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हिमाचल के गांव पहले से ही जलवायु परिवर्तन के साथ अनुकूलन के प्रयास अपना रहे हैं: सीईईडब्ल्यू व इसीमोड का अध्ययन….

शिमला, 31 अक्टूबर 2026*: मंडी, कुल्लू, सिरमौर और शिमला जिलों की अध्ययन में शामिल सभी 12 ग्राम पंचायतों में जलवायु परिवर्तन से अनुकूलन के प्रयास पहले से चल रहे हैं। ऐसे प्रयासों में बजौरा के किसानों का सेब की जगह पर अनार और जापानी फल (परसिमन) की खेती की दिशा में बढ़ने, थाना कशोगा की महिला समूहों का अपनी बावड़ियों को पुनर्जीवित करने, और शोघी में राज्य की पहली ग्राम आपदा प्रबंधन समिति के गठित करने जैसे कदम शामिल हैं।

गांवों के स्तर पर अनुकूलन के प्रयासों की यह जानकारी ‘काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर’ (CEEW) के स्वतंत्र अध्ययन “हाउ कैन हिमालयन कम्युनिटीज एंटीसिपेट रिस्क्स एंड अडैप्ट टू अ चेंजिंग क्लाइमेट? एविडेंस फ्रॉम 12 ग्राम पंचायत्स इन हिमाचल प्रदेश” से सामने आई है, जिसे इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (इसीमोड) के सहयोग से किया गया है। इस रिपोर्ट को आज शनिवार को होटल पीटरहॉफ, शिमला में आयोजित एक बहु-हितधारक संवाद में श्री दुनी चंद राणा, आईएएस, प्रबंध निदेशक – एचपीएमसी और हिमाचल प्रदेश एग्रो इंडस्ट्रीज कॉर्पोरेशन लिमिटेड, शिमला और श्री निशांत ठाकुर, अतिरिक्त सचिव, हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक सेवा (एचपीएसए), ने जारी किया। इस अवसर डॉ. अमीना महर्जन, सीनियर लाइवलीहुड्स एंड माइग्रेशन स्पेशलिस्ट, इसीमोड व आईपीसीसी की लीड ऑथर – अडैप्टेशन, इम्पैक्ट्स एंड वल्नरेबिलिटी और राजीव अहल, कार्यकारी निदेशक, हिमालयन इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफॉर्मेशन एक्शन (एचआईटीए) भी मौजूद रहे।

Report link: https://www.ceew.in/publications/how-can-himalayan-communities-anticipate-risks-and-adapt-changing-climate

सीईईडब्ल्यू के अध्ययन में स्थानीय भ्रमण (फील्ड विजिट) और केंद्रित समूह चर्चाओं के माध्यम से सामुदायिक नेतृत्व में जारी अनुकूलन प्रयासों को दर्ज किया गया है। इसमें शामिल सभी 12 पंचायतों ने जलवायु परिवर्तन के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों और अपने स्तर पर अनुकूलन के उपाय शुरू किए जाने की भी जानकारी दी।

सीईईडब्ल्यू की टीम ने ऐसे प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए स्ट्रैटेजिक फोरसाइट (strategic foresight) का पद्धति का इस्तेमाल किया, जिसमें समुदायों के साथ मिलकर इस पर चर्चा की गई कि वे जोखिमों का कैसे पहले से अनुमान लगा सकते हैं और कैसे भविष्य की आपदाएं आने से पहले उन्हें रोकने या उनके असर को घटाने के प्रयास कर सकते हैं। ऐसे ही एक और स्ट्रैटेजिक फोरसाइट अभ्यास जुलाई 2025 में आयोजित किया गया था, जिसमें 60 से अधिक सामुदायिक प्रतिनिधि, अधिकारी और एनजीओ शिमला में एकत्रित हुए थे।

स्ट्रैटेजिक फोरसाइट में वैज्ञानिक प्रमाणों, स्थानीय ज्ञान और अलग-अलग हितधारकों के विचारों को मिलाकर भविष्य की संभावित तस्वीरों का पता लगाया जाता है। इसके बाद उन कार्रवाइयों का निर्धारण होता है, जिन्हें वांछित भविष्य पाने के लिए आज से लागू किया जा सकता है। इस स्ट्रैटजिक फोरसाइट अभ्यास से 5 क्षेत्रों में 25 पूर्वाकलित अनुकूलन समाधान सामने आए हैं, यानी ऐसी कार्रवाइयां मिली हैं, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभाव सामने आने से पहले ही उसके नुकसान घटा सकते हैं।

किसान अपनी फसलें बदल रहे हैं*: शिमला के संधू में किसानों का कहना है कि प्राकृतिक खेती न केवल लाभकारी साबित हुई है, बल्कि चरम जलवायु घटनाओं (extreme climate events) का बेहतर ढंग से सामना करने में भी सक्षम है, जिसके कारण अब इसे 20 से अधिक परिवार अपना चुके हैं। कुल्लू के बजौरा में अनार के बागों पर वायरस के हमले की शुरुआत के बाद किसानों ने जापानी फल की खेती शुरू कर दी। वहीं सिरमौर के परारा में लोगों ने एकीकृत कृषि को अपनाया है, जिसमें लहसुन को सेब की खास किस्मों के साथ उगाया जाता है।

*गांव अपने प्राकृतिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित कर रहे हैं*: सिरमौर के थाना कशोगा में कभी 35 बारहमासी बावड़ियां, प्राकृतिक जल स्रोतों से भरने वाले कुंड, होती थीं, लेकिन अब सिर्फ 10 ही बची हैं। पीपल्स साइंस इंस्टीट्यूट और सेंटर फॉर बिजनेस एंड एंटरप्रेन्योरियल डेवलपमेंट से प्रशिक्षण लेने के बाद महिला समूह इस बावड़ियों को पुनर्जीवित करने में लगी हैं। वे हर महीने इन बावड़ियों की सफाई करती हैं, जिसका नतीजा है कि अब तक 5 बावड़ियां पुनर्जीवित हो चुकी हैं और पांच-छह बावड़ियों को पुनर्जीवित करने का काम जारी है।

*पंचायतें आपदाओं के लिए खुद को संगठित कर रही हैं*: शिमला के नजदीक की शोघी पंचायत ने 2023 के भूस्खलन और बाढ़ के बाद एनजीओ एड्रा इंडिया के साथ मिलकर अपनी ग्राम आपदा प्रबंधन समिति बनाई। इसके बाद वहां के ग्रामीणों को प्राथमिक चिकित्सा और सुरक्षित निकासी का प्रशिक्षण दिया गया है। अब तक बहुत ही कम गांवों में ऐसी समितियां बन पाई हैं।

इस अध्ययन में सहयोगी रहे हिमाचल प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एचपीएसडीएमए) ने 2026 में आपदा रक्षक योजना शुरू की है। सीईईडब्ल्यू के अध्ययन में पंचायत स्तर पर आपदा प्रबंधन समितियों को प्रशिक्षण देने और सीईईडब्ल्यू के ग्राम पंचायत क्लाइमेट रेजिलिएंस कैलेंडर समेत जरूरी संसाधन उपलब्ध कराने का सुझाव दिया गया है। इसके साथ, इन समाधानों को मदद देने वाली 30 से अधिक मौजूदा नीतियों और योजनाओं का उपयोग करके ग्राम नियोजन को ग्राम पंचायत विकास योजनाओं से जोड़ने का भी सुझाव दिया गया है।

अध्ययन के सुझाव के अनुसार, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण एक फोरसाइट सेल बना सकता है, और आपदा प्रबंधन प्राधिकरण पूर्वानुमान-आधारित फाइनेंसिंग (forecast-based financing) अपना सकते हैं, जिसके तहत पूर्व निर्धारित जोखिम सीमा के पार होते ही फंड जारी कर दिया जाता है।

*श्री दुनी चंद राणा, आईएएस, प्रबंध निदेशक, एचपीएमसी एवं एच.पी. एग्रो इंडस्ट्रीज कॉर्पोरेशन लिमिटेड, शिमला*, ने कहा, “सीईईडब्ल्यू (CEEW) का यह शोध पूरे हिमाचल प्रदेश के जमीनी आंकड़ों पर आधारित है। इसमें यह दिखाया गया है कि ग्राम पंचायतें किस प्रकार चरम मौसमी घटनाओं का सामना कर रही हैं और उनकी सहनशीलता (रिजिलियंस) को मजबूत करने के क्या उपाय हैं। राज्य में लगातार बढ़ रही अचानक बाढ़ (फ्लैश फ्लड), बादल फटने और भारी बारिश की घटनाओं से जनजीवन, आवश्यक बुनियादी ढांचा, बागवानी, आपूर्ति श्रृंखला और पर्यटन उद्योग बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। बढ़ते तापमान और बर्फबारी के बदलते पैटर्न के कारण सेब के खिलने, तुड़ाई और फल की गुणवत्ता पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है, जिससे स्थानीय लोगों की आजीविका पर संकट मंडरा रहा है। ये आपस में जुड़े जोखिम इस बात को रेखांकित करते हैं कि विकास योजनाओं में पूर्व-अनुमानित कार्रवाइयों और रणनीतिक दूरदर्शिता को शामिल करना बहुत जरूरी है, ताकि हमारा बुनियादी ढांचा, व्यवसाय और स्थानीय समुदाय भविष्य की जलवायु चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए बेहतर ढंग से तैयार हो सकें।”

*श्री निशांत ठाकुर, एचपीएएस, अतिरिक्त सचिव-राजस्व, आपदा प्रबंधन, एचपीएसडीएमए*, ने कहा, “हिमाचल प्रदेश में हाल ही में आई बाढ़ और भूस्खलन के कारण 20,000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है, जिसने आपदा तैयारियों को और अधिक मजबूत बनाने की जरूरत को रेखांकित किया है। राज्य जोखिमों की पहचान करने और राहत व बचाव कार्यों में सुधार के लिए जीआईएस (GIS), त्वरित घटना रिपोर्टिंग प्रणालियों और आधुनिक तकनीकों का सहारा ले रहा है। हमारा मुख्य उद्देश्य अब केवल आपदा के बाद की प्रतिक्रिया करने की जगह पर पूर्व सक्रिय तैयारियों (प्रो-एक्टिव) पर ध्यान केंद्रित करना है। इसके तहत शोध संस्थानों के सहयोग से ग्राम पंचायत स्तर पर आपदा प्रबंधन योजनाएं तैयार की जा रही हैं। किसी भी आपात स्थिति में स्थानीय नागरिक ही सबसे पहले राहत कार्यों को शुरू करते हैं, इसलिए स्थानीय स्तर पर आपदा तैयारियों को मजबूत करना ही आत्मनिर्भरता और सुरक्षा की कुंजी है।”

*श्रेया वधावन, प्रोग्राम लीड व अध्ययन में सह-लेखक, सीईईडब्ल्यू*, ने कहा, “हमने जिन प्रयासों को दर्ज किया है, उन सभी में एक ही पैटर्न दिखता है: एक स्थानीय चैम्पियन, जैसे कोई किसान, महिला समूह या ग्राम समिति, और उन्हें सहायता देने वाला कोई कृषि विज्ञान केंद्र, कोई एनजीओ या कोई सरकारी योजना की सहायता। जहां ये दोनों मौजूद होते हैं, वहां पर असर कई गुना बढ़ जाता है। अगला कदम ऐसी जोड़ियों को विस्तार देना होना चाहिए, ताकि पंचायतें किसी खतरे के आपदा बनने से पहले ही उसे रोकने या उनके असर को घटाने वाले कदम उठा सकें।”

*डॉ. अमीना महर्जन, सीनियर लाइवलीहुड्स एंड माइग्रेशन स्पेशलिस्ट, इसीमोड*, ने कहा, “हिंदू कुश हिमालय वैश्विक औसत से ज्यादा तेजी से गर्म हो रहा है, और इसके पहाड़ी गांवों में जो कुछ होता है, उसका असर निचले इलाकों में रहने वाले 1.9 अरब लोगों पर पड़ता है। हिमाचल प्रदेश की ये ग्राम पंचायतें दिखाती हैं कि अनुकूलन की शुरुआत ग्रामीणों के माध्यम से हो सकती है, और नेपाल, बांग्लादेश व भूटान का अनुभव दिखाता है कि जलवायु अनुकूलन व आपदा प्रबंधन में फोरसाइट को शामिल करना संभव है। हमें उम्मीद है कि ये साक्ष्य सभी क्षेत्र तक पहुंचेंगे।”

*हिमालयन इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफॉर्मेटिव एक्शन (HITA) के कार्यकारी निदेशक श्री राजीव अहल* ने कहा, “जलवायु अनुकूलन (क्लाइमेट एडेप्टेशन) के लिए राज्यों, जिलों और गांवों को मिलकर काम करने की जरूरत है, ताकि जोखिमों को चिन्हित किया जा सके, त्वरित प्रतिक्रिया की योजना बनाई जा सके और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल रणनीतियों को लागू किया जा सके। जैसे-जैसे भौगोलिक स्थितियां, आजीविका और जलवायु के प्रभाव बदल रहे हैं, राज्य-स्तरीय रणनीतियों को जमीनी स्तर से ही तैयार किया जाना चाहिए। इसके तहत जमीनी वास्तविकताओं और स्थानीय अनुभवों को राज्य व राष्ट्रीय स्तर की योजनाओं में शामिल करना आवश्यक है। इससे हमें आज की जमीनी वास्तविकताओं के आधार पर भविष्य की विभिन्न परिस्थितियों का अनुमान लगाने और उनके लिए बेहतर योजनाएं बनाने में मदद मिलेगी। हिमाचल प्रदेश इस पहल को 100 से अधिक गांवों तक विस्तारित करके हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में एक उत्कृष्ट उदाहरण पेश कर सकता है।”

Read the full study released at the event:

*How Can Himalayan Communities Anticipate Risks and Adapt to a Changing Climate? Evidence from 12 gram panchayats in Himachal Pradesh*, by Ahana Chatterjee, Meet Kumar, Srishti Mandal, Taveri Rajkhowa and Shreya Wadhawan, here https://www.ceew.in/publications/how-can-himalayan-communities-anticipate-risks-and-adapt-changing-climate

_Note: The study combines a literature review, field visits and focus group discussions in 12 gram panchayats, selected through purposive sampling across four districts, a two-day multi-stakeholder consultation in Shimla in July 2025, and two training-cum-consultation workshops in November 2025. Findings describe these panchayats and are not representative of Himachal Pradesh as a whole. Impacts and adaptation practices are community-reported, literature-supported, and validated through departmental consultations, and the 25 solutions are outputs of a foresight exercise, not estimates of avoided loss._