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रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं के ज़ोन तय करते समय केवल शहर की सुंदरता नहीं, बल्कि उनकी रोज़ी-रोटी का भी ध्यान रखा जाए: सामाजिक नीति शोधकर्ता नज़म धवन….

चंडीगढ़, 6 अगस्त 2026: सामाजिक नीति की शोधकर्ता नज़म धवन ने मीडिया में जारी एक वक्तव्य में कहा है कि चंडीगढ़ में रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं के लिए ज़ोन तय करने की प्रक्रिया में मानवीय सोच अपनाई जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि शहर के विकास के साथ-साथ लोगों के रोजगार और आजीविका के अधिकार का भी पूरा सम्मान होना चाहिए।

चंडीगढ़ नगर निगम द्वारा सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार स्ट्रीट वेंडरों के ज़ोन तय करने की प्रक्रिया पर प्रतिक्रिया देते हुए धवन ने कहा कि शहर में व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है, लेकिन ऐसा करते समय उन छोटे विक्रेताओं को उन जगहों से नहीं हटाना चाहिए जहाँ से उनकी अच्छी कमाई होती है।

उन्होंने कहा कि स्ट्रीट वेंडिंग को व्यवस्थित करने का उद्देश्य शहर की व्यवस्था और हजारों परिवारों की रोजी-रोटी—दोनों की रक्षा करना होना चाहिए। यदि विक्रेताओं को ऐसी जगह भेज दिया जाए जहाँ ग्राहक ही न आएँ, तो इसे सही पुनर्वास नहीं कहा जा सकता।

नाज़म धवन ने नर्मदा बांध परियोजना का उदाहरण देते हुए कहा कि बिना अच्छे विकल्प दिए लोगों को हटाना भारत के विकास मॉडल की एक पुरानी समस्या रही है।

उन्होंने कहा कि यदि किसी रेहड़ी वाले को भीड़भाड़ वाले बाजार से हटाकर ऐसी जगह भेज दिया जाए जहाँ ग्राहक न हों, तो उसकी आर्थिक स्थिति भी उसी तरह प्रभावित होती है जैसे किसी विस्थापित समुदाय की। विकास का मतलब गरीबों को मुख्यधारा से बाहर करना नहीं होना चाहिए।

धवन ने बताया कि ऑस्ट्रेलिया में मास्टर ऑफ सोशल वर्क की पढ़ाई के दौरान उन्होंने देखा कि मेलबर्न और सिडनी जैसे शहरों में रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं को शहर की योजना का हिस्सा बनाया जाता है, उन्हें अतिक्रमण मानकर हटाया नहीं जाता।

उन्होंने कहा कि दुनिया के बड़े शहर मानते हैं कि स्ट्रीट वेंडर शहर की रौनक बढ़ाते हैं। इसलिए उन्हें किनारे करने के बजाय आसान लाइसेंस व्यवस्था, ग्राहकों की पहुँच वाली तय जगहें और बेहतर नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

धवन ने चंडीगढ़ की टाउन वेंडिंग कमेटियों से अपील की कि वे केवल विक्रेताओं को एक जगह से दूसरी जगह भेजने तक सीमित न रहें। इसके बजाय ऐसे वेंडिंग जोन बनाए जाएँ जहाँ छाया वाले स्टॉल, साफ़ पीने का पानी, कूड़ा प्रबंधन, शौचालय जैसी सुविधाएँ हों और जहाँ उन्हें वास्तव में अच्छा व्यापार करने का अवसर मिले।

उन्होंने कहा कि वास्तविक और टिकाऊ विकास वही है जो समाज के सबसे कमजोर लोगों की गरिमा और रोज़ी-रोटी की रक्षा करे। शहर की सुंदरता और आर्थिक न्याय—दोनों को साथ लेकर चलना चाहिए, किसी एक की कीमत पर नहीं।