पंजाब यूनिवर्सिटी के लॉ के छात्रों ने भारत में मतदान के अधिकार पर ब्रिटिश शासन के प्रभाव को समझा…..
चंडीगढ़, 30 अक्टूबर, 2026: पंजाब यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ लॉज की प्रो. अनिल कुमार ठाकुर डिबेटिंग सोसायटी ने शुक्रवार को म्यूजियम ऑफ ब्रिटिश कॉलोनियलिज्म (एमबीसी) के सहयोग से विभाग के मूट कोर्ट हॉल में पहला राष्ट्रीय आवाज सत्र आयोजित किया। इस सत्र में 150 से अधिक विद्यार्थियों और फैकल्टी सदस्यों ने हिस्सा लिया।
सत्र में भारत में मतदान के अधिकार की शुरुआत और उस पर ब्रिटिश शासन के प्रभाव पर चर्चा की गई। साथ ही यह समझने का प्रयास किया गया कि ब्रिटिश शासन की विरासत आज भी देश के कानून, संस्थाओं और समाज को किस तरह प्रभावित कर रही है। इस कार्यक्रम का संचालन फैकल्टी कोऑर्डिनेटर प्रो. (डॉ.) सुपिंदर कौर और डॉ. मनीषा गर्ग के साथ स्टूडेंट कोऑर्डिनेटर चांदनी जसवाल और दुर्गेश दामिनी ने किया। चांदनी जसवाल म्यूजियम ऑफ ब्रिटिश कॉलोनियलिज्म (एमबीसी) की भारत प्रतिनिधि भी हैं।
पंजाब यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ लॉज की प्रो. (डॉ.) सुपिंदर कौर ने कहा, “हम पंजाब यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर, हमारे विशेष अतिथि श्री लल्लन बघेल, फैकल्टी सदस्यों, स्टाफ, विद्यार्थियों, सभी प्रतिभागियों और एमबीसी के आभारी हैं।”
म्यूजियम ऑफ ब्रिटिश कॉलोनियलिज्म की भारत प्रतिनिधि चांदनी जसवाल ने कहा, “ब्रिटिश शासन हमारे इतिहास का सबसे हाल का अध्याय है, लेकिन आम भारतीयों पर इसके प्रभाव के बारे में हम सबसे कम जानते हैं। हम अपने नेताओं और आजादी की लड़ाई को याद करते हैं, लेकिन उन लाखों लोगों को शायद ही याद करते हैं, जिन्होंने अकाल, कर्ज और दमन के कारण अपनी जान गंवाई। हमारे विश्वविद्यालयों में ब्रिटिश शासन के इतिहास को पढ़ाया जाता है, लेकिन यह कभी भी कक्षा से बाहर निकलकर देश की सामूहिक यादों का हिस्सा नहीं बन पाया। आज भी हम अंग्रेजी को अपनी भाषाओं से बेहतर मानते हैं, जो दिखाता है कि ब्रिटिश शासन का प्रभाव कितनी गहराई तक है। इतिहास को केवल सही या गलत के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। इसे बिना किसी पक्षपात के समझना और पढ़ना जरूरी है, न कि इसे केवल नारों तक सीमित कर देना चाहिए।”
ब्रिटिश शासन के पीड़ितों की याद में राष्ट्रीय स्मृति दिवस मनाने की मांग करते हुए चांदनी जसवाल ने कहा, “ऐसा राष्ट्रीय स्मृति दिवस उन पीड़ितों को वह सम्मान और स्थान देगा, जिसके वे हकदार हैं। मैं हर भारतीय से अपील करती हूं कि वह indiascolonialstory.org पर जाकर इस मांग से जुड़ी ऑनलाइन याचिका पर हस्ताक्षर करे और इस दिन को हकीकत बनाने में सहयोग दे।”
चांदनी जसवाल पंजाब यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ लॉज की छात्रा भी हैं।
इस सत्र का विषय ‘मतदान के अधिकार का औपनिवेशिक इतिहास’ था। इसमें बताया गया कि ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में मतदान का अधिकार केवल कुछ लोगों तक सीमित था। यह अधिकार उन्हीं लोगों को मिलता था, जिनके पास संपत्ति, अच्छी आमदनी और शिक्षा होती थी। इसके अलावा, अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग चुनाव व्यवस्था भी लागू की गई थी, जिसका उस समय राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर गहरा प्रभाव पड़ा।
आज के कार्यक्रम की खास बात यह रही कि एमबीसी के सहयोग से पहली बार राष्ट्रीय आवाज सत्र आयोजित किया गया। इसमें मतदान के अधिकार के इतिहास और विशेष रूप से ब्रिटिश शासन के दौरान इस अधिकार पर पड़े प्रभाव को मौजूदा एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) से जोड़कर भी चर्चा की गई। इसके साथ ही देश के राजनीतिक और कानूनी ढांचे पर ब्रिटिश शासन के प्रभाव को भी समझा गया। इस चर्चा में देशभर के प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
सत्र में विद्यार्थियों ने चर्चा की कि आजादी के बाद भारत ने इस सीमित मतदान व्यवस्था को खत्म कर संविधान के माध्यम से सभी वयस्क नागरिकों को समान मतदान का अधिकार दिया। अब किसी भी नागरिक को संपत्ति, आमदनी, शिक्षा या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर मतदान के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
इस दौरान विद्यार्थियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और विषय पर खुलकर अपने विचार रखे। उन्होंने इस बात पर भी चर्चा की कि भारत का औपनिवेशिक अतीत आज भी वर्तमान को किस तरह प्रभावित कर रहा है। चर्चा में यह बात सामने आई कि आने वाली पीढ़ी के वकीलों के लिए ब्रिटिश शासन के प्रभाव से मुक्त होना केवल इतिहास का विषय नहीं है, बल्कि भाषा, कानून और पहचान से जुड़ी एक ऐसी चर्चा है, जो आज भी जारी है।
सत्र के दौरान विद्यार्थियों ने भारत की कानूनी और राजनीतिक संस्थाओं की ब्रिटिश शासन के समय की शुरुआत से जुड़े कई सवाल भी उठाए। चर्चा के माध्यम से उन्हें यह समझने का अवसर मिला कि ब्रिटिश शासन का प्रभाव आज भी कानून और समाज में किस तरह दिखाई देता है। साथ ही इस बात पर भी विचार किया गया कि एक देश के रूप में हमें अपने इतिहास को किस तरह याद रखना चाहिए।
कार्यक्रम के अंत में म्यूजियम ऑफ ब्रिटिश कॉलोनियलिज्म ने विद्यार्थियों और फैकल्टी सदस्यों से भारत में ब्रिटिश शासन के पीड़ितों की याद में राष्ट्रीय स्मृति दिवस घोषित करने की मांग वाली ऑनलाइन याचिका का समर्थन करने की अपील की।
उल्लेखनीय है कि एमबीसी की इस पहल का उद्देश्य उन लाखों भारतीयों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और सम्मान दिलाना है, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के दौरान अकाल, आर्थिक शोषण, दमन और ऐसी नीतियों के कारण अपनी जान गंवाई, जिनसे समाज और विभिन्न समुदायों के बीच मतभेद और गहरे हुए। एमबीसी ने कहा कि इन पीड़ितों की याद में देश में अभी तक कोई अलग राष्ट्रीय दिवस नहीं है। संस्था ने लोगों से अपील की कि वे indiascolonialstory.org पर जाकर इस मांग से जुड़ी याचिका पर हस्ताक्षर करें, ताकि देश के इस इतिहास के बारे में अधिक से अधिक लोगों को जागरूक किया जा सके।


