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संतूर की मधुर स्वर लहरियों से सजी केन्द्र की 323वीं मासिक बैठक….

चंडीगढ़: प्राचीन कला केन्द्र द्वारा हर माह आयोजित की जाने वाली मासिक बैठकों की श्रृंखला की 323वीं कड़ी में इस बार संतूर की मधुर स्वर लहरियों ने संगीत प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस अवसर पर सुप्रसिद्ध संतूर वादक पंडित दिशारी चक्रवर्ती ने अपने प्रभावशाली संतूर वादन से श्रोताओं की खूब सराहना प्राप्त की। उनके साथ तबले पर मधुरेश भट्ट तथा पखावज पर मनोज सोलंकी ने प्रभावशाली संगत प्रदान की।

कार्यक्रम का आयोजन केन्द्र के एम.एल. कौसर सभागार में सायं 6:30 बजे किया गया। इस अवसर पर चंडीगढ़ के अनेक जाने-माने कलाकार एवं संगीत प्रेमी उपस्थित रहे।

पंडित दिशारी चक्रवर्ती — संक्षिप्त परिचय

पंडित दिशारी चक्रवर्ती शततंत्री वीणा (कश्मीरी संतूर) के बहुमुखी ख्यातिप्राप्त कलाकार हैं। संगीत के क्षेत्र में 35 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ उन्होंने संतूर वादन, शिक्षण, संगीत निर्देशन तथा रचनात्मक कार्यों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। वे मुख्य रूप से स्व-अध्ययन से विकसित हुए कलाकार हैं और सेनिया मैहर परंपरा के अनेक महान कलाकारों से मार्गदर्शन प्राप्त किया है। संतूर की अपनी विशिष्ट शैली विकसित करने के लिए उन्होंने सरोद, हारमोनियम, तबला, पखावज एवं अन्य वाद्यों का भी गहन अध्ययन किया।

बाल प्रतिभा के रूप में उन्होंने कम आयु में ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान प्राप्त किया। उनके संगीत योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है। वर्ष 2022 में बांग्लादेश शिल्पकला अकादमी द्वारा उन्हें ‘पंडित’ की उपाधि से सम्मानित किया गया, जबकि वर्ष 2024 में पश्चिम बंग नाट्य अकादमी द्वारा संगीत निर्देशन, गीत रचना एवं साउंड डिजाइन के क्षेत्र में उनके समग्र योगदान के लिए Lifetime Achievement Award प्रदान किया गया। वे भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ रंगमंच, नृत्य, फिल्म एवं डॉक्यूमेंट्री के लिए भी संगीत रचना कर चुके हैं। वे भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) द्वारा आयोजित अनेक कार्यक्रमों में भी प्रस्तुति दे चुके हैं।

कार्यक्रम का शुभारंभ पंडित दिशारी चक्रवर्ती ने राग हेमंत में आलाप से किया। संतूर के तंत्रकारी अंग में सजे उनके आलाप ने राग की भावपूर्ण छटा को बखूबी उभारा। इसके पश्चात उन्होंने मध्य लय में झपताल में जोड़ प्रस्तुत किया तथा द्रुत तीनताल में झाला पेश कर अपनी लयकारी और तंत्रकारी कौशल का शानदार परिचय दिया। उनकी प्रस्तुति में राग की शुद्धता, स्वर-सौंदर्य और विविध लयकारियों का सुंदर समन्वय देखने को मिला, जिसे श्रोताओं ने तालियों की गड़गड़ाहट से सराहा।

तबले पर मधुरेश भट्ट ने सधी हुई एवं प्रभावशाली संगत से प्रस्तुति को और समृद्ध किया, जबकि मनोज सोलंकी ने पखावज पर अपनी दमदार संगत से कार्यक्रम में विशिष्ट रंग भरा। दोनों कलाकारों ने मुख्य कलाकार के साथ सुंदर संवाद स्थापित करते हुए प्रस्तुति को प्रभावशाली बनाया।

कार्यक्रम का समापन रसिया राग में निबद्ध एक मधुर धुन से हुआ, जिसका दर्शकों ने भरपूर आनंद लिया। संतूर की मधुर ध्वनि और कलाकारों की शानदार जुगलबंदी ने इस मासिक बैठक को यादगार बना दिया।

कार्यक्रम के अंत में प्राचीन कला केन्द्र के सचिव श्री सजल कौसर ने मुख्य कलाकार पंडित दिशारी चक्रवर्ती एवं उनके सहयोगी कलाकारों को उत्तरीया एवं स्मृति-चिह्न भेंट कर सम्मानित किया। इस अवसर पर केन्द्र की रजिस्ट्रार डॉ. शोभा कौसर भी उपस्थित थीं।