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युवा लेखिका निकाशा लूथरा की नई पुस्तक ‘लॉस्ट एंड फाउंड इन कश्मीर’ का अनूठे अंदाज़ में विमोचन…..

चंडीगढ़, 9 जून, 2026: साहित्य और कला प्रेमियों का आज शाम सेक्टर-18 स्थित मिनी टैगोर थिएटर में जमावड़ा लगा, जहां 19 वर्षीय लेखिका, अभिनेत्री और फिल्म डायरेक्टर निकाशा लूथरा के नवीनतम उपन्यास ‘लॉस्ट एंड फाउंड इन कश्मीर’ का औपचारिक विमोचन किया गया। पुस्तक का विमोचन हरियाणा की वित्त आयुक्त (राजस्व) डॉ. सुमिता मिश्रा, आईएएस ने मुख्य अतिथि , और लेफ्टिनेंट जनरल के.जे.एस. ढिल्लों (सेवानिवृत्त), जिन्हें टाइनी ढिल्लों के नाम से भी जाना जाता है, तथा चंडीगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. मनमोहन सिंह, आईपीएस (सेवानिवृत्त) ने विशेष अतिथियों के रूप में किताब का लोकार्पण किया ।

द नरेटर्स परफॉर्मिंग आर्ट्स सोसाइटी (इंडिया) द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में पुस्तक का विमोचन एक अनूठे अंदाज़ में किया गया। यह आयोजन साहित्य, रंगमंच और सिनेमा का शानदार संगम साबित हुआ। पुस्तक विमोचन के साथ-साथ उपन्यास के चुनिंदा अंशों पर आधारित एक विशेष लघु फिल्म भी दर्शकों को दिखाई गई। इसके अतिरिक्त, फिल्म में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाने वाले कलाकारों ने मंच पर कुछ दृश्यों का सजीव प्रदर्शन भी किया।

कार्यक्रम के दौरान निकाशा ने इस 270 पृष्ठों की पुस्तक के रचनात्मक सफर के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि यह उपन्यास पहलगाम आतंकी हमले के भावनात्मक और मानवीय प्रभावों पर उनके चिंतन से जन्मा है।

उन्होंने कहा कि पहलगाम की त्रासदी ने मुझ पर गहरा प्रभाव छोड़ा। समाचार सुर्खियों से आगे बढ़कर मैं उन व्यक्तिगत कहानियों, अधूरे सपनों और ऐसे हादसों के बाद लोगों के जीवन में छा जाने वाले मौन दुख के बारे में सोचती रही। यह उपन्यास उन्हीं भावनाओं को काल्पनिक कथा के माध्यम से व्यक्त करने का एक प्रयास है, जो मानवीय अनुभवों से गहराई से जुड़ा हुआ है।

कश्मीर की मनमोहक लेकिन जटिल पृष्ठभूमि पर आधारित यह उपन्यास हीर और कबीर के जीवन के इर्द-गिर्द घूमता है, जो नुकसान, मानसिक आघात, प्रेम और उपचार जैसी परिस्थितियों का सामना करते हैं। बहुआयामी पात्रों और प्रभावशाली कथन शैली के माध्यम से यह कहानी दर्शाती है कि जीवन बदल देने वाली घटनाओं के बाद व्यक्ति स्वयं को किस प्रकार फिर से संभालता और पुनर्निर्मित करता है।

कहानी के लिए कश्मीर को पृष्ठभूमि चुनने के बारे में निकाशा ने कहा कि इस क्षेत्र के विविध और विरोधाभासी स्वरूप ने उन्हें कहानी कहने के लिए एक सशक्त मंच प्रदान किया। उन्होंने कहा कि कश्मीर असाधारण सुंदरता और गहरे दुख, दोनों का प्रतीक है। इसके प्राकृतिक दृश्य आश्चर्य से भर देते हैं, जबकि इसका इतिहास पीड़ा और संघर्ष की गूंज अपने भीतर समेटे हुए है। यही द्वैत उस कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया जिसे मैं कहना चाहती थी।

निकाशा पहले से ही एक प्रतिभाशाली युवा रचनाकार के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं। इस पुस्तक से पहले वह ‘डार्क ट्यूलिप्स’ नामक कविता संग्रह और ‘फ्लावर्स इन हर रूम’ नामक लघु नाटकों के संकलन की रचना कर चुकी हैं। इसके अलावा उन्होंने ‘अनकहे ख्वाब’ और ‘सहर की तलाश में’ जैसी फिल्मों का लेखन और निर्देशन भी किया है।

उपन्यास से जुड़ी अपनी अपेक्षाओं के बारे में उन्होंने कहा कि वह चाहती हैं कि पाठक इसकी भावनात्मक गहराई से जुड़ सकें। उन्होंने कहा कि यदि यह कहानी पाठकों में थोड़ी-सी भी सहानुभूति और समझ विकसित कर सके, तो मैं इसे अपनी सफलता मानूंगी। सबसे बढ़कर, मैं चाहती हूं कि लोग कश्मीर को केवल संघर्ष के नजरिए से नहीं, बल्कि उसकी मानवता, संस्कृति और जीवंत भावना के लिए याद रखें।

इस पुस्तक विमोचन समारोह में लेखकों, कलाकारों, विद्यार्थियों, शिक्षकों और साहित्य प्रेमियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। यह शाम रचनात्मकता, कहानी कहने की कला और सार्थक संवाद का एक यादगार उत्सव बन गई।