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आचार्य श्री 108 सुबल सागर जी महाराज…

चड़ीगढ़ दिगम्बर जैन मंदिर सेक्टर 27बी में परम पूज्य आचार्य श्री सुबलसागर जी महाराज अपने शिष्यों को समझा रहे है कि हे ज्ञानी आत्माओं । जीवन के उत्कर्ष में गुरु का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इतिहास साक्षी है, प्रत्येक सफल पुरुष के पीछे कोई एक श्रेष्ठ प्रज्ञाशील सम्यक् बोध (ज्ञान) देने वाले गुरू अवश्य होते हैं। गुण- गुरुता से जो पूर्ण हैं दुगुणों से पूर्ण दूर है, पन्थों से शून्य है, सत्यार्थ- पथ के नेता हैं, प्राणिमात्र के कल्याण के चिंतक है, संसार सागर से पार कराने में समर्थवान है, वहीं सच्चे गुरु हैं। गुरुता की प्राप्ति सद्गुणों से होती है। गुणहीन गुरू भाव को प्राप्त नहीं होता, गुरू बनना है तो स्वगुणों की वृद्धि करो। गुरु का सानिध्य बुद्धि की उज्ज्वलता के लिए अनिवार्य अंग है। हेय- उपादेय पर बोध दाता ‘गुरु ही होते है। बिना गुरु के स्व जीवन की वक्रता का बोध नहीं होता।

पुण्यहीन को श्रेष्ठ गुरु का समागम नहीं होता। जिन्हें सच्चे गुरु प्राप्त हो गए वे जीव धन्य हैं। वे पूर्वभव के पुण्यात्मा हैं जिन्हें परमात्म पद के सत्यार्थ मार्ग दर्शक गुरु मिले। जीवन में सत्यता, सरलता, ‘सहजता की उपलब्धि हेतु सच्चे गुरु का आश्रय आवश्यक है। गुरु के अभाव में सम्पूर्ण लोक शून्य दृष्टिगोचर होता है। गुरु ही ज्ञान अंजन शलाका हैं जो मिथ्यातिमिर से आत्म रक्षा करते हैं। गुरु का जीवन शरीर के लिए नहीं सर्व कल्याण के लिए होता है। स्वपर कल्याणी दृष्टि गुरु की गुरुता को उच्चता का स्पर्श कराती है। जहाँ जगत् का सोच नहीं जाता वहाँ गुरु का सोच स्थापित होता है। गुरु दिव्य प्रकाशक है, बिना गुरु प्रकाश के तत्त्व बोध नहीं होता है और ‘तत्त्व बोध के अभाव में आत्मशोध सम्भव नहीं है। आत्मबोध और आत्म- शोध से भव्यजीव अनन्त सुखधाम मोक्ष पद को प्राप्त कर लेता है। सद्गुरु की प्राप्ति अत्यन्त दुर्लभ है। जिसे सच्चे गुरु प्राप्त हो गये उसे सत्यार्थ मार्ग- दर्शक प्रभु ही मिल गये। प्रभुत्व शक्ति की अभिव्यक्ति का मार्ग गुरु के माध्यम से ही प्राप्त होता है। गुरु प्रसाद से शान्ति, ज्ञान, चारित्रादि गुणों का भण्डार तत् क्षण ही प्राप्त होता है। यह जानकारी बाल ब्र. गुंजा दीदी एवं श्री धर्म बहादुर जैन जी ने दी|