कॉप30 प्रेसीडेंसी के फॉसिल फ्यूल रोडमैप पर आए 21 सबमिशन के विश्लेषण में ट्रांजिशन की जरूरत पर आम सहमति सामने आई है; लेकिन विकासशील देशों को नई जिम्मेदारियां नहीं, बल्कि साधनों की जरूरत है: सीईईडब्ल्यू विश्लेषण…..
नई दिल्ली, 04 नवंबर 2026 कॉप28 में पार्टीज के न्यायसंगत, व्यवस्थित और समतापूर्ण तरीके से जीवाश्म ईंधन को छोड़ने के वैश्विक प्रयासों में योगदान देने पर हामी भरने के लगभग तीन साल बाद, दुनिया इसकी जरूरत पर तो सहमत है, लेकिन इसकी प्रक्रिया क्या होगी और इस पर आने वाला खर्च कौन उठाएगा, नहीं जानती है। यह जानकारी काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के एक नए अध्ययन “हूज ट्रांजिशन? अनपैकिंग द डिस्कोर्स ऑन ट्रांजिशनिंग अवे फ्रॉम फॉसिल फ्यूल्स इन क्लाइमेट नेगोशिएशंस” से सामने आई है।
इस अध्ययन में कॉप30 प्रेसीडेंसी को उसके फॉसिल फ्यूल रोडमैप पर मिले 21 पार्टीज के सबमिशन का विश्लेषण किया गया है, जिनमें 115 देश शामिल हैं। इनमें से तीन-चौथाई से अधिक सबमिशन अपनी अपेक्षाओं (expectations) को यूएनएफसीसीसी (UNFCCC) के तहत पहले ही सहमति बन चुकी व्यवस्थाओं से जोड़ते हैं, जैसे राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contributions, NDC) और नेट-जीरो प्रतिबद्धताएं। लेकिन ट्रांजिशन (transition) सिर्फ एक शमन (mitigation) लक्ष्य या ऊर्जा स्रोत में बदलाव का सवाल भर नहीं है, इसमें संपूर्ण अर्थव्यवस्था के बदलाव (whole-of-economy transformations) शामिल हैं. इसलिए इन्हें लागू करने के विभिन्न तरीके (pathways) राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित होने चाहिए।
इलेक्ट्रिफिकेशन दर्शाता है कि लक्ष्यों के लिए इसका क्या अर्थ है। इलेक्ट्रिफिकेशन ऊर्जा ट्रांजिशन (energy transition) के केंद्र में है और कॉप31 प्रेसीडेंसी का 2035 तक 35 प्रतिशत लक्ष्य पहले ही अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के 2035 तक 33 प्रतिशत के वैश्विक अनुमान से उपर है। सीईईडब्ल्यू के विश्लेषण के अनुसार, मौजूदा रुझानों के हिसाब से भारत की अंतिम ऊर्जा खपत में बिजली की हिस्सेदारी 2035 तक लगभग 27 प्रतिशत हो जाएगी,और इसके साथ स्वच्छ बिजली क्षमता भी तेजी से बढ़ेगी। समता (equity) सुनिश्चित करने के लिए, कुछ देश 40 या 45 प्रतिशत जैसे उच्च इलेक्ट्रिफिकेशन लक्ष्य, जबकि भारत धीमा लक्ष्य अपना सकता है, ताकि दुनिया 2035 तक 35 प्रतिशत इलेक्ट्रिफिकेशन लक्ष्य को हासिल कर सके।
*जेम्स अब्राहम, सीईओ, सीईईडब्ल्यू*, ने कहा, “बेलेम ने पूरी दुनिया से वादों से आगे बढ़कर उन्हें पूरा करने को कहा था। अंताल्या को दिखाना होगा कि वे ऐसा कर सकते हैं। वैश्विक दक्षिण (Global South) के देश पहले से इसे हासिल कर रहे हैं: भारत गैर-जीवाश्म क्षमता में 50 प्रतिशत का लक्ष्य पांच साल पहले हासिल कर चुका है, और बेसिक देशों ने पेरिस समझौते से पहले के रुझान की तुलना में 8.5 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य (GtCO₂e) उत्सर्जन घटाया है। वैश्विक दक्षिण की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे से सीख रही हैं और साथ मिलकर तेजी से आगे बढ़ रही हैं। नॉर्थ के देश, जिनके अपने लक्ष्यों से चूकने का अनुमान है, वैश्विक दक्षिण के देशों से सीख सकते हैं। इस साल दूसरा ग्लोबल स्टॉकटेक शुरू हो रहा है, जिसमें हमारी प्रगति को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। सीईईडब्ल्यू के अध्ययन एक ही समाधान की तरफ इशारा करते हैं: जिम्मेदारियों का स्पष्ट निर्धारण, धन का जमीन तक पहुंचना, और विकासशील देशों की भागीदारी से नियमों का निर्माण।”
*सीईईडब्ल्यू के अध्ययन में पाया गया है कि दो-स्तरीय प्रक्रिया उभर रही है।* अप्रैल 2026 में सांता मार्टा सम्मेलन में 57 देशों ने हिस्सा लिया था, लेकिन इसमें चीन और भारत सहित वैश्विक दक्षिण की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को नहीं बुलाया गया। जबकि ये दोनों देश पहले से ही ट्रांजिशन के रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं। भारत ने 2030 के अपने लक्ष्य से पांच साल पहले 2025 में ही अपनी स्थापित बिजली क्षमता में 50 प्रतिशत गैर-जीवाश्म ऊर्जा की हिस्सेदारी का लक्ष्य हासिल कर लिया था । जुलाई 2026 तक यह हिस्सेदारी 54 प्रतिशत हो गई। ट्रांजिशन, तेज समावेशन (inclusion) की कीमत पर नहीं आ सकता है: केवल समावेशी ट्रांजिशन ही न्यायसंगत और समतापूर्ण हो सकता है।
*सुमित प्रसाद, सीनियर प्रोग्राम लीड, सीईईडब्ल्यू*, ने कहा, “भारत जैसी अर्थव्यवस्थाएं ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए पहले से ही तेज गति से जीवाश्म ईंधन से दूर जा रही हैं। उनके पास और तेजी से आगे बढ़ने के लिए वित्त, तकनीक और राजकोषीय जगह (fiscal space) की कमी है। वार्ता प्रक्रिया से बाहर बना कोई भी रोडमैप उसकी जगह नहीं ले सकता, जिस पर यूएनएफसीसीसी में पहले से ही सहमति बन चुकी है। किसी स्वैच्छिक प्रक्रिया में भाग न लेने को महत्वाकांक्षा की कमी नहीं माना जा सकता है। पूरे वैश्विक दक्षिण में देश ट्रांजिशन कर रहे हैं और अपने एनडीसी को पूरा कर रहे हैं। कॉप31 को अपने मैंडेट (mandates) के जरिए इसके कार्यान्वयन को मजबूत बनाना चाहिए, और इसकी शुरुआत जस्ट ट्रांजिशन मैकेनिज्म (Just Transition Mechanism) से होनी चाहिए।”
*ट्रांजिशन वित्त भी अपेक्षित रफ्तार से आगे नहीं बढ़ रहा है।* प्रति वर्ष 300 अरब डॉलर का नया सामूहिक जलवायु वित्त लक्ष्य (new collective climate finance goal), 2030 तक विकासशील देशों की प्रति वर्ष 455-584 अरब डॉलर की अनुमानित जरूरत से काफी कम है। पिछले एक दशक में विकासशील देशों में सरकारों का ब्याज भुगतान में 102 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि उनके राजस्व में 39 प्रतिशत वृद्धि हुई। इसके कारण ट्रांजिशन की फंडिंग का बोझ मूल तौर पर स्वयं इन्ही देशों पर आ रहा है।
*सीईईडब्ल्यू अध्ययन का सुझाव है कि यूएनएफसीसीसी को अपने पास पहले से मौजूद मैंडेट को मजबूत करना चाहिए*: पहला, जस्ट ट्रांजिशन मैकेनिज्म, जिसे कॉप31 में लागू किया जाना है, ताकि लोगों को नए कौशल सिखाए (reskilling) जा सकें और सामाजिक सुरक्षा कवच (social safety nets) दी जा सके; दूसरा, ट्रांजिशन से जुड़ी तकनीकों के लिए टेक्नोलॉजी इम्प्लीमेंटेशन प्रोग्राम (Technology Implementation Programme) लाना, क्योंकि पर्यावरण तकनीक के लगभग 91 प्रतिशत पेटेंट जी20 देशों के पास हैं; तीसरा, वित्त पर अनुच्छेद 9 (Article 9) की कार्ययोजना लाना।
*जवाबदेही की कमी: कौन लक्ष्य से पीछे है*
जून 2026 में सीईईडब्ल्यू के अध्ययन “होल्डिंग अप द मिरर” में यूएनएफसीसीसी के वार्ता समूहों की जलवायु कार्रवाई (climate action) का आकलन किया गया था। पेरिस समझौते के एक दशक बाद, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका सहित केवल सात देश 2030 के अपने एनडीसी लक्ष्य को हासिल करने के रास्ते पर हैं। वहीं यूरोपीय यूनियन, ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड, कनाडा और न्यूजीलैंड जैसी बड़ी विकसित अर्थव्यवस्थाएं पिछड़ रही हैं। अहम बात यह है कि बेसिक समूह (भारत, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका सहित) ने अपने वार्षिक उत्सर्जन वृद्धि की दर को पेरिस समझौते से पहले की अवधि (2009-2015) की 3.3 प्रतिशत की दर से पेरिस के बाद (2016-22) की अवधि में घटाकर 2.1 प्रतिशत कर लिया है। पेरिस समझौते से पहले का रुझान जारी रहने की तुलना में वे 8.5 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य उत्सर्जन घटा चुकी हैं। इसकी तुलना में, इसी अवधि में अम्ब्रेला ग्रुप (Umbrella Group), यूरोपीय यूनियन और एनवायरनमेंटल इंटीग्रिटी ग्रुप (Environmental Integrity Group, EIG) को मिलाकर 3.7 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य उत्सर्जन घटाया है।
*नियमों की कमी: जलवायु और व्यापार*
यूरोपीय यूनियन की कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (सीबीएएम) 2026 में अपने निर्णायक चरण (definitive phase) में पहुंच गया है। सीईईडब्ल्यू के एक अध्ययन “क्लाइमेट एंड ट्रेड: स्ट्रेंथनिंग कोऑपरेशन थ्रू द यूएनएफसीसीसी” में बताया गया है कि जनवरी 2026 तक एक साल में यूरोपीय यूनियन को भारत के कच्चे एल्युमिनियम (unwrought aluminium) का निर्यात लगभग 42 प्रतिशत गिरा है, जिसमें सीबीएएम संभावित कारणों में से एक है। इस अध्ययन में विश्व व्यापार संगठन (WTO), अंकटाड (UNCTAD) और इंटरनेशनल ट्रेड सेंटर के साथ मिलकर एक स्थायी विशेषज्ञ समिति बनाने का सुझाव दिया गया है, जो यह आकलन करे कि ऐसे उपाय विकासशील देशों पर कैसा प्रभाव डालते हैं। सुझाव के अनुसार, विभिन्न देश 2027 में इस समिति के कार्य पर सहमति बनाएंगे, 2028 में इसके नतीजों की समीक्षा करेंगे, और जलवायु व व्यापार को यूएनएफसीसीसी के एजेंडे का स्थायी विषय बनाएंगे।
*रवि शंकर प्रसाद, विशिष्ट फेलो, सीईईडब्ल्यू*, ने कहा, “कार्बन बॉर्डर के उपाय यह बदलाव लाते हैं कि कौन, किसे, क्या बेच सकता है, फिर भी इनके फैसले गिनी-चुनी राजधानियों में होते हैं। यूएनएफसीसीसी सिर्फ दर्शक बनकर नहीं रह सकता है। विकासशील देशों पर इनके असर का आकलन करने वाली एक तकनीकी समिति इस दिशा में पहला व्यावहारिक कदम है।”
*सीईईडब्ल्यू के शोध के अनुसार, अंताल्या में कॉप31 को क्या करना चाहिए*
* विकासशील देशों में संपूर्ण अर्थव्यवस्था के बदलावों के लिए आवश्यक वित्त को ध्यान में रखते हुए जस्ट ट्रांजिशन मैकेनिज्म को लागू किया जाना चाहिए।
* एसबी66 (SB66) में जलवायु और व्यापार पर एक तकनीकी स्थायी समिति (Technical Standing Committee) के मैंडेट पर सहमति बनानी चाहिए।
* सामुदायिक वन वित्त (community forest finance) के साथ फॉरेस्ट रोडमैप (Forest Roadmap) को कार्यान्वयन ढांचे में बदलना चाहिए, जिसे जमीन पर पता लगाया जा सके।
* निकट भविष्य की कार्रवाई को 2035 के एनडीसी के साथ जोड़कर, अधिक संपन्न देशों को उनके अपने लक्ष्यों के प्रति जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।


