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आचार्य श्री 108 सुबल सागर जी महाराज 29.11.2023…

चंडीगढ़ दिगंबर जैन समाज के इतिहास में प्रथम बार आचार्य श्री सुबल सागर जी महाराज के आशीर्वाद एवं प्रेरणा से पंचकल्याणक महोत्सव एवं विश्व शांति महायज्ञ का तृतीय दिवस जन्म कल्याण महोत्सव बड़ी ही धूमधाम एवं भव्य शोभा यात्रा के साथ संपन्न हुआ यह जन्मभिषेक का जुलूस 6 किलोमीटर का चंडीगढ़ के इतिहास में प्रथम बार शहर के कई रास्तों से होता हुआ मंदिर प्रांगण के बाजू वाले मैदान में आया l इस यात्रा में करीब 300 से 400 श्रावक भक्तगण प्रभु की भक्ति नृत्य कर रहे थे प्रभु के ऊपर प्रथम अभिषेक करने वाला सौभाग्य श्री राजेंद्र अनिल कुमार जैन को प्राप्त हुआ और 200 लोगों ने भी प्रभु का अभिषेक किया इस शोभा यात्रा में जगह-जगह प्रभु के स्वागत में लोगों ने अपने-अपने द्वार पर सभी लोगों का स्वागत सम्मान किया l
कई प्रकार के बैंड बाजों के साथ और ऐरावत हाथी जो की काठ का था और घोड़े भी यात्रा की शोभा बढ़ा रहे थे इसके साथ ही सौधर्म इंद्र महाराज जब बालक भगवान को माता-पिता को सौंपते हैं जब समस्त खुशी को व्यक्त करते हुए तांडव नृत्य करते हैं और प्रभु के गुणों की महिमा का बखान करते हुए अपने आप को धन्य करता हैl

एक तरफ तो प्रभु के जन्मोत्सव की खुशियां मनाई जा रही थी सारे नगर के लोग हर्षित हैं और दूसरी तरफ वैराग्यमय दृश्य जहां 3 भव्य आत्माओं ने संसार मार्ग को छोड़कर वैराग्यमार्ग को अंगीकार किया l उन्होंने हमेशा हमेशा के लिए समस्त वैभव, घर, परिवार, व्यवसाय, को छोड़कर आत्मा में रुचि लगाई यह वैराग्यमार्ग ही दुखो से दूर समस्त प्रकार के सुखों को देने में समर्थ हैl संसार का सुख तो क्षणभंगुर है जहां सुख नहीं सुखाभास है अर्थात सुख का आभास मात्र है जो सुख नहीं है l+
कई भक्तगण जो वैराग्य की अनुमोदना करने के लिए अर्थात दीक्षा देखने के लिए बाहर से पधारे जयपुर, कोलकाता, अहमदाबाद, ग्वालियर, भिंड, लखनऊ, अकोदिया, बहराइच आदि स्थानों से भक्तगण आए l भगवान के माता-पिता तो इतने खुश थे कि जिसका कोई गुणगान ही नहीं कर सकता है और इसके साथ ही सौधर्मइंद्र तथा शचि रानी भी प्रभु के दर्शन कर अपने को धन्य करते हैं l कुबेर इंद्र महाराज ने प्रभु के जन्म महोत्सव पर रत्नों की वर्षा की जिससे राज्य के चारों तरफ दुख दर्द का नाश हुआ l चंडीगढ़ समाज के भव्य लोगों ने और हम सभी ने इस महोत्सव की खूब अनुमोदना कर अपने आप को धन्य किया l यह जानकारी संघस्थ बाल ब्र. गुंजा दीदी एवं श्री धर्म बहादुर जैन जी ने दी