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आचार्य श्री 108 सुबल सागर जी महाराज..

चण्डीगढ़ दिगम्बर जैन मंदिर सेक्टर 27b में साधना कर रहे आचार्य श्री सुबलसागर जी महाराज अपने शिष्यों को सम्बोधित कर रहे कि हे प्रिय वत्स । जीवों पर दयाभाव रखना करुणा भाव है। अपने ‘ सुख में सुखी, पर के सुख में दुखी होने वाले जीवों की संख्या विश्व में बहुत है परन्तु पर के सुख में सुखी, पर के दुख में दुखी होने वाले कृपालु जीवों की संख्या बहुत कम है।

सूखे, अंधे कुएँ के पास कोई कलश लेकर नहीं जाता, उसी प्रकार करुणाहीन के पास कोई भी सज्जन श्रद्धा कलश लेकर नहीं जाता है। करुणा साधु पुरुषों की पहचान है, जिसके भीतर करुणा नहीं वह कितनी ही प्रसिद्धि प्राप्त कर ले परन्तु सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता । सिद्धि के लिए कारुण्य हदय प्राणिमात्र के लिए सुखप्रद है कोटि कोटि हिंसक यज्ञ से जो धर्म का सत्यार्थ फल दृष्टीगोचर नही होता है वह करुणा शील महात्मा पुरुष के अन्दर होता है। जो करुणा पूर्वक एक जीव की रक्षा करता है, वह भव्य व्यक्ति कोटि कोटि तीर्थों की वन्दना के फल प्राप्त होता है और यदि कोई एक भी जीव की हिंसा में आनन्द लेता है उसकी सम्पूर्ण तीर्थ वन्दना, तप साधना, ‘ज्ञान आराधना व्यर्थ में ही जाती है। हिंसक व्यक्ति के पास स्वर्ग और मोक्ष दोनों ही सुख नहीं होते है।

हृदय में करुणा भाव होने पर ही मनुष्य को विशेष और शेष गुण प्राप्त होते है और करुणा गुण के अभाव में समस्त गुण भी निर्गुणता को प्राप्त होते है। करुणा रूपी गुण में सर्व गुण समाहित होते है। करुणावान व्यक्ति के समाने अगर कोई हिंसक जानवर भी आता है तो वह उस व्यक्ति के आभा मण्डल वर्गणाओं को देखकर स्वयं ही शांत भाव हो प्राप्त होता है ।

सम्यग्दृष्टि मनुष्यों के प्रथम मैत्री, आस्तिक्य, संवेग आदि गुण कहे गये इन समस्त गुणों में पहला ‘गुण मैत्री भाव है अर्थात् प्रत्येक जीव के ऊपर दया रूप भाव रखता है उनको किसी भी प्रकार से पीड़ा, कष्ट, दु:ख न हो, इसलिए प्रतेक पल बह सजग, सावधान रहता है। हर काम को करते हुए विवेक का उपयोग करता है यह जानकारी संघस्थ बाल ब्र. गुंजा दीदी एवं श्री धर्म बहादुर जैन जी ने दी ।