एक तिहाई भारतीय पशुपालक दूध की बिक्री नहीं करते, बल्कि पशुपालन से परिवार के पोषण, कृषि कार्यों और अन्य लाभों को महत्व देते हैं: सीईईडब्ल्यू…
नई दिल्ली, 20 जनवरी 2026: भारत में एक तिहाई से अधिक पशुपालक गैर-बाजारिक उपयोगों के लिए पशुपालन को प्राथमिकता देते हैं और दूध की बिक्री नहीं करते हैं। यह जानकारी काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के एक नए अध्ययन से सामने आई है। यह अध्ययन 15 राज्यों में 7,300 से अधिक पशुपालकों के बीच एक सर्वेक्षण के आधार पर किया गया है, जो देश के 91 प्रतिशत मवेशी समूहों (गाय, भैंस, और बैल सहित) को शामिल करता है। मवेशी पशुपालन 8 करोड़ से अधिक घरों की आजीविका में योगदान देता है और भारत की जीडीपी में 5 प्रतिशत का योगदान देता है।
सीईईडब्ल्यू अध्ययन, ‘कैटल एंड कन्युनिटी इन अ क्लाइमेट'(https://www.ceew.in/publications/what-is-the-impact-of-climate-change-on-india-milk-production) बताता है कि सात प्रतिशत पशुपालक दूध को छोड़कर गोबर, जुताई या उनकी बिक्री से आय जैसे अन्य लाभों के लिए पशुपालन करते हैं। पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ऐसे पशुपालक लगभग 15 प्रतिशत तक हैं। लगभग 74 प्रतिशत पशुपालक गोबर को खाद, ईंधन या बिक्री के लिए महत्व देते हैं। बहुत से पशुपालक भार खींचने और कृषि में व्यापक सहायता के लिए पशुपालन पर निर्भर हैं।
गैर-बाजारिक उपयोगों में देसी नस्ल के मवेशी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, खासकर एकीकृत कृषि प्रणालियों में। कई राज्यों – जिनमें झारखंड, पश्चिम बंगाल और हिमाचल प्रदेश शामिल हैं – में आधे से अधिक पशुपालक दूध की बिक्री की जगह पर परिवार में दूध की खपत और गोबर के उपयोग को प्राथमिकता देते हैं। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे औपचारिक डेयरी वाले राज्यों में भी 30 प्रतिशत से अधिक पशुपालक दूध के अलावा मवेशियों से मिलने वाले अन्य लाभों को प्राथमिकता देते हैं।
अभिषेक जैन, फेलो और डायरेक्टर – ग्रीन इकोनॉमी एंड इम्पैक्ट इनोवेशन, सीईईडब्ल्यू* ने कहा, “भारत के डेयरी सेक्टर की नीतियां मुख्य रूप से दूध उत्पादन पर केंद्रित हैं, जबकि जमीनी स्तर पर पशुपालन एक व्यापक आजीविका तंत्र की तरह काम करता है। इसके अलावा, जैसा कि सीईईडब्ल्यू के अध्ययन से सामने आया है, अलग-अलग राज्यों और पशुपालक श्रेणियों में पशुपालन की वास्तविकताओं, संदर्भ, चुनौतियां और प्रेरणा में काफी भिन्नताएं हैं। इस विविधतापूर्ण वास्तविकता के साथ सरकारी निवेश का तालमेल लाने के लिए एक समान डेयरी रणनीतियों की जगह पर अलग-अलग और प्रतिक्रियाशील नीतियों की दिशा में जाने की जरूरत है, जिसमें यह शामिल हो कि परिवार वास्तव में मवेशियों को किस तरह से महत्व देते हैं, उन्हें किन बाधाओं का सामना करना पड़ता है, और पशुपालन क्षेत्र के लिए जलवायु जोखिम किस तरह से विस्तार ले रहा है। इससे न केवल सरकारी हस्तक्षेपों की स्वीकार्यता सुनिश्चित होगी, जिससे बजट आवंटन की प्रभावशीलता बढ़ेगी, बल्कि देश भर में पशुपालन प्रणालियों की समृद्ध विविधता भी सुरक्षित होगी।”
पशुपालकों ने पशुपालन की विभिन्न चुनौतियों की भी जानकारियां दी। चार में से तीन पशुपालकों ने बताया कि उन्हें चारे और भूसे से संबंधित चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जो इसे राष्ट्रीय स्तर पर पशुपालन की सबसे विस्तृत बाधा बनाता है। अधिकतर राज्यों में चारा महंगा होने की समस्या है। इसके साथ, चारागाहों का सिकुड़ना और कम भूमि पर चारे की खेती इस समस्या को और अधिक बढ़ा देती है। चारे से जुड़ी प्रमुख सरकारी योजनाओं को लेकर जागरूकता की भी कमी है। लगभग 80 प्रतिशत पशुपालक साइलेज बनाने और राशन-संतुलन कार्यक्रमों जैसे उपायों के बारे में जागरूक नहीं है और इसे अपनाने की दर महज पांच प्रतिशत है। इसके विपरीत, एक चौथाई से भी कम पशुपालकों ने मवेशियों के स्वास्थ्य और प्रजनन संबंधी चुनौतियों की बात कही, जो कृत्रिम गर्भाधान, टीकाकरण और मवेशियों के लिए कृमिनाशक दवाओं की पहुंच बढ़ाने पर लगातार ध्यान देने के नीतिगत प्रयासों की सफलता दर्शाता है।
जलवायु परिवर्तन पशुपालन की चुनौतियों को बढ़ा रहा है। सीईईडब्ल्यू अध्ययन में पाया गया है कि भैंसों को पालने वालों में 54 प्रतिशत, संकर नस्ल के मवेशी पालने वालों में 50 प्रतिशत और स्वदेशी नक्ल के मवेशियों को पालने वालों में 41 प्रतिशत पशुपालकों ने जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पड़ने की जानकारी दी। इनमें मवेशियों में बीमारी के ज्यादा मामले, मृत्यु दर और गर्मी की वजह से तनाव और बेचैनी जैसी समस्याएं शामिल हैं। भले ही, स्वदेशी नस्ल के मवेशियों में जलवायु परिवर्तन को सहने की क्षमता सर्वाधिक है, लेकिन कई पशुपालकों ने बताया कि वे अपने मवेशियों में अधिक दूध देने वाले संकर नस्ल के मवेशी और भैंसों को जोड़ना चाहते हैं। यह अध्ययन ऐसे बदलावों से जलवायु परिवर्तन के प्रति पशुपालन क्षेत्र की सुभेद्यता (vulnerability) बढ़ने की चेतावनी देता है और अनुकूलन उपायों को अपनाने की आवश्यकता बताता है।
इसके अलावा, सीईईडब्ल्यू अध्ययन से सामने आया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आधे पशुपालकों के पास सिर्फ एक या दो मवेशी हैं। कम मवेशियों के साथ छोटे स्तर का यह पशुपालन पहाड़ी, मध्य और पूर्वी क्षेत्रों में अधिक पाया जाता है। पांच से अधिक मवेशियों के साथ बड़े स्तर का पशुपालन गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पंजाब जैसे राज्यों में अधिक मिलता है। कुल पशुपालकों में छोटे पशुपालकों की संख्या आधी है, लेकिन उनकी कुल दूध उत्पादन में 29 प्रतिशत और कुल दूध बिक्री में 22 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इसकी तुलना में मध्यम और बड़े पशुपालक बाजार में बिक्री के लिए उपलब्ध दूध का अधिकतर हिस्सा उत्पादित करते हैं।
*रुचिरा गोयल, प्रोग्राम एसोसिएट, सीईईडब्ल्यू* ने कहा, “सभी क्षेत्रों में पशुपालन के लिए चारे की कमी बनी हुई है। लेकिन चारे के लिए विभिन्न उपायों को अपनाने की दर काफी कम है। चारे के लिए बेहतर आपूर्ति श्रृंखलाओं के माध्यम से इन कमियों को दूर करने पर छोटे पशुपालकों को तत्काल लाभ मिल सकता है। पशुपालन क्षेत्र को जलवायु परिवर्तन के बढ़ते दबाव से सुरक्षित बनाने के लिए, बजट आवंटन को प्रजनन और टीकाकरण कार्यक्रम से आगे बढ़कर चारे के लिए विकेंद्रीकृत व स्थानीय उपायों को सहायता देनी चाहिए। ये समाधान स्थानीय जरूरतों के अनुरूप होने चाहिए, उदाहरण के लिए, सूखे और जमीन की कमी वाले क्षेत्रों में हाइड्रोपोनिक्स और अजोला की खेती को प्रोत्साहन और असम जैसे राज्यों में चारागाहों को सुरक्षित बनाना। ऐसे निवेश पशुपालन की उत्पादकता, लचीलापन और पर्यावरणीय सततशीलता में एक साथ सुधार ला सकते हैं।”
सीईईडब्ल्यू (CEEW) की रिपोर्ट का सुझाव है कि राष्ट्रीय पशुधन मिशन और संबंधित राज्य योजनाओं सहित पशुधन और संबंधित कार्यक्रम को पशुपालकों के प्रकार और क्षेत्रीय संदर्भों के अनुरूप अधिक लक्षित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। प्राथमिकताओं में अंतिम सिरे तक पशु चिकित्सा सेवाओं में सुधार, गोबर आधारित ऊर्जा व खाद जैसी गैर-दुग्ध मूल्य श्रृंखलाओं को प्रोत्साहन, और प्रजनन विकल्पों व पशु आवासों में जलवायु से जुड़े विचारों को जोड़ना शामिल है।


