इन्डियन ओवरसीज कांग्रेस की अर्न्तराष्ट्रीय न्यूज़ लैटर, जो भारतीय टेलीकॉम के जनक सैम पित्रोदा के पैट्रोनेज में पब्लिश होती है, में मेरे लेख अब छपा करेंगें। नवम्बर 2025 में छपा मेरा पहले लेख का हिन्दी रूपांतरण आपके लिए प्रस्तुत….
20वीं सदी के प्रारंभ में एक अहिंसक स्वतंत्रता संग्राम के माध्यम से धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, सब के लिए न्याय, समानता और गरिमा सुनिश्चित करने के विचार पर आधारित, भारत के विभिन्न क्षेत्रों के राजनीतिक एकीकरण का सपना आकार लेने लगा था।
उसी समय इसके ठीक विपरीत दिशा में कुछ उच्च जाति के हिंदुओं द्वारा प्रायोजित एक दूसरा आंदोलन भी ज़ोर पकड़ने लगा था, जिसका उद्देश्य एक ही धर्म पर आधारित एक सामंती समाज को बनाए रखना और दूसरे तबकों पर अपनी सर्वोच्चता कायम रखना था। इस आंदोलन का नेतृत्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) कर रहा था — जो 1925 में स्थापित एक राष्ट्रवादी और अर्धसैनिक संगठन है।
आरएसएस को जनता से मान्यता और समर्थन की उम्मीद थी, जो उसे नहीं मिल नहीं रहा थी। इस निराशा में यह संगठन जल्दी ही इटली के बेनिटो मुसोलिनी की सोच से अभिभूत हो गया और उनके फ़ासीवाद को ही अपनी मूल विचारधारा बना लिया। तब से आज तक इसमें कोई ज्यादा बदलाव नहीं आया है।
यह सब कुछ मार्च 1931में शुरू हुआ, जब आरएसएस के संस्थापक के.बी. हेडगेवार के गुरु डॉ. बालकृष्ण शिवराम मूंजे ने इटली के बेनिटो मुसोलिनी और बालिला और अवांगार्दिस्ती जैसे फासीवादी संगठनों से लम्बी और विस्तृत चर्चाएं की। इन बैठकों के बाद मूंजे ने लिखा था: “फासीवाद की विचारधारा लोगों में एकता की अवधारणा को स्पष्ट रूप से सामने लाती है… भारत और खासकर हिंदू भारत में हिंदुओं के सैन्य पुनर्जनन के लिए ऐसी संस्थाओं की ज़रूरत है… डॉ. हेडगेवार के नेतृत्व में नागपुर का हमारा आरएसएस का संगठन भी इसी तरह का है।”
फासीवादी नेताओं के जादू ने मूंजे पर गहरा असर डाला, जिसने आरएसएस की विचारधारा को हमेशा के लिए बदल दिया। उनके शिष्य हेडगेवार ने 1934 में इटालियन फासीवाद पर एक सम्मेलन की अध्यक्षता की। आरएसएस और हिंदू महासभा के सभी नेताओं ने एक स्वर में मुसोलिनी की प्रशंसा की और उनके विचारों का पूरे मन से अनुसरण करने का संकल्प लिया। तब से मूंजे ने यह सुनिश्चित किया कि आरएसएस की मूल विचारधारा और मार्गदर्शक सिद्धांत मुसोलिनी और उनके फासीवादी संगठनों के विचारों पर ही ढाले जाएँ।
आरएसएस का एक राष्ट्र, एक संस्कृति, एक झंडा और एक नेता का लक्ष्य मूलतः फासीवादी विचार से ही प्रेरित है। आरएसएस ने फासीवादी युवा संगठनों की संरचना भी पूरी तरह से अपना ली। फासीवाद की तर्ज पर ही झूठ और अफवाहों के निरंतर प्रचार के जरिए लोगों के मन-मस्तिष्क को प्रभावित करना शुरू कर दिया। युवाओं का सैन्यीकरण और अर्धसैनिक ड्रिल, जिसे शाखा कहा जाता है, का कार्यक्रम भी सीधे इटली के फासीवादी संगठनों से लिया गया फासीवादी युवा संगठनों के जैसे ही मूंजे ने आरएसएस में खाकी निकर, काली टोपी, लाठी ड्रिल और अपने सीनियरज़ के प्रति पूर्ण निष्ठा की रिवायत शुरू की I आज भी सब कुछ वैसा ही है , बस खाकी निकर की जगह पतलून आ गई है।
ट्यूरिन विश्वविद्यालय की स्कॉलर मार्जिया कासोलारी को हिंदू महासभा के अभिलेखागार में हिंदू राष्ट्रवादियों और मुसोलिनी शासन के बीच सीधे संपर्क के सबूत मिले हैं। उन्होंने कहा कि आरएसएस की सैन्यवादी संरचना मुसोलिनी की ब्लैकशर्ट्स मिलिशिया पर आधारित है।
1939 के आसपास, एक और फासीवादी नेता एडॉल्फ हिटलर ने भी आरएसएस को प्रभावित करना शुरू कर दिया। 1940 से 1973 तक सरसंघचालक रहे एम.एस. गोलवलकर ने नाजियों के जातीय शुद्धता (रेशियल प्योरिटी) के सिद्धांत की भूरी-भूरी प्रशंसा की। अपनी किताब “वी” आँर “अवर नेशनहुड डिफाइंड” में उन्होंने सुझाया कि सभी गैर-हिंदुओं को या तो हिंदू संस्कृति अपना लेनी चाहिए या हिंदुओं के अधीन रहना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत में अल्पसंख्यकों के पास सिर्फ दो विकल्प हैं — या तो अपना धर्म त्यागकर हिंदू संस्कृति में विलीन हो जाएँ या बिना अधिकारों के दूसरे दर्जे के नागरिक बनकर रहें। यह हिटलर के सर्वोच्चतावादी विचारों का स्पष्ट समर्थन था। झूठे तथ्यों के लगातार प्रचार की हिटलर वाली तकनीक भी आरएसएस की पहचान बन गई।
स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों मेॅ लोग आरएसएस की फासीवादी विचारधारा के खतरों को पहचानते थे। इसलिए उसकी राजनीतिक शाखा जनसंघ या भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) आजादी के पहले पचास सालों में कभी भी बड़ी राजनीतिक ताकत नहीं बन सकी। लेकिन पिछले तीन दशकों से हालात बदल रहे हैं, खासकर जब से बीजेपी ने हिंदुओं की धार्मिक भावनाएँ भड़काकर भारी समर्थन जुटाना शुरू किया। इसके लिए उसने धर्म पर आधारित कई राजनीतिक आंदोलन चलाए। जहां सदियों पुरानी बाबरी मस्जिद थी, वहाँ राम मंदिर बनाने का आंदोलन उनमें से एक था। नतीजा यह हुआ कि 2014 से भारत में बीजेपी (यानी आरएसएस) की सरकार है।
पिछले 11 सालों में भारत ने अल्पसंख्यकों और दलित हिंदुओं का चुनिंदा उत्पीड़न और संविधान का सोचा समझा उल्लंघन देखा है। विश्व के बहुत से नेता भारत के मौजूदा रुख को लेकर चिंतित हैं। 2021 में अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने भाजपानीत भारत को अल्पसंख्यक उत्पीड़न के चलते “विशेष चिंता वाला देश” घोषित करने की सिफारिश की थी।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय निंदा का वर्तमान सरकार पर कोई असर नहीं पड़ता। यह सरकार आरएसएस मुसोलिनी और हिटलर के विचारों को जिंदा रखने के लिए कृतसंकल्प है। नतीजतन, देश की लोकतांत्रिक, बहुलतावादी, समावेशी, समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष संरचना अब गंभीर खतरे में है। यह वाकई चिंता की बात है।
राजीव शर्मा


