राष्ट्रीय संगोष्ठी में राजेश आत्रेय ने रखे ‘वंदे मातरम्’ और मातृभूमि की चेतना पर विचार….
दिनांक 2 और 3 नवम्बर 2026 को कला एवं संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के बैनर तले साहित्य अकादमी दिल्ली एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद के संयुक्त तत्वावधान में दिल्ली के विष्णु दिगम्बर मार्ग स्थित हिंदी भवन में “मातृस्वरूप, मातृभाव और मातृभूमि : वंदे मातरम् और भारतीय राष्ट्रीय चेतना का अभ्युदय” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस आयोजन में चंडीगढ़ से आए साहित्यकार, लेखक, कवि एवं चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी के पूर्व सचिव राजेश आत्रेय ने सहभागिता करते हुए ट्राय सिटी चंडीगढ़ का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने “वंदे मातरम् : मातृभूमि की कल्पना” विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि हमें जन्म देने वाली माता और ये मातृभूमि समान रूप से आदरणीय हैं। जैसे हम अपनी जन्मदात्री माँ के बारे में कुछ भी ग़लत सुन नहीं सकते, सहन नहीं कर सकते उसी प्रकार हमें अपनी मातृभूमि के प्रति भी सम्मान रखना आवश्यक है। उसके विरुद्ध भी कुछ सहन नहीं करना चाहिए। हम इस भूमि पर जन्म लेते हैं, यही हमारा पालन पोषण करती है तथा अंत में पंचतत्वों से बना यह शरीर इसी भूमि में लीन हो जाता है। वंदे मातरम् इसी मातृभूमि माँ की उपासना है, वंदना है। स्वतंत्रता संग्राम में विदेशी शासन के पास सभी बलिदानियों के ख़िलाफ़ लाठियाँ थी, बन्दूकें थी, क्रूर क़ानून थे, अत्याचार थे परंतु स्वतंत्रता सैनानियों की होठों पर सिर्फ़ दो शब्द थे “वंदे मातरम्”। इसी मंत्र का नारा लगाते हुए अनेक सैनानी फाँसी के फंदे को चूम गए। राजेश आत्रेय ने कहा कि वर्तमान आज़ाद भारत में भी युवाओं को इस मंत्र की शक्ति को समझना होगा और अपनी मातृभूमि की अखंडता की रक्षा करनी होगी। उन्होंने अपनी लिखी एक कविता के माध्यम से सभी श्रोताओं, विशेषकर नव पीढ़ी को, उत्प्रेरित भी किया।


