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देश के मूल संविधान में प्रकाशित 22 उत्कृष्ट कृतियों को उपलब्ध प्रतियों से हटाना दुर्भाग्यपूर्ण : संविधान विशेषज्ञ बलराम गुप्ता….

चण्डीगढ़ : भारत का संविधान राष्ट्र की आत्मा का सजीव प्रतिबिंब है, एक ऐसा कालातीत दस्तावेज़ जो कानून, संस्कृति, इतिहास और दर्शन को एक सूत्र में बांधता है। हर राष्ट्र अपना भविष्य अपने तरीके से लिखता है। भारत ने अपना भविष्य साहस और आदर्शों के साथ लिखना चुना। इसी सिलसिले में 22 अध्यायों में बांटे गए देश के संविधान के प्रत्येक अध्याय का पहला पन्ना सुन्दर एवं कलापूर्ण हस्तचित्रित कृतियों से सुसज्जित है परन्तु अफ़सोस है कि पूरे देश में उपलब्ध संविधान की प्रतियों में ये कृतियाँ गायब हैं।

ये कहना था प्रसिद्ध साहित्यकार अशोक नादिर का, जो आज चण्डीगढ़ प्रेस क्लब में एक पत्रकार वार्ता को सम्बोधित कर रहे थे। अशोक नादिर इस विषय पर अपनी नई किताब “द इंडियन कांस्टीट्यूशन –अ कॉन्फ्लुएंस ऑफ़ लॉ, आर्ट एंड हिस्ट्री” लेकर आ रहे हैं जिसका विमोचन 21 दिसम्बर को होना है। वे पत्रकारों से इस पुस्तक की विषयवस्तु के बारे में चर्चा कर रहे थे।

उनके साथ देश के ख्यात संविधान विशेषज्ञ बलराम गुप्ता भी मौजूद थे, जो देश के जाने माने वकील रहें हैं व अपने जीवन के 50 वर्ष वकालत के पेशे को दिए। बलराम गुप्ता ने भी इस अवसर पर कहा कि जब उन्हें देश के संविधान की इस विशेषता के बारे में ज्ञात हुआ तो उन्होंने इसकी सच्चाई जानने का प्रयास किया और तब उन्हें पता चला कि वास्तव में देश के आम जन से लेकर क़ानून के पेशे से जुड़ा हर व्यक्ति, यहाँ तक कि संविधान की शपथ लेकर देश को चलाने वाले राजनेता तक भी वास्तविक संविधान की प्रतियों से वर्षों से वंचित है।

अशोक नादिर ने बताया कि इस वर्ष फरवरी में राज्यसभा में सांसद मोहन दास अग्रवाल द्वारा इस मामले के सम्बन्ध में उठाए गए एक प्रश्न से यह महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। सभापति जगदीप धनखड़ ने स्पष्ट किया कि संविधान का एकमात्र प्रामाणिक संस्करण वही है जिस पर उसके निर्माताओं के हस्ताक्षर हैं और जिसमें मूल चित्र भी सम्मिलित हैं। इस स्वीकारोक्ति ने संविधान के प्रति राष्ट्रीय श्रद्धा को पुनर्जीवित करते हुए उसे केवल कानूनी साधन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर के रूप में देखने की दृष्टि को मजबूत किया।

उनके मुताबिक इन बाईस चित्रों में से प्रत्येक भारत की निरंतरता और अंतःचेतना का संदेश देता है। मोहनजोदड़ो की मुहर हमारी सभ्यतागत गहराई की याद दिलाती है; वैदिक आश्रम नैतिक और शैक्षिक संतुलन को दर्शाता है; और बुद्ध व महावीर के चित्र शासन में करुणा और संयम की शिक्षा देते हैं। रामायण और महाभारत के दृश्य अधिकारों और कर्तव्यों के शाश्वत संतुलन पर बल देते हैं। आगे के पैनलों में अशोक, अकबर, शिवाजी, गुरु गोबिंद सिंह, रानी लक्ष्मीबाई, टीपू सुल्तान और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे व्यक्तित्व नेतृत्व, प्रतिरोध और बलिदान की उस भावना को दर्शाते हैं जिसने भारतीय राष्ट्रत्व को आकार दिया। भारत के पर्वतों, नदियों और समुद्रों के चित्र सहनशीलता, विविधता और एकता के प्रतीक हैं।

उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि अपने राजनीतिक और कानूनी महत्व से परे, संविधान कला और प्रतीकात्मकता की भी एक उत्कृष्ट कृति है। संसद में सुरक्षित इसका मूल हस्तलिखित संस्करण महान कलाकार नंदलाल बोस और शांतिनिकेतन के उनके विद्यार्थियों द्वारा बनाई गई बाईस हस्तचित्रित कृतियों से सुसज्जित है। हर चित्र भारत की यात्रा के एक निर्णायक अध्याय को दर्शाता है—सिंधु घाटी और वैदिक युग से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन और आज़ादी तक। ये चित्र संविधान को एक कानूनी पांडुलिपि से भारत की आत्मा की जीवंत कथा में बदल देते हैं। फिर भी दशकों तक यह कलात्मक धरोहर छिपी रही, क्योंकि मुद्रित प्रतियों में केवल पाठ था, वे चित्र शामिल नहीं थे जो इस दस्तावेज़ को दृश्यात्मक जीवन देते हैं।

उन्होंने मांग की कि जन भावनाओं को देखते हुए अब के बाद जो भो संविधान की प्रति प्रकाशित हो, वह उक्त कृतियों के साथ ही होनी चाहिए, ताकि भावी पीढ़ियां इनसे प्रेरित हो सकें।

संविधान विशेषज्ञ बलराम गुप्ता ने इन कृतियों के इतने वर्षों बाद प्रकाशन के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा कि इन कृतियों का प्रकाशन बेहद जरूरी है, क्योंकि संविधान सभा में अपने समय के एक से बढ़ कर एक विद्वान् लोग शामिल थे व इन कृतियों को संविदान में जगह देने से उनकी उच्च सोच परिलक्षित होती है।

उन्होंने इन कृतियों के होने के औचित्य के बारे में समझाते हुए कहा कि यदि उन्होंने अपने वकालत के सफर के दौरान इन कृतियों को देखा होता तो उनके द्वारा लड़े गए कई केसों का निपटारा कुछ अलग ढंग से हुआ होता क्योंकि ये कृतियाँ गौर से देखने पर समग्र तौर पर बहुत कुछ कहती हैं व अलग सन्देश देती हैं।

बलराम गुप्ता व अशोक नादिर ने बताया कि जब दिसंबर 1946 में संविधान निर्माताओं की सभा हुई, तो वे केवल एक कानूनी ढांचा तैयार नहीं कर रहे थे, बल्कि पाँच हज़ार वर्षों की सभ्यतागत अनुभूति को एक साझा दृष्टि में पिरो रहे थे। जो संविधान अस्तित्व में आया, वह न तो उधार लिया गया था और न ही नकल किया गया; वह भारत की आत्मा से जन्मा था—उसकी संस्कृति, संघर्षों और न्याय, समानता व समरसता के मूल्यों का प्रतिबिंब। ताकि वह नए युग की गतिशीलताओं के अनुरूप स्वयं को ढाल सके।

भारत की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक धरती में गहराई से जड़ें जमाए यह संविधान वैदिक काल की स्वशासन परंपराओं, अशोक के करुणा-पूर्ण अभिलेखों और स्वतंत्रता संग्राम के लोकतांत्रिक आदर्शों से प्रेरणा लेता है। डॉ. बी. आर. आंबेडकर के मार्गदर्शन में संविधान निर्माताओं ने भारत की नैतिक परंपराओं को स्वतंत्रता और समानता के आधुनिक सिद्धांतों के साथ जोड़ा। उनके लिए लोकतंत्र केवल शासन की व्यवस्था नहीं था, बल्कि जीवन जीने का तरीका था—मानवीय गरिमा, विवेक और सामाजिक न्याय के प्रति एक नैतिक प्रतिबद्धता। इस प्रकार संविधान मात्र एक कानूनी ग्रंथ नहीं रहा; वह एक सभ्यतागत चार्टर बन गया—सत्य, सहिष्णुता और धर्म के नैतिक क्रम में भारत की आस्था की घोषणा।

संविधान सभा, जिसमें हर क्षेत्र, धर्म और भाषा का प्रतिनिधित्व था, ने लगभग तीन वर्षों तक अद्वितीय समर्पण के साथ कार्य किया। हर बहस, हर अनुच्छेद और हर संशोधन एक नवजाग्रत राष्ट्र की धड़कन को दर्शाता था। 26 नवंबर 1949 को संविधान को अंगीकार किया गया और 26 जनवरी 1950 को वह लागू हुआ। इसके साथ ही भारत एक संप्रभु गणराज्य के रूप में एक नए सवेरे में प्रवेश कर गया—स्वतंत्र, आत्मविश्वासी और उद्देश्य में एकजुट।

इन बाईस चित्रों के बिना संविधान अधूरा सा लगता है, क्योंकि वे केवल सजावटी चित्र नहीं हैं, बल्कि भारत की सभ्यतागत पहचान का सार हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि हम कौन हैं और किसके लिए खड़े हैं। इनके बिना संविधान अपनी एकता, संघर्ष और आत्मा की दृश्य कथा खो देगा। ये कलाकृतियाँ शब्दों जितनी ही पवित्र हैं, और संविधान में इनका उचित स्थान सदैव संरक्षित और सम्मानित रहना चाहिए। सच तो यह है कि इन बाईस चित्रों के बिना संविधान में हमारा अस्तित्व भी अधूरा प्रतीत होगा—क्योंकि यही भारत के जीवंत स्वतंत्रता-चार्टर को आकार, रंग और आत्मा देते हैं।

ये सभी दृश्य मिलकर संविधान पर एक नैतिक टिप्पणी प्रस्तुत करते हैं, जो उसे एक कानूनी दस्तावेज़ से बढ़कर भारत की सभ्यतागत यात्रा की एक पवित्र गाथा बना देते हैं। वे सिखाते हैं कि संस्कृति के बिना कानून निर्जीव है और आत्मा के बिना विवेक खोखला। संविधान शासन और दर्शन, अधिकारों और कर्तव्यों, परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु बनाता है। पचहत्तर वर्षों के बाद भी यह जीवंत है—समय के साथ विकसित होता हुआ, फिर भी अपने सार में शाश्वत। यह केवल देश का सर्वोच्च कानून नहीं, बल्कि भारत की जीवित अंतःचेतना है—प्राचीन भी और आधुनिक भी, विविध भी और एकजुट भी। अपने शब्दों और अपनी कला—दोनों में—संविधान आज भी राष्ट्र के हृदय को प्रतिबिंबित करता है: न्याय, करुणा और सत्य का सभी के लिए एक कालातीत वचन।