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आचार्य श्री 108 सुबल सागर जी महाराज, 13.11.2023

चंडीगढ़ दिगम्बर जैन मंदिर में विराजमान आचार्य श्री सुबलसागर जी महाराज कार्तिक कृष्णा अमावस्या की प्रात: कालीन बेला में महावीर दिगम्बर जैन मंदिर प्रागंण में सैंकड़ों की संख्या में लोगों ने भगवान महावीर का अभिषेक शांतिधारा कर पूजन पूर्वक124 किली का निर्माण लाडू चढ़ाया लाडू चढ़ने का सौभाग्य श्री अमित जैन प्रमोद जैन सेक्टर 40 बालों को और शांतिधारा करने का सौभाग्य श्री धर्म बहादुर जैन सपरिवार एवं डॉक्टर संयोग जैन जी को प्राप्त हुआ तत्पश्चात आचार्य श्री सुबल सागर जी महाराज ने कहा कि हम दीपावली पर्व मानते हैं और सदियों से मनाते भी चले आ रहे है लेकिन क्यों मनाते है पता ही नहीं। कारण के होने पर ही कार्य की सिद्धि होती है। कारण के अभाव में कार्य की सिद्धि नहीं हो सकती है। कारण का पता लगाया तो पता चला कि आज के दिन कई वर्षों पहले भगवान महावीर स्वामी मोक्ष गए थे उनके मोक्ष जाने की खुशी में हम दीपावली पर्व मनाते है। उन्होंने तो अपने कर्म रूपी कचड़े को साफ कर ज्ञान रूपी दीपक के प्रकाश को जलाया। आज 2550 वर्ष पहले कार्तिक अमावस्या की प्रातः कालीन बेला में आठों कर्मों का नाश किया था हमें भी अपने कर्मों को नाश करने का उपदेश दिया इस कारण से हम उनके प्रति उपकार, कृतज्ञता प्रकट करते हुए आज के दिन भगवान महावीर की पूजा, भारती, अभिषेक कर फिर बाद में निर्माण लाडू पर्व चढाते हैं।

भगवान महावीर के निर्माण जाने के पश्चात् उनके मुख्य गणधर श्री गौतम स्वामी को उसी दिन शाम के समय केवलज्ञान की प्राप्ति हुई थी इसीलिए हम भी प्रातः कालीन बेला में लाडू चढ़ाकर शाम के समय 64 ऋद्धियों के प्रतीक के रूप अपने घरों पर 16 दीपक प्रज्वलित करते हैं। जिनमें 64 बाती होती है।

गणधर गौतम स्वामी महाराज को 64 ऋद्धियाँ प्रकट हुए थी और उनका समोसरण लगा उनकी दिव्य देशना खिरी थी इसी कारण से हम हैं यह जिनवाणी की भी पूजा करते हैं यह जिनवाणी ही केवलज्ञान प्राप्त कराने में मुख्य कारण जिनवाणी के पढने और पढ़ाने से ही हमें अपने दोषों व गुणों का ज्ञान होता है और हम पुरुषार्थ पूर्वक दोषों को नष्ट कर, गुणों को प्रकट करते हुऐ, पूर्णता गुणों को प्राप्त कर लेना ही भगवान अवस्था की प्राप्ति हैं। इसलिए सच्चे देव शास्त्र- गुरुओं की पूजा, भक्ति, अराधना करना ही धर्म है, यह धर्म ही हमें दुखों से दूर कर सुखों में स्थित करता है। इस कारण से दीपावली पर्व मनाया ही सार्थक है अन्यथा कारण के अभाव में दुख दूर नही हो सकते और उलटा ही कर्म बंध का कारण है। हम सभी भगवान महावीर स्वामी के शासन काल में रहते है यह उनका उपकार है इस उपकारी के उपकार को मानना ही सच्ची दीपावली है। यह जानकारी बाल ब्र. गुंजा दीदी एवं श्री धर्म बहादुर जैन जी ने दी।