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कभी गोल्ड स्टैंडर्ड भारतीय स्टैटिस्टिकल डेटा अब शक के दायरे में….

पंडित नेहरू को 1947 में अंग्रेज़ों द्वारा बर्बाद की जा चुकी एक बेहद खराब अर्थव्यवस्था विरासत में मिली। इसके साथ उनके सामने असंख्य राजनीतिक चुनौतियां मुंह बाए खड़ीं थी। 500 से ज़्यादा रियासतों को मिलाकर एक डेमोक्रेटिक, सेक्युलर भारत बनाने का बहुत बड़ा पॉलिटिकल प्रोजेक्ट सामने था। इन बड़ी चुनौतियों के बावजूद, उनकी सरकार ने नवनिर्मित देश के लिए विकास की नीतियां बनाने से ध्यान कभी नहीं हटाया। उन्होंने सैकड़ों वर्ल्ड क्लास स्वायत्त संस्थान बनाए, जिनके कारण भारत को दुनियाभर से भरपूर सम्मान और प्रंशसा मिली।

भारत के आधिकारिक सांख्यिकीय सिस्टम (आफिशियल स्टैटिस्टिकल सिस्टम) की स्थापना भी ऐसा ही एक महत्वपूर्ण कदम था, जिसे सन 2014 से पहले विश्व के सबसे भरोसेमंद संस्थानों में से एक के तौर पर जाना जाता था। भारत में डेटा इकट्ठा करने के लिए पहले पहल 1950 में पी.सी. महालनोबिस की देखरेख में नेशनल सैंपल सर्वे (NSS) की स्थापना की गई। बाद में 1970 में इसका नाम NSSO रखा गया। सेंट्रल स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट 1951 में शुरू किया गया था, जिसे बाद में सेंट्रल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (CSO) नाम दिया गया। सन 2005 में नेशनल स्टैटिस्टिकल कमीशन (NSC) बनाया गया था। यह कमीशन स्टैटिस्टिक्स और प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन मिनिस्ट्री के तहत 2019 तक सलाहकार के रूप में काम करता रहा।

भारत के स्टैटिस्टिकल सिस्टम ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित बुनियादी सिद्धांतों को बहुत पहले ही उस वक्त अपना लिया था, जब बहुत से विकसित देश ऐसा करने के बारे में केवल सोच रहे थे। यह कोई हैरानी की बात नहीं है कि 1950 से 2014 तक भारत के स्टैटिस्टिकल डेटा की प्रतिष्ठा चोटी पर थी और सारी दुनिया पारदर्शी, सटीक और भरोसेमंद डेटा संग्रहण के लिए इसकी जम कर तारीफ़ किया करती थी। प्रसिद्ध वैश्विक संस्थानों जैसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), वर्ल्ड बैंक, विश्व विख्यात अर्थशास्त्री, यूनिवर्सिटी और रिसर्च इंस्टीट्यूटस भारत के स्टैटिस्टिकल सिस्टम को “गोल्ड स्टैंडर्ड” बताया करते थे।

वर्ल्ड बैंक ने भारत के स्टैटिस्टिकल सिस्टम को 2015 तक लगातार एक ऊंचे पायदान पर रखा। भारत के स्टैटिस्टिकल संस्थानों द्वारा रोज़गार, स्वास्थ्य, पूंजी निवेश, खपत (कंजम्प्शन) और अनौपचारिक उद्यमों पर किए गए सर्वेक्षणों को गरीबी और असमानता को मापने के लिए ग्लोबल बेंचमार्क के तौर पर मान्यता मिली।2011-12 में कंजम्प्शन पर किए गए सर्वेक्षण का इस्तेमाल वर्ल्ड बैंक ने वैश्विक गरीबी रेखा को नई परिभाषा देने के लिए किया था। NSSO का 2011-12 का 68वां राउंड का स्वास्थ्य और रुग्णता सर्वेक्षण (हेल्थ और मॉर्बिडिटी सर्वे) आज भी निम्न और मध्यम आय वाले देशों में स्वास्थ्य के ऊपर हो रहे उनके खर्चे के कारण उनकी मुश्किलों की जानकारी प्राप्त करने के लिए एक गोल्ड स्टैंडर्ड माना जाता है।

साल 2014 तक सभी सरकारें, जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी की NDA सरकार भी शामिल है, स्टैटिस्टिकल संस्थानों को पंडित नेहरू के बनाए नियमों के अनुसार चलाती रहीं और उनकी संस्थागत स्वायतत्ता, पद्धतिगत उत्कृष्टता (मेथडोलॉजिकल एक्सीलेंस) और पारदर्शिता कायम रखने के अधिकार में किसी ने व्यवधान नहीं डाला। किसी भी सरकार ने कभी भी डेटा में हेराफेरी करने या उसे छिपाने की कोशिश नहीं की, भले ही यह डेटा राजनीतिक रूप से उनके लिए असुविधाजनक और नुकसानदायक क्यों न रहा हो।

लेकिन 2014 के बाद यह सारा अच्छा काम उलट पलट हो गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे बड़े-बड़े वादों के दम पर सत्ता में आए, जिन्हें वे कभी पूरा नहीं कर पाए। उन्होंने हर भारतीय को 15 लाख रुपये देने, युवाओं को हर साल 2 करोड़ नौकरियां देने, किसानों की आय दोगुनी करने, हर परिवार को पक्का घर देने और देश मे 100 नए स्मार्ट शहर बनाने, सभी वर्गों का तेज़ी से विकास करने और न जाने क्या क्या करने का वादा किया था। लेकिन पिछले 11 सालों में सरकार इन वादों को पूरा करने के लिए शुरुआती काम भी नहीं कर पाई है। इसके उलट मोदी सरकार ने अच्छी भली अर्थव्यवस्था को ही तहस-नहस कर के रख दिया है, जिसके कारण आज भारत 190 देशों में प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में दुनिया में 142वें नंबर पर है। युवाओं की मौजूदा बेरोज़गारी पिछले कई सालों में सबसे ज़्यादा है। लोग बढ़ती कीमतों और घटती आमदन की दोहरी मार झेल रहे हैं। छोटे एवं मीडियम उद्योग और व्यापार गंभीर संकट में हैं और कृषि क्षेत्र अपने अस्तित्व के संकट का सामना कर रहा है। इस सरकार ने अनौपचारिक सेक्टर को लगभग खत्म सा कर दिया है। बढ़ती हुई आर्थिक और सामाजिक असमानताएं देश में गहरी दरारें पैदा कर रही हैं। महिलाओं, दलितों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ अपराध अब से पहले इतने कभी नहीं हुए थे। दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों की लिस्ट में भारत के 13 शहर आते हैं। दिल्ली लगातार छठे साल दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी बनी हुई है। भूख की मार गरीबों पर बड़े ज़ोर से पड़ने लगी है, क्योंकि भारत अब 123 देशों के ग्लोबल हंगर इंडेक्स पर 102वें नंबर पर है। संक्षेप में कहा जाए तो कि मोदी सरकार गवर्नेंस के सभी पैमानों पर बुरी तरह फेल हो चुकी है।

इतने खराब रिकॉर्ड होने के कारण यह डरपोक और कायर सरकार असलियत का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है। इसलिए यह अपने आप को बदनामी और जिल्लत से बचाने के लिए अपने खराब प्रदर्शन के डेटा में हेरफेर करने या उसे छिपाने की हर सम्भव कोशिश कर रही है।

जीडीपी डेटा में हेरफेर करने के लिए पहली कवायद 2015 में की गई थी, जब स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन मंत्रालय ने जीडीपी के बेस ईयर को 2004-05 से बदल कर 2011-12 कर दिया था। इसने ऐमसीऐ -21 कॉर्पोरेट फाइलिंग जैसे डेटा के नए स्रोत पेश किए, जिससे 2014 के बाद के समय के लिए जीडीपी के अनुमान एकदम से बढ़ गए, जबकि UPA के समय के सही आंकड़े कम हो गए। पूर्व मुख्य आथिर्क सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम के विश्लेषण के अनुसार, इस वजह से मोदी सरकार के समय के जीडीपी ग्रोथ के सालाना आंकड़े कम से कम 2.5 परसेंटेज पॉइंट बढ़ गए। परन्तु केवल इतने से ही मन नहीं भरा। GDP डेटा को और बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के लिए 2018 में जीडीपी की गणना करने की कार्यप्रणाली (मेथडोलॉजी) में फिर से हेरफेर किया गया। इसी वजह से दुनिया भर में सही सोच रखने वाले अर्थशास्त्री मोदी सरकार द्वारा जारी जीडीपी के आंकड़ों को गहरे शक की नज़रों से देखते हैं।

साल 2019 में, नेशनल स्टैटिस्टिकल कमीशन (NSC) के एक्टिंग चेयरमैन पी.सी. मोहनन ने सरकार पर डेटा जारी करने में बेवजह दखल देने का आरोप लगाते हुए उसके विरोध में इस्तीफा दे दिया। NSC के दो और सदस्यों ने भी इसी विरोध में इस्तीफा दे दिया है।

सरकार द्वारा NSSO द्वारा समय-समय पर किए जाने वाले लेबर फोर्स सर्वे को रोका जाना एक और ऐसी घटना थी, जिससे भारत के डेटा सिस्टम पर दुनिया का भरोसा कम हुआ। इस सर्वेक्षण में दिखाया गया था कि उस समय बेरोज़गारी की दर पिछले 45 सालों में सबसे ज़्यादा थी। सरकार ने महीनों इस रिपोर्ट को रोके रखा, जब तक 2019 के आम चुनावों के नतीजे घोषित नहीं हो गए। इसी तरह, 2017-18 का घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण (हाउसहोल्ड कंज्यूमर एक्सपेंडिचर सर्वे), जिसमें ग्रामीण खपत में लगातार कमी और बढ़ती असमानता का पता चला था, को भी रोक दिया गया। 2022-23 की इसी तरह की एक रिपोर्ट को आंशिक रूप से ही जारी किया गया।

2019 में, सरकार ने मनमाने ढंग से NSSO और CSO को मिलाकर नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (NSO) बना दिया। इस बिना सोचे-समझे किए गए मर्जर से NSC का दबदबा कम हो गया, जिससे डेटा कलेक्शन पर भरोसा और कम हो गया। भारत का बड़ा मीडिया इन गंभीर मुद्दों पर चुप्पी साधे रहा लेकिन बाकी दुनिया भारत सरकार के इन अनैतिक कृत्यों पर ध्यान दे रही थी।

भारत के GDP आंकड़ों पर शक जताते हुए, IMF के मानकों और संहिताओं के वार्षिक अवलोकन (AOSC) में भारत के नैशनल अकाउंट्स को निम्नस्तरीय ‘सी ग्रेड’ दे दिया। IMF ने इसके कई कारण बताए। उसने कहा कि सरकार ने पुराने 2011-12 को बेस ईयर माना और क्षेत्र विशेष के उत्पादक मूल्य सूचकांक के बजाय सिर्फ थोक मूल्य सूचकांक को डिफ्लेटर के तौर पर इस्तेमाल किया। डेटा इकट्ठा करते समय उसने अनौपचारिक सेक्टर और अन्तरक्षेत्रीय कमियों को नजरअंदाज किया। कई जानकारों ने कहा कि जिस स्टैटिस्टिकल सिस्टम को कुछ समय पहले तक गोल्ड स्टैंडर्ड के तौर पर पहचान मिली हुई थी, उसे अब ‘C’ रेटिंग मिलना देश के लिए शर्म की बात है।

मोदी सरकार द्वारा डेटा में किए जा रहे हेरफेर की वजह से देश के लोगों को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। जब डेटा नहीं होता, तो कोई जवाबदेही नहीं होती, इसलिए कोई राहत या मुआवज़ा देने की ज़रूरत भी नहीं होती।* आज तक, हमें न तो कोविड से हुई मौतों की असली संख्या पता है, न ही उन प्रवासी मज़दूरों की संख्या, जिन्होंने पैदल अपने घरों को जाते समय अपनी जान गंवाई थी। हम यह भी नहीं जानते कि नोटबंदी की वजह से कितनी नौकरियाँ गईं, जीऐसटी कानून लागू होने के बाद कितने छोटे और मंझले उद्योग धंधे बंद हो गए, यहां तक की हाल ही में कुंभ मेले में भगदड़ में मारे गए तीर्थयात्रियों की सही संख्या का भी पता नहीं है। इसके अलावा, बेरोज़गारी के डेटा की कमी से युवाओं के सामने रोज़गार का संकट और बढ़ता जा रहा है। इसी तरह, डेटा के अभाव में खेती के संकट की गहराई का पता लगना मुश्किल है। ज़्यादा फीस या फिर आर्थिक तंगी की वजह से स्कूल और कॉलेज छोड़ने वालों विद्यार्थियों की संख्या का डेटा भी मौजूद नहीं है। यह लिस्ट कभी खत्म नहीं होने वाली है।

140 साल में पहली बार, इस बार देश ने हर दशक में होने वाली जनगणना नहीं की है। यह हमारी अर्थव्यवस्था के लिए बुरी खबर है। आबादी के डेटा की कमी के कारण होने वाली गलत प्लानिंग और संसाधनों के गलत आवंटन, पूंजी के सही ट्रांसफर की समस्या, कल्याणकारी योजनाओं में गड़बड़ी, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की गलत प्लानिंग, भ्रष्टाचार, करदाताओं के पैसों की बर्बादी और युवाओं के बाहुल्य वाले इस देश के डेमोग्राफिक डिविडेंड का फिजूल में जाना कोई नहीं रोक सकता।

इसलिए, अब समय आ गया है कि सरकार सिर्फ अपने राजनीतिक फायदे देखने के बजाय देश के फायदे का ध्यान रखे। उन्हें देश की भलाई के लिए समय पर और बिना हेरफेर किए सही डेटा देश के सामने रखना शुरू कर देना चाहिए, वरना देश को बर्बादी की तरफ़ जाने से रोकना मुश्किल हो जाएगा।

राजीव शर्मा, जनरल सेक्रेटरी और चीफ स्पोक्सपर्सन

चंडीगढ़ प्रदेश कांग्रेस।