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आचार्य श्री 108 सुबल सागर जी महाराज 23.11.2023…

चंडीगढ़ दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान आचार्य श्री 108 सुबल सागर जी महाराज ने ज्ञान पिपासु अपने शिष्यों को स्वाध्याय सभा में समझाते हुए कहा कि जिनेंद्र भगवान के द्वारा कहा गया आगम रूप वचन बहुत है उसे पालन करने की जितनी शक्ति है उतनी शक्ति से पालन करो और जहां शक्ति का अभाव है, उस पर श्रद्धान करो अर्थात भगवान ने समोशरण सभा में प्रत्येक जीव के कल्याण के लिए उसे धर्म का उपदेश दिया है l यह धर्म रूपी उपदेश ही दु:खो से दूर करने में एकमात्र उपाय है इस पर श्रद्धान,भरोसा, विश्वास करने वाला नियम से संसार के दुखों से बाहर निकलता है l

जो श्रावक सम्यकदर्शन,सम्यकज्ञान, और सम्यकचारित्र से युक्त होता हुआ हुआ अपनी शक्ति के अनुसार इच्छा निरोध रूप तप को अंगीकार करता है वही वास्तव में संयमी है अर्थात संसार शरीर,भोगों से उदासीन होकर अपनी आत्मा में वा उसके गुणओ में प्रीति को प्राप्त होता है और उसी की प्रीति करते हुए उसी का ध्यान करता हुआ, परम पद को प्राप्त हो जाता है l

जैन आगम में तीन रत्न है जो बहुत ही अनमोल हैं जिन्हें संसार का प्राणी कितनी भी कीमत देकर प्राप्त नहीं कर सकता है इसीलिए इन्हें अनमोल कहा जाता है श्रद्धान,ज्ञान और चारित्र l सम्यकदर्शन सम्यकज्ञान और सम्यकचारित्र l सम्यकदर्शन अर्थात श्रद्धान, सम्यक ज्ञान अर्थात सच्चा ज्ञान और सम्यकचारित्र अर्थात आचरण में धारण करना l किसी किसी के पास श्रद्धान है तो किसी के पास ज्ञान और किसी के पास चरित्र l भिन्न-भिन्न होने से इनका महत्व कम हो जाता है तीनों की एकता ही समस्त सुखों को देने वाली है इसलिए आचार्य भगवान यहां समझ रहे हैं कि हे भोले प्राणी ! जिनेन्द्र भगवान के द्वारा कहा गया धर्म उपदेश पर श्रद्धान करो और जितनी शक्ति है उसके अनुसार आचरण को धारण करो l उस हित व कल्याणमय उपदेश में जो किया जा सके उसे करना चाहिए और जो न किया जा सके उसका श्रद्धान करना चाहिए क्योंकि श्रद्धान करने वाला प्राणी भी अजर,अमर पद को प्राप्त होता है जब तक इस जीव की संसार रूप पुण्य और पाप में प्रवृत्ति होती रहती है तब तक आत्म स्वरूप में स्थिरता नहीं होती है l यह जानकारी बाल ब्र. गुंजा दीदी एवं श्री धर्म बहादुर जैन जी ने दी l