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द इकोनॉमिक डीएनए ऑफ भारत’ — डॉ. मोनिका बी. सूद की पुस्तक ‘विकसित भारत-2047’ के लिए भारत की सभ्यतागत आर्थिक सोच को समझाती है….

चंडीगढ़, 28 अगस्त 2026: क्या भारत की असाधारण रूप से टिके रहने, फिर से खड़े होने, खुद को नए रूप में ढालने और आगे बढ़ने की क्षमता केवल इतिहास का परिणाम है, या इसके पीछे भारत की सभ्यता में छिपी कोई गहरी सोच और व्यवस्था है? यही मुख्य विचार डॉ. मोनिका बी. सूद द्वारा लिखित ‘द इकोनॉमिक डीएनए ऑफ भारत’ पुस्तक का है, जिसे साइमन एंड शूस्टर इंडिया ने प्रकाशित किया है।

यह पुस्तक जीडीपी, बजट, राजकोषीय घाटे और विकास दर जैसी पारंपरिक आर्थिक बातों से आगे बढ़कर एक बुनियादी सवाल को समझने का प्रयास करती है—भारत को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने वाली चीजें क्या रही हैं और आज भी क्या हैं?

अपनी पुस्तक के बारे में जानकारी देते हुए डॉ. मोनिका बी. सूद, जो आयुर्वेद विशेषज्ञ, उद्यमी, राजनीतिक टिप्पणीकार और विचारक हैं, ने बताया कि उनकी पुस्तक में दस अध्याय हैं। इन अध्यायों में उन्होंने भारत के सभ्यतागत अतीत को उसकी आर्थिक वर्तमान स्थिति और भविष्य से जोड़ा है। पुस्तक वर्ष 2047 तक भारत के परिवर्तन को समझने के लिए एक अलग और विशेष बौद्धिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।

डॉ. सूद ने कहा कि डीएनए केवल एक रूपक नहीं है, बल्कि यह वह बौद्धिक ढांचा है जिसके माध्यम से मैंने भारत की आर्थिक यात्रा को समझने का प्रयास किया है। सरकारें, तकनीक, मुद्राएं, बाजार और आर्थिक मॉडल बदल सकते हैं, लेकिन भारत का सभ्यतागत डीएनए बना रहता है।

डॉ. सूद के अनुसार, इस स्थायी डीएनए को तीन प्रमुख विचारों से समझा जा सकता है—डी यानी धर्म, एन यानी निर्माण और ए यानी आत्मनिर्भरता। ये तीनों मूल्य, राष्ट्र निर्माण और आत्मनिर्भरता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।

इस पुस्तक की भूमिका केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लिखी है। पुस्तक को कई प्रतिष्ठित सार्वजनिक व्यक्तियों के संदेश और समर्थन भी प्राप्त हुए हैं, जिनमें पंजाब के माननीय राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया, केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू, केंद्रीय पंचायती राज, डेयरी और पशुपालन मंत्री प्रो. एस.पी. सिंह बघेल और जतिंदर पाल मल्होत्रा सहित अन्य प्रमुख लोग शामिल हैं।

डॉ. सूद ने कहा कि पुस्तक यह बताती है कि उद्यम, ज्ञान, समुदाय, मुश्किल परिस्थितियों से उबरने की क्षमता, नवाचार, समावेश, नैतिक समृद्धि और रणनीतिक स्वायत्तता ने भारत के इतिहास में बार-बार नए रूप अपनाए हैं।

उन्होंने कहा कि प्राचीन भारत में ये प्रवृत्तियां समुद्री व्यापार और वाणिज्य, कृषि, चिकित्सा, ज्ञान, शासन और सामुदायिक नेटवर्क जैसी उन्नत व्यवस्थाओं के माध्यम से दिखाई देती थीं।

आज का भारत इन्हीं प्रवृत्तियों को डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे, उद्यमिता, स्वदेशी विनिर्माण, तकनीकी नवाचार, वित्तीय समावेशन, रक्षा क्षमताओं, स्टार्ट-अप और रणनीतिक स्वायत्तता के माध्यम से व्यक्त करता है।

पुस्तक में अर्थव्यवस्था को राष्ट्रीय मनोविज्ञान के रूप में भी समझने का प्रयास किया गया है। डॉ. सूद का कहना है कि अर्थव्यवस्थाएं केवल पूंजी, श्रम, उत्पादकता और सरकारी नीतियों से नहीं बनतीं, बल्कि मानवीय व्यवहार से भी प्रभावित होती हैं—समाज किन चीजों को महत्व देता है, कितना बचाता है, कितना खर्च करता है, क्या बनाता है, क्या साझा करता है, नए प्रयोग कैसे करता है और समृद्धि को किस रूप में देखता है।

इसी कारण यह पुस्तक अर्थशास्त्र, इतिहास, मनोविज्ञान, सभ्यता, सार्वजनिक नीति और भविष्य के अध्ययन जैसे विभिन्न क्षेत्रों के बीच एक अनूठा संबंध प्रस्तुत करती है। यह भारत को केवल एक आर्थिक व्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत आर्थिक व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत करती है और ‘विकसित भारत 2047’ की दिशा में उसकी यात्रा को समझने का एक ढांचा देती है।

डॉ. सूद के लिए इस विषय की खोज की जड़ें उनके व्यक्तिगत जीवन से भी जुड़ी हैं। वह अपनी अर्थव्यवस्था, समाज, राष्ट्रीय विकास और दुनिया में भारत की भूमिका को लेकर जिज्ञासा का काफी श्रेय अपने दिवंगत पिता परमजीत कुमार के बौद्धिक प्रभाव को देती हैं। उनके विचारों और लेखन ने उन्हें तत्काल होने वाली आर्थिक घटनाओं से आगे बढ़कर उन गहरी शक्तियों को समझने के लिए प्रेरित किया, जो देशों और समाजों को आकार देती हैं।

उनके पिता की बौद्धिक विरासत में फिस्कल क्वांटम और इंटीग्रल कैपिटलिज्म जैसे विचार भी शामिल थे। ये विचार भारत के आर्थिक स्वभाव को समझने की डॉ. सूद की अपनी खोज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बने।

अंत में डॉ. सूद ने कहा कि जीडीपी हमें बता सकता है कि भारत कितनी तेजी से बढ़ रहा है। आर्थिक डीएनए यह समझने का प्रयास करता है कि भारत बार-बार आगे बढ़ने का रास्ता आखिर कैसे खोज लेता है।