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मल्हार उत्सव का भव्य समापन — रागों की विविध छटाओं से सजी यादगार सांगीतिक संध्या….

चंडीगढ़: प्राचीन कला केंद्र द्वारा आयोजित तीन दिवसीय ‘मल्हार उत्सव’ का भव्य समापन रानी लक्ष्मी बाई हॉल, सेक्टर-38, चंडीगढ़ में हुआ। उत्सव की अंतिम संध्या में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रतिष्ठित कलाकारों ने अपनी उत्कृष्ट प्रस्तुतियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। समापन दिवस की प्रस्तुति मुंबई की प्रख्यात शास्त्रीय गायिका रुचिरा केदार संकुमय देबनाथ ने दी।

संकुमय देबनाथ ने राग मियाँ की मल्हार से अपनी प्रस्तुति का आरंभ किया और अपनी सशक्त एवं भावपूर्ण गायकी से श्रोताओं को प्रभावित किया। इसके बाद उन्होंने राग रामदासी मल्हार प्रस्तुत किया, जिसमें राग के विशिष्ट स्वरूप को अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम के अंत में उन्होंने समयानुसार सूरदासी मल्हार अथवा भजन की प्रस्तुति से संध्या को भावपूर्ण विराम दिया। तीन दिवसीय ‘मल्हार उत्सव’ के दौरान विभिन्न कलाकारों ने मल्हार परिवार के रागों के माध्यम से वर्षा ऋतु की विविध भाव-छवियों को सुरों में पिरोया। कभी मेघों की गरज, कभी सावन की फुहार और कभी विरह एवं भक्ति के भाव—इन सभी रंगों ने उत्सव को एक विशिष्ट सांगीतिक पहचान प्रदान की।

समापन दिवस की दूसरी प्रस्तुति रुचिरा केदार ने राग सूर मल्हार से किया। उन्होंने विलंबित तीनताल में बंदिश “गरजत आई” प्रस्तुत कर राग के गंभीर एवं भावपूर्ण स्वरूप को प्रभावशाली ढंग से उकेरा। इसके पश्चात उन्होंने अद्धा तीनताल में “बरखा ऋतु बैरी हमारे” तथा द्रुत तीनताल में “बदरवा बरसन को आए” प्रस्तुत किया। उनकी सधी हुई आवाज़, रागदारी की गहराई और सुरों पर विलक्षण पकड़ ने वातावरण को वर्षा ऋतु की मधुर अनुभूति से भर दिया। श्रोताओं ने उनकी प्रस्तुति की भरपूर सराहना की।

इसके बाद उन्होंने “सावन—धीरे धीरे सावन झर लगी” की भावपूर्ण प्रस्तुति से समां बांध दिया। उनकी गायकी में शास्त्रीय संगीत की गंभीरता के साथ सावन की रिमझिम, प्रकृति की कोमलता और विरह के भावों का सुंदर समन्वय देखने को मिला। अपनी प्रस्तुति के समापन पर रुचिरा केदार ने राग भैरवी में भावपूर्ण भजन “माई संगवारे रंग राँची” प्रस्तुत किया। भैरवी के मधुर एवं भावस्पर्शी स्वरों में सजी इस प्रस्तुति ने पूरी सांगीतिक संध्या को भक्तिरस से भर दिया। उनके भावपूर्ण गायन और शब्दों की मार्मिक अभिव्यक्ति ने श्रोताओं को गहराई से प्रभावित किया और तालियों की गूंज के साथ उनकी प्रस्तुति का स्वागत किया गया

तीन दिवसीय ‘मल्हार उत्सव’ के दौरान विभिन्न कलाकारों ने मल्हार परिवार के रागों के माध्यम से वर्षा ऋतु की विविध भाव-छवियों को सुरों में पिरोया। कभी मेघों की गरज, कभी सावन की फुहार और कभी विरह एवं भक्ति के भाव—इन सभी रंगों ने उत्सव को एक विशिष्ट सांगीतिक पहचान प्रदान की।

प्राचीन कला केंद्र द्वारा आयोजित इस उत्सव ने एक बार फिर भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा और ऋतु-आधारित रागों की अद्भुत सांगीतिक विरासत को चंडीगढ़ के संगीतप्रेमी श्रोताओं तक पहुंचाया। उत्सव की अंतिम संध्या भी दर्शकों की उत्साहपूर्ण उपस्थिति और कलाकारों की शानदार प्रस्तुतियों के साथ एक यादगार सांगीतिक अनुभव बन गई।

इस अवसर पर प्राचीन कला केंद्र की रजिस्ट्रार एवं सचिव डॉ. शोभा कोसर तथा श्री सजल कोसर की गरिमामयी उपस्थिति रही। उन्होंने कलाकारों की प्रस्तुतियों का आनंद लिया और कार्यक्रम की सफलता के लिए कलाकारों एवं आयोजन से जुड़े सभी सदस्यों को बधाई दी। उनकी उपस्थिति ने समारोह की गरिमा को और बढ़ाया। कार्यक्रम के अंत में प्राचीन कला केंद्र की ओर से दोनों कलाकारों एवं उनके साथ संगत करने वाले कलाकारों को उत्तरीय एवं स्मृति-चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया।