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प्रभु से नाता जोड़ना सीखो – सुबल सागर जी गुरुरेव…

चंडीगढ़ दिगम्बर जैन मंदिर में विराजमान आचार्य श्री सुबलसागर जी महाराज ने धर्म सभा में भव्य जीवों को उपदेश देते हुआ कहा, नाता जोड़ना सीखों। हाँ नाता जोड़ना सीखो, अगर प्रभु से नाता जोड़ना सीख लिया तो तुम खाली कभी नहीं लोटोगे, बहुत कुछ लेकर जाओंगे। अगर सम्बंध जोड़ना नहीं सीखा है तो मात्र तुम आऐ, चले गए और कुछ नही मिला।

“मेरी तो तोसे बनी, ताते करू पुकार”

बस प्रभु से ऐसा संबंध बना लो कि फिर किसी और से संबंध न बनाना पड़े। यह संबंध ही संसार के सभी संबंधों का विनाश करने वाला है अगर हमे कहीं प्रधानमंत्री से मिलना है तो हमें कितने जुगाड़ लगाने पड़ते हैं कितने लोगों से बात करना पड़ती है तब कही जाकर उनके पास में जाकर चर्चा वार्ता हो पाती है वह भी कुछ सीमित समय के लिए इसी प्रकार अगर हमें आज इन तीन लोक के नाथ प्रभु जिनेन्द्र के सहजता से दर्शन हो रहे है तो समझ लो हमने पहले के जन्मों में कितना पुरुषार्थ किया होगा तब कहीं जाकर हमें आज दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हो पा रहा है इसकी कीमत को हम आज समझ नहीं पा रहे है कितना दुर्लभ है प्रभु से संबंध बनना। प्रभु के दर्शन के साथ ही साथ हमें आज भक्ति, पूजा करने का मौका मिला है तो समेट लो इस पुण्य को फिर मौका मिला या नहीं पता नहीं।

जिस प्रकार कोई अमीर बाप की औलाद अपने पिता की संपत्ति को नहीं समझ पाता कि पिता ने किस पुरुषार्थ से कमाई है उसको बिना प्रयोजन ही नष्ट कर देता है। उसी प्रकार हमें यह जैन धर्म मिला है इसके लिए हमने कितनी तपस्या, जप, संयम, व्रतों को धारण किया होगा, उसके फल स्वरूप हमें जैन धर्म में जन्म मिला इसके महत्त्व को न समझते हुए अपने कीमती जन्म को नष्ट कर देता है। पता नहीं फिर कभी यह मनुष्य पर्याय मिलेगी क्या नहीं। जिस प्रकार किसी समुंद्र में हमने एक सोने की अंगूठी फेंक दी जो कि बेशकीमती है उसका मिलना नामुकिन है उसी प्रकार यह बेशकीमती जैन धर्म मिलने पर भी अपनी आत्मा का कल्याण नहीं किया तो फिर इसका मिलना भी मुश्किल है। यह जानकारी ससंघ बाल ब्र.गुंजा दीदी एवं श्री धर्म बहादुर जैन जी ने दी।