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आचार्य श्री 108 सुबल सागर जी महाराज..

चंडीगढ़ महावीर दिगम्बर जैन मंदिर में धर्म प्रभावना ‘करते हुए आचार्य श्री 108 सुबलसागर जी महाराज ने कहा कि इस संसार में देखे तो ‘कर्म ही एक ऐसा अद्वितीय सच्चा न्यायाधीश [मजिस्ट्रेट] है| जिसके यहाँ अन्याय नाम की कोई वस्तु नहीं है सौ प्रतिशत न्याय करता है। जैसे अग्नि सबको बराबर जलाती है, चाहे वह अमीर हो या गरीब हो, चाहे भारतीय हो या विदेशी हो, किसी के साथ अन्याय नहीं करता है कर्म ।

लौकिक क्षेत्र में न्यायाधीश पैसा, घूस, रिश्वत आदि लेकर या अन्य किसी कारण से न्याय का अन्याय और अन्याय का न्याय कर दें, अपराधी को निर्दोषी और निर्दोषी को अपराधी सिद्ध कर दें, गलत को सही और सही को गलत सिद्ध कर दें, किन्तु कर्म रूपी न्यायाधीश के यहाँ ऐसा बिल्कुल नहीं होता है। अपराधी को अपराधी और निर्दोषी को निर्दोषी, सही को सही, गलत को गलत सिद्ध करता है। अर्थात् “दूध का दूध, पानी का पानी ” कर्म रूपी न्यायाधीश के यहाँ नाम मात्र को घूस, रिश्वत, भय, बेइमानी आदि कुछ भी नहींचलता है।

अमीर हो या गरीब हो, सेठ हो या नौकर हो। रोने वाला हो या हंसने वाला हो, भक्त हो या नास्तिक हो, भगवान भी क्यों न हो सब के लिए अपने कर्म के अनुसार फल देता है। न किसी के लिए कम और न के लिए अधिक, जिसने जैसा-जैसा कर्म किया है उसको वैसा-वैसा फल देता है। अमीर लोग पैसे वाले होते हैं। अतः पैसे के कारण उन्हें छोड़ दें या कम फल दें,किन्तु ऐसा नहीं करता है कर्म रूपी न्यायाधीश|जब तीर्थंकर भगवान, चक्रवर्ती जो छः खण्ड का अधिपति होता है, त्यागी, तपस्वी, भक्त, पुजारी आदि को कर्मों ने नहीं छोड़ा, न फल में कम ज्यादा किया तो हम किस खेत की मूली हैं जो हमको छोड़ दे या कम ज्यादा कर दें।

इस प्रकार इस संसार में कर्म ही सच्चा न्यायाधीश है। आदिनाथ भगवान ने राज्य अवस्था में के पालन के लिए जो बैलों के मुख पर मुसीका बांधने का उपदेश दिया था उसी कर्म के फलस्वरूप जब उन्होंने दीक्षा ली और आहार के लिए निकले तो उन्हें विधि नहीं मिली वे छः माह तक भूखे रहे, अतः कर्म करते समय उसके की और भी ध्यान रखना फल चाहिए, तभी हम कर्मों से बच सकते हैं।

यह जानकारी बाल ब्र. गुंजा दीदी व श्री धर्मबहादुर जैन ने दी |