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चितकारा विश्वविद्यालय को सरकार से पीएफएएस परियोजना के लिए मिली मंजूरी…

चितकारा विश्वविद्यालय ने हिमाचल प्रदेश में नदियों और भूजल / पीने के पानी में मानव निर्मित रसायनों की उपस्थिति का अनुमान लगाने के लिए परियोजना पर सरकार द्वारा मंजूरी प्राप्त की है और साथ ही इस रिसर्च के लिए फंडिंग भी प्राप्त कर ली है। कोर रिसर्च ग्रांट स्कीम (सीआरजी), साइंस एंड इंजीनियरिंग रिसर्च बोर्ड (एसईआरबी), विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार (डीएसटी), नई दिल्ली के तहत इस परियोजना के लिए 47 लाख की ग्रांट स्वीकृत की गई है।

परियोजना का लक्ष्य उन रसायनों की जांच करना है, जिन्हें “पीएफएएस / पेर और पॉलीफ्लोरोकेलाइल पदार्थ “ या PFAS Per and Polyfluoroalkyl Substances / के रूप में जाना जाता है, जो भूजल और पीने के पानी में इन रसायनों के जोखिम मूल्यांकन के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

परियोजना के बारे में बात करते हुए, चितकारा विश्वविद्यालय, हिमाचल प्रदेश के स्कूल ऑफ़ फार्मेसी के प्रोफेसर और प्रिंसिपल, डॉ नितिन वर्मा, ने बताया कि, “भारत में, PFAS / पीएफएएस की जांच बहुत ही कम की गई है। इसलिए हमने यह पहल शुरू की है जो कि नियमों के लिए वैज्ञानिक प्रमाण के रूप में काम कर सकती है। पीएफएएस एक जहरीला कंपाउंड है जो हमारे घरों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है और विभिन्न प्रक्रियाओं और उत्पादों में इसके व्यापक उपयोग और इसके जहरीले गुणों के कारण चिंता बढ़ गई है, क्योंकि इससे जल प्रदूषण होता है। अपनी अत्यधिक स्थिरता और लंबे जीवन के कारण इन प्रदूषको से वैश्विक पर्यावरण को भारी नुकसान पहुँचता है। “इन पदार्थों की विषाक्तता क्षमता बहुत गंभीर होती है और इसका प्रभाव हमारे लिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी बहुत ही हानिकारक है । इस परियोजना के साथ, हमें प्रारंभिक डेटा प्राप्त होगा जो हमें खतरे को खत्म करने या इसे नियंत्रित करने के लिए आवश्यक उचित कार्यों की पहचान करने के लिए मदद करेगा, उन्होंने कहा।

भारत में PFAS / पीएफएएस पर शोध की कमी पर विस्तार से बताते हुए, डॉ वर्मा ने कहा, “आम लोगों को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहे इन रसायनों के हानिकारक प्रभावों से अवगत नहीं कराया जाता । इसके अलावा, हम इन रसायनो का इतना व्यापक रूप से इस्तेमाल करते हैं की इनकों बदलना भी आसन नहीं है । इसी कारण मैं और मेरी टीम इस विषय पर शोध शुरू करने के लिए प्रेरित हुई जिससे लोगों में जागरूकता लायी जा सके और कुछ विकल्प पेश किए जा सकें क्योंकि केवल शोध ही नियमों के लिए सबूत और आधार प्रदान कर सकती है।