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पंजाब के पूर्व मुख्य सचिव वीके जंजुआ को भ्रष्टाचार के 14 साल पुराने मामले में अदालत से मिली राहत…

चण्डीगढ़ : झूठ के पैर नहीं होते वाली पुरानी कहावत बिलकुल सही है। ये कहना है पंजाब के पूर्व मुख्य सचिव वीके जंजुआ का जिन्हें भ्रष्टाचार के पुराने मामले में चण्डीगढ़ की जिला अदालत में फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट ने राहत देते हुए पूरे मामले को आपराधिक षड्यंत्र व झूठे सबूतों के आधार पर गढ़ा गया करार दिया। मोबाइल कॉल्स की डिटेल्स व लोकेशन के आधार पर सच सामने आ गया।

वीके जांजुआ ने शनिवार को चण्डीगढ़ प्रेस क्लब में मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि 9 नवंबर 2009 को उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया गया था, जिस पर सुनवाई के पश्चात जिला अदालत के न्यायिक मजिस्ट्रेट ने फैसला सुनाया था कि मामला एक आपराधिक साजिश थी और सबूतों को गलत ठहराया गया था।

पूर्व मुख्य सचिव ने कहा कि अदालत का आदेश प्राप्त करने में उन्हें आठ साल लग गए।

उन्होंने कहा कि सभी सबूत फोन कॉल रिकॉर्ड पर आधारित थे जो बाद में फर्जी साबित हुए। उन्होंने कहा कि इस केस के लिए उन्होंने किसी वकील की मदद भी नहीं ली व सारा मुकद्दमा स्वयं लड़ा। उन्होंने कहा कि वह ईमानदार और सच्चे हैं, इसलिए उन्हें अपना केस लड़ने में मुश्किल नहीं आई, जबकि दूसरी तरफ सिर्फ झूठ की बुनियाद पर पर खड़ा किया गया केस था।

जांजुआ ने कहा कि जब उन्होंने कॉल रिकॉर्ड्स निकाले और खुद जांच की तो पता चला कि पूरा मामला फर्जी है।

जंजुआ ने कहा, एफआईआर के अनुसार, यह आरोप लगाया गया कि शिकायतकर्ता (टीआर मिश्रा, एक उद्योगपति) ने सुबह 9 बजे उनके मोहाली स्थित आवास पर उनसे मुलाकात की, लेकिन वह उस समय लुधियाना में थे। बाद में शिकायतकर्ता ने अदालत को बताया कि जंजुआ अपने घर पर मौजूद नहीं थे।

उन्होंने कहा कि पंजाब पुलिस के एक डीएसपी भी इस साजिश का हिस्सा थे। उन्होंने आरोप लगाया कि शिकायतकर्ता के पास लुधियाना में एक प्लॉट था और वह उस समय उद्योग निदेशक थे। उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता ने उनसे प्लॉट आवंटित करने के लिए संपर्क किया था लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया क्योंकि यह संभव नहीं था। जिसके कारण वह उससे द्वेष रखने लगा।

उल्लेखनीय है कि 9 नवंबर, 2009 को राज्य सतर्कता ब्यूरो के अधिकारियों ने उनके विरुद्ध मामला दर्ज किया गया था। जंजुआ उस समय पंजाब में उद्योग निदेशक के पद पर कार्यरत थे।

परंतु बाद में अपनी ईमानदारी व सच्चाई के चलते वे पंजाब प्रदेश के सबसे बड़े अधिकारी के पद पर तैनात हुए।