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धन से धन आता है – आचार्य श्री 108 सुबल सागर जी महाराज…

चड़ीगढ़ दिगम्बर जैन मंदिर में विराजमान आचार्य श्री 108 सुबलसागर जी महाराज ने कहा कि-हे भव्य आत्माओं | हमें अगर सच्चे देव, शास्त्र, गुरुओं के दर्शन का सौभाग्य मिल रहा, तो अपने आपको पुण्यशाली या भाग्यवान समझो। क्यों कि पुण्यशाली व्यक्तियों को ही यह पुण्यवान काम करने का मौका मिलता है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति जब अपना धंधा या व्यापार चालू करता है तो उसके पास जो पूँजी होती है अर्थात धन होता है उसी धन के माध्यम से वह और अधिक धन पैदा करता है। इसी प्रकार जिस व्यक्ति के पास पुण्य रूपी सम्पत्ति होगी वही व्यक्ति इस महापुण्यशाली भगवान आत्माओं के गुरुओं और दर्शन कर सकता है। क्योंकि दिगम्बर मुद्रा के धनी इस गुरुओं के दर्शन करने के लिए और उनका आशीर्वाद लेने के लिए तथा उनसे मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए हमारे देश की बड़ी-बड़ी हस्तियाँ भी जैसे-प्रधानमंत्री जी, राष्ट्रपति, राज्यपाल, विधायक आदि लोग भी उनके दर्शनो के लिए आते हैं।

गुरुदेव कहते हैं- कि कुछ लोग इस मंदिर में भी आकर अपना-अपना बाहर का काम करके चले जाते है लेकिन उनके भाव भगवान जी के दर्शन करने के भी नहीं होते हे क्योंकि उनके पास इतना पुण्य नहीं है कि वह इन तीन लोकों के नाथ जिनेन्द्र भगवान के दर्शन कर सके। सत्ता में पुण्य होने पर ही पुण्यशाली व्यक्ति ही पुण्य रूप काम कर सकता हो।

साँयकालीन चल रहीं श्री 1008 आदिनाथ भगवान का विधान भक्तामर स्तोत्र के माध्यम से दीप अर्चना में आने वाले लोग भी पुण्यशाली है क्योंकि पुण्यशाली लोगों को ही प्रभु की भक्ति, आराधना करने का मौका मिलता। शास्त्रों के वचन, गुरुओं का उपदेश सज्जन ही प्राप्त कर सकते हैं।

जैसे कोई व्यक्ति अमीर है उसके घर पर सब-कुछ फैसेलिटि है सब अच्छा चल रहा है, फिर भी अगर वह मंदिर में प्रभु या गुरुओं के दर्शन नहीं कर पा रहा है मात्र धन वैभव में ही लगा है उसी में उसको अच्छा लग रहा है। तो समझो हमारे पास अगरबत्ती है वह बहुत खुशबू वाली है, जैसे ही हमने उसको जलाया उसकी खुशबु चारों तरफ के वातावरण को प्रभावित करती है सबको अच्छी भी लगती है और वह खुशबू तो विलीन हो गई, कुछ समय में और शेष बचा तो वह कुछ राख के अंश जो उसके नीचे पड़ी हुई है। उसी प्रकार हमारे हमें पुण्य से तो हमे कुछ मिला धन-दौलत- वैभव आदि अगर हमने उसका सही उपयोग नहीं किया तो वह सब तो समय आने पर नष्ट को प्राप्त जाऐगा या हम ही नष्ट हो जायेंगे, और शेष जो बचेगा, वह है पाप। इस पाप कर्म से ही जीव इस लोक में या परलोक दुःख, कष्ट, वेदना को प्राप्त होता है अगर हमने इन सच्चे देवशास्त्र – गुरुओं के दर्शन से पुण्य नहीं कमाया तो, पाप तो संसार के सभी जीव कमा रहें हैं बस हम अपने पुण्य से इस पुण्यशाली जीवों के दर्शन, भक्ति, आराधना कर अपने जीवन को पुण्यवान बनाकर अपना कल्याण कर सकें यही मंगल भावना है। यह जानकारी संघस्थ बाल ब्र. गुंजा दीदी एवं धर्म बहादुर जैन जी न दी।