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अहिंसा बलवानों का धर्म हैं, आचार्य श्री 108 सुबल सागर जी महाराज…

चण्डीगढ़ दिगम्बर जैन मंदिर सेक्टर 27बी में चातुर्मास कर रहे आचार्य श्री सुबल सागर जी महाराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि सर्व विद्याओं में श्रेष्ठ विद्या (ज्ञान) अहिंसा है। जो इस विद्या को सिद्ध कर लेता है उसके सम्पूर्ण दोषों का अभाव सहन ही हो जाता है। ययार्थ में कषाय रूप परिणामों का नहीं होना ही अहिंसा है बल से सहित और बल से रहित सभी जीवों की रक्षा करना ही अहिंसा है। अपने और दूसरों की रक्षाका ब्रह्म अस्त्र है अहिंसा। अहिंसा को पालन करने वाला व्यक्ति स्व की भी रक्षा करता हे और पर की भी।

किसी भी जीव के प्राणों का वियोग नहीं करना मात्र इतना धर्म अहिंसा नहीं है, अपितु किसी भी जीव के प्राणों के मारने के भाव भी मन में नहीं लाना अहिंसा है। स्व पर के शरीर प्राणों का वियोग नहीं करना द्रव्य अहिंसा है और अपने परिणामों में कषाय से सहित भावों का उत्पन्न नहीं होने देना भाव अहिंसा है।

प्रत्येक जीव जीने का अधिकार रखता है, उसे जीने देना आपका कर्तव्य है। मात्र अधिकार का ही नहीं, साथ में अपने कर्तव्यों का भी ध्यान रखो। परम धर्म अहिंसा दुर्बलों का धर्म नहीं, अपितु अहिंसा बलवानों का धर्म है। जो अपनी बुरी आदतों को जीत नहीं पाता है वही हिंसा कर्म करता है। अच्छे लोग स्व पर दोनों पर दया भाव रखते है। अपने ह्रदय में, मन में थोड़े भी अशुभ संकल्प विकल्पों को उत्पन्न नहीं होने देना ही अहिंसा है। भाव अहिंसा पालक ही यथार्थ में अहिंसक है और वही सुगति का पात्र है। विश्व में शांति, आनंद का सन्देश देना है तो अहिंसा के माध्यम से ही दिया जा सकता है, अन्य कोई मार्ग विश्वशान्ति का नहीं है। अहिंसा धर्म किसी जाति विशेष का नहीं है यह प्रत्येक जीव का धर्म है जो इसे अपनाले उसका है यह अहिंसा धर्म है। अहिंसा को धारण करने वालो प्रत्येक मनुष्य को इस पर्याय में तो सुख-शांति-समृद्धि मिलती ही है और दूसरी पर्यायों में भी वह हमेशा सुख-शांति वैभव को प्राप्त करता है। अहिंसा सर्वमान्य है। ब्रह्माण्ड के सम्पूर्ण गुण एक मात्र अहिंसा में समाऐ हुए है। अहिंसा परमब्रह्मा है। चिट ब्रह्म में लीन योगी परमब्रह्म अहिंसा को प्राप्त होता है। यह जानकारी बाल ब्र. गुंजा दीदीएवं श्री धर्म बहादुर जैन जी ने दी।