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आचार्य श्री 108 सुबल सागर जी महाराज – सम्यग्दर्शन का महत्व…

चंडीगढ़ दिगम्बर जैन मंदिर में साधनारत गुरुदेव आचार्य श्री 108 सुबल सागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि धर्म की नीव या आधार सम्यग्दर्शन है सम्यग्दर्शन के होने पर ही ज्ञान और चारित्र सम्यक्त्व पने को प्राप्त होता है। और यह सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यम्चारित्र इन तीनों की एकता ही मोक्ष फल की प्राप्ति का उपाय है। यहाँ पहुंचने के बाद इस जीव को संसार में लौटकर नहीं आना पड़ता, हमेशा-हमेशा के लिए अनंत सुख को प्राप्त कर लेता है।

इस सम्यग्दर्शन के समान तीनों लोक में और तीनों कालों में कोई भी सर्व उत्कृष्ट वस्तु नहीं है। इस सम्यग्दर्शन के होने पर ही संसार की सबसे श्रेष्ठ, कीमती सामग्री सम्यग्दृष्टि जीव को अपने आप प्राप्त हो जाती है। सम्यग्दर्शन के साथ अगर इस जीव ने मरण को प्राप्त लिया है तो निश्चित ही ‘कुछ ही जन्मों को धारण कर यह जीव अपना कल्याण कर लेता है। और वह मरण कर कभी भी दुर्गति को प्राप्त ‘नहीं’ होता है अर्थात् नरक, तिर्यंच गति को प्राप्त नहीं होता है और स्वर्ग और मनुष्यगति में भी उच्च कुल को प्राप्त होता है।

सम्यग्दृष्टि जीव भगवान जिनेन्द्र का ‘सच्चा भक्त होता है अर्थात् तीनों लोकों के स्वामी जिनेन्द्र भगवान की श्रद्धा करता, है उन्होंने जो कहा है वह अकाट्य सत्य है। इस पर भरोसा करता है यह भरोसा, (श्रद्धा) ही सम्यग्दर्शन है। सम्यग्दृष्टि स्वर्ग में अणिमा, महिमा आदि आठ गुणों से संतुष्ट, दिव्य शरीर से पुष्ट तथा अतिशय शोभा से युक्त होकर देवों की सभा में चिरकाल तक सुखों को प्राप्त करते है।

इस अनमोल वस्तु सम्यग्दर्शन को किसी भी गति का जीव प्राप्त कर सकता है। हमारे ग्रंथों में कई उदाहरण आते है कि बैल ने, कुत्ते ने, सर्प ने, बंदर ने, हाथी आदि कई तिर्यंचों ने इसे प्राप्त कर अपनी पर्याय को धन्य किया! इसी प्रकार नारकी जीवों में भी और देवो में मनुष्यगति के जीवों ने भी इसे प्राप्त किया और उत्कृष्ठ सुख को प्राप्त किया। हम भी सच्चे देव, शास्त्र, गुरु पर श्रद्धा, भरोसा कर सम्यग्दर्शन को प्राप्त कर सकते है। यह जानकारी बाल ब्रह्मचारिणी गुंजा दीदी एवं श्री धर्म बहादुर जैन जी ने दी।