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पुरुषार्थ से ही पूज्यता की प्राप्ति होति है – आचार्य श्री 108 सुबल सागर श्री महाराज…

चड़ीगढ़ दिगम्बर जैन मंदिर सेक्टर 27B में विराजमान आचार्य श्री 108 सुबल सागर जी महाराज धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहते हैं, हे धर्म स्नेही भव्य आत्माओं ! जैसे स्वर्ण पाषाण के अदंर स्वर्ण है, जिसे यह पता है, वह व्यक्ति ही स्वर्ण प्राप्त करने का पुरुषार्थ करेगा, इसके लिए वह उस स्वर्ण पाषाण को अग्नि में तपाता है, क्या अग्नि में तपाने मात्र से सोना हमें प्राप्त हो जाएगा? नहीं, हमें उसे 16 ताप देने पड़ेंगे जिससे उसमें छुपी हुई कालिमा नष्ट हो जाएंगी, और हमें शुद्ध धातु ‘स्वर्ण प्राप्त हो जाएगी। जिसे सब पसंद करते हैं और उसके आभूषण बनाकर सब अपनी अपनी दुकानों में रखते हैं। क्या पाषाण में छुपे हुए पत्थर से सहित सोने को कोई रखता है, नहीं | उसकी कोई शोभा नहीं होती है, शोभा तो स्वर्ण/ सोने की होती है।

उसी प्रकार आज हम जिन परमात्मा प्रभु की पूजा/भक्ति/आराधना करते हैं, वे भी हमारे जैसे ही थे, पहले। उन्होंने आगम, जिनवाणी को पढ़ा, गुरुओं के मुख से सुना, साक्षात् भगवान को देखकर, उनको गुणों को जाना-समझा और ऐसा अनुभव में आया कि हम भी ऐसे बन सकते है, तो क्यों न हम भी बनने का पुरुषार्थ करें।

कहते हैं बिना पुरुषार्थ करें मनुष्य को भी कुछ प्राप्त नहीं होता है। उन्होंने भी अपनी आत्मा में छुपे परमात्मा को जाना समझा, अब जो आत्मा में कर्म-कालिमा लगी हुई उसे दूर करने का पुरुषार्थ किया। तप, संयम, जप, व्रत, ध्यानरूपी भट्टी में अपने को तपाया। कई बार भेदविज्ञान रूपी पैनी छैनी हथौड़े के द्वारा अपनी आत्मा और शरीर को भिन्न-भिन्न अनुभव किया। एक बार नहीं कई बार ऐसी प्रक्रिया करनी पड़ती है तब कहीं जाकर हमारी आत्मा में लगे हुए दोष नष्ट हो पाते हैं, और हमारी आत्मा भी परमात्मा पने को प्राप्त कर लेती है। फिर यह परमात्मा सिद्ध लोक में विराजमान हो जाती है, जहाँ से फिर लौटकर आना नहीं होता है। यह परमात्मा ही हम जैसे लोगों के द्वारा सदा-सदा के लिए पूज्यता को प्राप्त हो जाती है। जैन दर्शन/धर्म भक्त को भगवान बनाने वाला धर्म है। संसार के दुःखों से ऊपर उठाकर अनंत सुखों में स्थापित कर देता है। हम भी अनंत सुखों को प्राप्त कर अनंत में अर्थात् अपनी आत्मा में लीनता को प्राप्त हो सकें।

यह जानकारी संघस्थ बाल ब्र. गुंजा दीदी एवं श्री धर्म बहादुर जैन जी ने दी ।