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बिना विचारे जो करें सो पाछे पछताय – आचार्य श्री 108 सुबल सगार जी महाराज….

चंडीगढ़ दिगम्बर जैन मंदिर सेक्टर 27बी में धर्मसभा को संबोधित करते हुए गुरुदेव ने कहा कि हे भव्यात्मन् दिन-रात इस मनुष्य को संसार की असारता पर विचार-विमर्श करना चाहिए कि क्या सार है और क्या असार क्योंकि बुद्धिमान मनुष्य वही है, तो हमें क्या करने योग्य है, और क्या करने योग्य नहीं हैं, इस बात पर सोचता- विचारता तब कही जाकर अपना काम प्रारंभ करता है, बिना विचार किए कार्य प्रारम्भ करना मूर्खता है।

अध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो, इस संसार में सब कुछ असार है, वहाँ संसारी प्राणी नरक आदि चारों गतियों में परिभ्रमण करता हुआ दुख को ही प्राप्त करता है। सार भूत एक मात्र धर्म है, धर्म की शरण में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति धर्ममय हो जाता है, अर्थात् सुखी हो जाता है, संसार, शरीर, भोगों से उदासीन होता हुआ, अपने आत्मा के प्रति जागृत रहता है।

प्रत्येक वस्तु के, व्यक्ति के दो पक्ष होते है एक सकारात्मक पक्ष और दूसरा नकारात्मक पक्ष सकारात्मक दृष्टिकोण रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति स्वस्थ, सुखी व समृद्धशाली होते हैं, उसे हर बुरी से बुरी वस्तु में भी सार नजर आता है, गुरूदेव कहते है कोई भी व्यक्ति खराब नहीं होता है, उसका समय खराब होता है समय ठीक होने पर वही व्यक्ति सफलता की ऊँचाईयों को छूता है, इसलिए हमें हमेशा अपनी सोच को, विचारों को सकारात्मक रखना चाहिए।

हम विचार करें कि यह व्यक्ति रात-दिन धन कमाने में लगा है, क्यों, क्योंकि वह धन को ही सार मानता है, धन से ही उसकी सुख-सुविधाऐं की पूर्ति होती है। वह ऐसा मानता है यह मान्यता ही संसार बढ़ाने का कारण है अगर धन से ही सब कुछ प्राप्त होता तो सारे अमीर व्यक्ति सुखी होते होंगे, लेकिन ऐसा नहीं है।

संसार में सबसे ज्यादा दुखी मनुष्य अगर कोई है, तो वह है, अमीर व्यक्ति, क्यों, सारी सुख सुविधाएँ तो है उसे वह भोग नही पा रहा है उसके जीवन में और धन कमाने को लेकर जो अशांति है वह अशांति ही उसे दुखी करती है इससे उसे कई बीमारियाँ हो जाती है। ज्यादा पैसा-धन होने से बच्चे बिगड़ जाते हैं, यह भी टेंशन होता है। अगर धन को कमाने से धन बढ़ता होता तो सभी धन कमाने का ही पुरुषार्थ करते लेकिन सभी दुखी हैं ऐसा नहीं हैं।

धन तो धर्म करने से बढ़ता है भावों को अच्छा रखने से बढ़ता है धर्म रूप जीव की परणती का होना ही सार है यहाँ पर ही सुख है, शांति है, प्रेम है, वात्सल्य है, सद भवना है, यही सार है इसके अलावा सब निसार है। यह जानकारी बाल ब्र. गुंजा दीदी एवं अध्यक्ष श्री नवरत्तन जैन जी ने दी।