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“पेड़-पौधों में भी प्राण हैं,धरती की शान हैं……

हर साल जून का महीना “विश्व पर्यावरण दिवस” के तौर पर मनाया जाता है ताकि हमारी धरती और देश इको-फ्रेंडली रहें और हम सब सेहतमंद जीवन जी सकें । लेकिन खासकर हमारे देश में हालात दिन-ब-दिन खराब होते जा रहे हैं। हम हमेशा हरियाली बनाए रखने के लिए पेड़ लगाने की बात करते हैं और दूसरी तरफ हम नए निर्माण कार्यों जैसे नई इमारतें,सड़कें वगैरह बनाने में व्यस्त रहते हैं और इस चक्कर में हम हरे-भरे पेड़ों को हटाना शुरू कर देते हैं। कोई कह सकता है कि क्या हमें इन नई सड़कों और इमारतों की ज़रूरत नहीं है?? बिल्कुल है, बढ़ती आबादी को एडजस्ट करने के लिए इनकी बहुत ज़रूरत है। इसलिए, हमारी वास्तविक समस्या बढ़ती हुई आबादी है जो हर गुजरते दिन तेज़ी से बढ़ रही है और इसे संभालने के लिए हमें ग्रीन कवर हटाना ही पड़ता है और अगर इसी रफ़्तार से हमारी जनसंख्या बढ़ती रही तो हमें इस धरती को हरा-भरा बनाने के लिए पेड़-पौधे लगाने के लिए ज़मीन और पानी कहाँ से मिलेगा?? क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि हम पहले ग्रीन कवर हटाते हैं और फिर गो-ग्रीन के लिए संघर्ष करते हैं?? असल में, हमारी वास्तविक समस्या बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण घटते हुए जंगल एवं जल संकट है जिसके कारण पेड़-पौधों को संरक्षण देने में कुछ बाधाएं उत्पन्न हो रहीं हैं। यह सब वातावरण के प्रति शिक्षा के अभाव के कारण भी हो रहा है। इसलिए, मेरी राय में हमें निम्नलिखित कदम युद्ध स्तर पश पर उठाने होंगे….

1.जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम का एजेंडा सबसे ऊपर होना चाहिए।

2. प्लस 2 लेवल तक सभी को मुफ्त शिक्षा दी जाए और विषेशकर पर्यावरण संरक्षण पर जोर दिया जाएं।

3. किसी भी तरहां के निर्माण कार्यों के लिए बची हुई हरियाली को हटाने की इजाज़त न दी जाए।

4. हमेशा की तरह ज़्यादा पेड़ लगाएं, विशेषकर औषधिए गुणों वाले पेड़।

इनसे हमें यक़ीनन हमें पर्यावरण को संरक्षित करने में बहुत सहायता मिलेगी।

“पेड़-पौधों से प्राण हैं,

प्रकृति ही हमारी शान है…

आओ मिलकर इन्हें बचाएं,

स्वस्थ और हरा-भरा जीवन पाएं _

किशोर कुमार विद्रोही ज़ीरकपुर… 9417781471