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बत्ता परिवार द्वारा नेत्रदान: समाज के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण….

ज़ीरकपुर रॉयल एस्टेट के निवासी श्री बिशम्बर लाल बत्ता जी का 4 जुलाई को असामयिक निधन हो गया। भारत विकास परिषद, शहीद भगत सिंह शाखा, ढकोली-ज़ीरकपुर ने बत्ता जी के पुत्र श्री संजीव बत्ता और पुत्रवधू श्रीमती पूजा बत्ता जी से पिताजी के नेत्र दान करने के लिए विमर्श किया जिसे बत्ता परिवार ने तुरंत सहर्ष स्वीकार कर लिया। पी जी आई सैक्टर 12 चंडीगढ़ के आई बैंक से संपर्क किया गया जिन्होंने तुरंत अपनी टीम भेज कर तय समय के भीतर नेत्र दान सुनिश्चित किया। बत्ता परिवार द्वारा अपने दिवंगत परिजन के नेत्रदान का अत्यंत साहसिक और नेक निर्णय करुणा, परोपकार और मानवता की एक अनुकरणीय मिसाल पेश करते हुए समाज के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण है। उनके इस निस्वार्थ कदम ने न केवल अंधकार में जीवन जी रहे लोगों को ‘दृष्टि का उपहार’ दिया है, बल्कि समाज में अंगदान के प्रति फैली भ्रांतियों को दूर कर एक नई मिसाल भी कायम की है। दुःख की इस घड़ी में परिवार द्वारा लिया गया यह निर्णय उन अनगिनत लोगों के जीवन में प्रकाश लाने का कार्य करेगा, जो कॉर्नियल अंधेपन का सामना कर रहे हैं। मृत्यु के उपरांत भी दुनिया को देखने का अवसर प्रदान करना सबसे महान कार्यों में से एक है। बत्ता परिवार ने यह साबित कर दिया है कि जीवन के बाद भी अपने प्रियजनों की विरासत को जीवित रखा जा सकता है। उनका यह कदम समाज को एक सशक्त संदेश देता है कि मृत्यु के बाद शरीर को नष्ट होने देने के बजाय, किसी ज़रूरतमंद के जीवन को रोशन करने के लिए अंग और नेत्रदान करना सबसे उत्तम मार्ग है। बत्ता परिवार की इस पहल को चिकित्सा विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा व्यापक रूप से सराहा गया है।

मेडिकल विशेषज्ञों के अनुसार, कॉर्नियल ब्लाइंडनेस से पीड़ित लोगों के लिए नेत्रदान ही दृष्टि प्राप्त करने का एकमात्र विकल्प है। मृत्यु के पश्चात केवल 6 घंटों के भीतर नेत्र/कॉर्निया निकाल लिए जाने चाहिए। इस त्वरित प्रक्रिया में केवल 10 से 15 मिनट का समय लगता है और इससे मृत शरीर के चेहरे पर कोई विकृति नहीं आती है। बत्ता परिवार ने आम जनता से अपील की है कि वे नेत्रदान को एक पारिवारिक परंपरा बनाएं। किसी भी आयु, रक्त समूह या लिंग का व्यक्ति नेत्रदाता बन सकता है। समाज को इस नेक काम में आगे आना चाहिए ताकि भारत में कॉर्नियल अंधेपन की समस्या को जड़ से समाप्त किया जा सके। आइए, बत्ता परिवार के इस महान कार्य से प्रेरणा लें और मृत्यु के पश्चात भी दृष्टि का यह अनमोल उपहार देकर किसी के जीवन में उजाला लाएं।