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याचना करने वाला लघुता को प्राप्त होता है – आचार्य श्री 108 सुबल सागर जी महाराज…

चंडीगढ़ दिगम्बर जैन मंदिर सेक्टर 27 B में विराजमान आचार्य श्री 108 सुबल सागर जी महाराज ने श्रावकों को संबोधन करते हुए कहते हैं कि हे प्रिय बंधुओं। इस संसार में दोनों कानों से सुनने के लिए अमृत के समान अगर कोई है तो वह है गुरुओं के अच्छे श्रेष्ठ उपदेश कानों का काम तो सुनना होता है. चाहे अच्छे वचन सुने या बुरे शब्द अपना महत्व रखते हैं। अच्छे शब्द सुनकर लोग अहकार से फूल जाते हैं और बुरे शब्द सुनकर लोगों का मन कूल जाता है किसी हिम्मत हारते हुए मनुष्य को उसकी प्रशंसा के शब्द प्रोत्साहन के शब्द और उत्साह के शब्द कहें तो वह दुगुने वेग के साथ उठकर उत्साह से पुरुषार्थ करते हुए अपने कार्य में सफलता को प्राप्त कर लेता है और इसके विपरीत अगर किसी व्यक्ति को नीचा गिराना है तो उसको हतोत्साह रूप वचन, उसकी निंदा रूप आदि वचनों से वह उत्साह को छोड़कर शांत हो जाता है। लेकिन आचार्य भगवान इन दोनों प्रकार के वचनों को छोड़कर आगम की बात को कहने के लिए कह रहे हैं। अर्थात् सद् उपदेश । जिससे जीवों का भला हो कल्याण हो जैसे दोनों हाथों की अंजुलि बनाकर पानी पीते हैं उसी प्रकार यहां पर दोनों कानों को अंजुलि बनाकर अमृत के समान अरिहंत भगवान के उपदेश सुनने को कहा जा रहा है।

इस संसार में बड़प्पन क्या है अर्थात लोगों की गुरुता किसमें है तो कहते हैं अयाचक वृत्ति अर्थात् माँगना / प्रार्थना करना हमेशा देने वाला बड़ा होता है और लेने वाला छोटा होता है देखो! तराजू का पलड़ा जिसमें कुछ वस्तु रखी जाती है, वह नीचे जाती है और जिस पलड़े पर कुछ नहीं होता है वह ऊपर जाता है. इसी प्रकार याचना करने वाले का गौरव / आत्मसम्मान चला जाता है, देने वाला बड़ा हो जाता है याचना करने वाले व्यक्ति से लोग दूर रहने लगते हैं और उसका आदर सम्मान भी नहीं करते हैं। मुनि महाराजों को एक परीषह भी है जिससे वह आवश्यकता पड़ने पर भी कुछ न मांगने पर कर्म की निर्जरा करते हैं।

जिन वाणी को सुनना, उस पर प्रदान करना और उसके अनुसार ही आचरण करना यही रत्नत्रय है रत्नत्रय रूप कारण के होने पर ही मोक्ष रूप कार्य होगा। इसी लिए गुरूओं के वचनों को सुनना उससे अपना हित-अहित जानते / समझते हुए शक्ति होने पर आचरण में धारण करते हुए या शक्ति के न होने पर श्रद्धान करना ही सम्यग्दर्शन है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यग्चारित्र ही आत्मा के रत्न हैं जिससे आत्मा की शोभा होती है। यह जानकारी संघस्थ बाल ब्र. गुंजा दीदी एवं श्री धर्म बहादुर जैन जी ने दी ।