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अष्टान्हिका महापर्व महोत्सव का तृतीय दिवस आज संपन्न….

श्री दिगम्बर जैन मंदिर, सेक्टर-27 बी, चंडीगढ़ में अष्टान्हिका महापर्व के पावन अवसर पर आयोजित सिद्धचक्र महामण्डल विधान एवं शांति महायज्ञ का तृतीय दिवस श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक साधना के वातावरण में संपन्न हुआ। प्रातः 6:30 बजे भगवान जिनेन्द्र देव के अभिषेक एवं मुख्य मंदिर तथा विधान मंडप में शांतिधारा के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ।

इसके उपरांत ब्रह्मचारिणी आशा दीदी के सान्निध्य में मंगलाचरण, पूजन तथा सिद्धचक्र महामण्डल विधान की निर्धारित विधियाँ श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ संपन्न हुईं। सैकड़ों श्रद्धालुओं ने विधान में सहभागिता कर धर्मलाभ प्राप्त किया और विश्व शांति, समाज के कल्याण तथा आत्मकल्याण की मंगलकामना की।

अपने प्रवचनों में आशा दीदी ने अष्टान्हिका महापर्व के तृतीय दिवस (शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि) के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह दिन साधना और आत्मशुद्धि की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। आठ दिनों तक चलने वाली अखंड साधना का यह एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जहाँ साधक की आध्यात्मिक यात्रा अधिक परिपक्वता की ओर अग्रसर होती है।उन्होंने बताया कि अष्टान्हिका व्रत की प्राचीन साधना पद्धति के अनुसार प्रत्येक दिन की एक विशिष्ट संज्ञा एवं मंत्र निर्धारित है। तृतीय दिवस को “त्रिलोकसागर संज्ञा” के रूप में आराधना की जाती है तथा श्रद्धालु “ॐ ह्रीं त्रिलोकसागर संज्ञाया नमः” मंत्र का 108 बार जाप करते हैं। यह मंत्र ऊर्ध्वलोक, मध्यलोक एवं अधोलोक—तीनों लोकों में विराजमान जिनेन्द्र भगवान की दिव्य चेतना तथा मोक्षमार्ग के प्रभाव का प्रतीक है।

दीदी ने कहा कि अष्टमी एवं नवमी के दौरान साधक अपनी आत्मा को सांसारिक विषयों से हटाकर धर्म की ओर उन्मुख करता है, जबकि दशमी तिथि साधना की परिपक्वता का प्रतीक है। इस दिन व्रती अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण संयम स्थापित करने का प्रयास करता है। जैन आगमों एवं प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, इस दिन की आराधना से जीव में जन्म-जन्मांतर के संचित कर्मों के क्षय की शक्ति प्रबल होती है तथा आत्मा निर्मलता की ओर अग्रसर होती है।

उन्होंने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि जैन साहित्य में अष्टान्हिका व्रत का अत्यंत प्रेरणादायी वर्णन सती मैनासुन्दरी की कथा में मिलता है। सिद्धचक्र महामण्डल विधान की प्रभावना एवं अष्टान्हिका महापर्व की आराधना के प्रभाव से उनके पति राजा श्रीपाल को कुष्ठ रोग से मुक्ति प्राप्त हुई। यह कथा इस बात का प्रतीक है कि श्रद्धा, संयम और सच्ची आराधना के माध्यम से मनुष्य न केवल शारीरिक, बल्कि आध्यात्मिक रोगों से भी मुक्ति प्राप्त कर सकता है।

आज का विधान प्रातः लगभग 10:00 बजे मंगलमय वातावरण में संपन्न हुआ। पूरे कार्यक्रम के दौरान मंदिर परिसर भक्तों के जयघोष, मंत्रोच्चारण एवं भक्ति-भाव से गुंजायमान रहा। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सिद्धचक्र महामण्डल विधान में भाग लेकर धर्माराधना की तथा समस्त विश्व में सुख, शांति और मंगल की कामना की। आज का भोजन श्री जीतेन्द्र जैन मोहाली के परिवार कि और से था।

श्री दिगम्बर जैन मंदिर समिति ने सभी श्रद्धालुओं से आगामी दिनों में आयोजित सिद्धचक्र महामण्डल विधान एवं शांति महायज्ञ में अधिकाधिक संख्या में सहभागिता कर धर्मलाभ प्राप्त करने का आग्रह किया।