्त विद्याओं को सहज ही आत्मसात कर लेते थे। चार भाइयों और दो बहनों में दूसरे नंबर के बालक विद्याधर अद्भुत प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने स्वयं के कल्याण के साथ-साथ अपने कुटुम्ब को भी मोक्षमार्ग पर चलाया। पिता मल्लप्पा जी ने मुनि श्री मल्लिसागर जी के रूप में और माँ श्रीमती ने आर्यिका समयमति माता जी के रूप में जिन शासन को स्वीकार किया। बहन शान्ता और सुवर्णा ने भी ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर जिनपथ पर कदम बढ़ाया। दोनों अनुज भ्राता शान्तिनाथ और अनन्तनाथ ने भी इन्हीं से दीक्षित होकर मुनि श्री समयसागर जी और मुनि श्री योगसागर जी के रूप में स्व-पर कल्याण में जीवन को लगाया।

आचार्य श्री ज्ञानसागर महाराज जी के प्रथम दर्शन करने के पश्चात् ही आजीवन वाहन का त्याग, अत्यल्प वय में नमक-मीठे का आजीवन त्याग उनके अत्यन्त निस्पृही होने के अप्रतिम उदाहरण हैं। 30 जून 1968, ज्येष्ठ मास की तप्त दोपहरी में ज्यों ही गुरुदेव ने जैनेश्वरी दीक्षा विधि के चलते अपने वस्त्रों का त्याग किया त्यों ही नभ से सघन मेघ वर्षा ने जन-जन को विश्रान्ति प्रदान की। उनकी योग्यता को देखकर गुरुणांगुरु आचार्य श्री ज्ञानसागर जी ने स्वयं आचार्य पद का त्याग कर, इन्हें आचार्यत्व प्रदान कर समाधि मरण किया।
अद्भुत प्रतिभा के धनी आचार्य श्री विद्यासागर जी गुरुदेव के जीवन में वाणी की प्रामाणिकता, साहित्य की सृजनात्मकता और प्रकृति की सरलता रूपी त्रिवेणी प्रवाहित होती थी फलस्वरूप आप संस्कृत-प्राकृत सहित आठ भाषाओं में विशेष स्तर का ज्ञान रखते थे। उन्होंने हिन्दी-संस्कृत भाषा में विशाल मात्रा में रचनाएँ की हैं। निरञ्जन शतक, भावना शतक, परिषहजय शतक, सुनीति शतक, श्रमण शतक आदि इनकी विशेष रचनाएँ है। उनके मूकमाटी महाकाव्य को विभिन्न संस्थाओं में स्नातकोत्तर के हिन्दी पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता है। विभिन्न शोधार्थियों ने उनके कार्य का मास्टर्स और डॉक्ट्रेट के लिए अध्ययन किया है।
सर्वाधिक दीक्षा प्रदाता गुरुदेव ने 350 से अधिक दीक्षाएँ अपने जीवन काल में प्रदान कर श्रमण संस्कृति को उपकृत किया है। अनेकों गौशालाएँ बनवाकर गौ संरक्षण करना, प्रतिभा स्थली में प्रतिभाओं का विकास, हथकरघा विकास, भव्यतम जिनालयों का निर्माण आदि अनेकानेक कार्य गुरुदेव ने बिना किसी नाम और पद की आकांक्षा से किए। कुण्डलपुर के बड़े बाबा का गगन विहार करा कर अद्भुत कीर्तिमान गुरुदेव ने प्रस्तुत किया है।
आध्यात्मिक क्षेत्र के साथ-साथ गुरुदेव लोक सेवा के बहुत से कार्य अपने जीवन में किए। उनका कहना था कि युवा पीढ़ी को लौकिक शिक्षा के साथ सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा भी दी जाए जिससे उनमें जीवन निर्माण के साथ-साथ राष्ट्र उत्थान की भावना भी प्रबल हो।
भाषा समिति को पूर्णतया पालन करने वाले गुरुदेव ने अपने आचरण से यही सीख दी- विचारों, शब्दों और कर्मों की पवित्रता भी कितनी महत्त्वपूर्ण होती है। असीमित वात्सल्य के धनी गुरुदेव की करुणा कारागृह में रह रहे सजा प्राप्त कैदियों के ऊपर भी बराबर बरसी। हथकरघा का प्रशिक्षण दिलवाकर उनके जीवन को भी गुरुदेव ने नई दिशा प्रदान की है। सिर्फ़ जैनों के सन्त न होकर वो जन-जन के सन्त है। विभिन पन्थ, समुदाय के लोगों को समय-समय पर उनका दिशा निर्देशन प्राप्त होता रहा है। जीवन के अन्तिम क्षणों में भी ऐसी निस्पृहता का उदाहरण उन ‘जीवन्त समयसार’ ने प्रस्तुत किया कि सब उनकी दूरदर्शिता को देखकर ठगे से रह गए। गुरुदेव की सल्लेखना के समाचार से अव्यवस्था ना फैले और भक्तजन व्याकुल न हो, इस बात को ध्यान में रखकर गुरुदेव ने अपनी सल्लेखना की सूचना और निर्यापक श्रमण मुनि श्री समयसागर जी को आचार्य पद प्रदान करने की घोषणा भी अपने देह विसर्जन के पश्चात् करने के संकेत दिए। माघ शुक्ल दशमी प्रातः 2:35 पर ये निर्मोही सन्त 3 दिन की सल्लेखना पूर्वक 18 फरवरी 2024 को अत्यन्त शान्त परिणामों के साथ चन्द्रगिरि डोंगरगढ़ की पावन धरा पर सल्लेखना समाधि पूर्वक नश्वर शरीर को त्याग कर पञ्चतत्त्वों में विलीन हो गए।
वास्तविकता में जो हमने ग्रन्थों में पढ़ा था वैसी ही चर्या पञ्चम काल में आचार्य श्री विद्यासागर जी ने अपने जीवन में उतार कर सभी मोक्षमार्गीयों को बताया है कि काल की विकलता हमें तप-साधना और निर्दोष चर्या का पालन करने से नहीं रोक सकती है। आचार्य श्री जी ने महान् चर्चा के साथ-साथ महान् चर्या का पालन करके दिखाया ऐसे अद्भुत व्यक्तित्व के धनी आचार्य श्री युगों-युगों तक हम सभी के हृदय पटल पर अंकित रहेंगे। हमारी स्मृतियों में गुरुदेव सदा सर्वदा विराजमान रहेंगे इस बात और इसी बात को गुरुदेव के शब्दों में कहें तो
– हाइकू –
दूर रहता हूँ मगर पास भेज देता हूँ अपनापन।
यही आशा है कि गुरुदेव भले ही देह से हमसे दूर चले गए हैं किन्तु उनका अपनापन सदा हमारे पास रहेगा। उनकी आशीष अनुकम्पा सदा हमारे मस्तक पर बरसती रहेगी।