मल्हार उत्सव की दूसरी शाम कर्नाटक एवं अर्धशास्त्रीय संगीत के सुरों से सजी संध्या …..
चंडीगढ़, 21 अगस्त 2026: प्राचीन कला केंद्र, चंडीगढ़ द्वारा आयोजित तीन दिवसीय ‘मल्हार उत्सव’ की दूसरी संध्या भारतीय शास्त्रीय एवं अर्धशास्त्रीय संगीत की विविध रंगत से सराबोर रही। रानी लक्ष्मी बाई हॉल, सेक्टर-38, चंडीगढ़ में आयोजित इस संगीतमय संध्या में प्रतिष्ठित कलाकार विदुषी सुधा रघुरामन ने कर्नाटक शास्त्रीय संगीत की मनोहारी प्रस्तुतियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया, जबकि विदुषी धनश्री पंडित ने सावन की भावनाओं और वर्षा ऋतु से जुड़े संगीत के विविध रंगों को सावन, कजरी, ठुमरी एवं दादरा की प्रस्तुतियों के माध्यम से जीवंत कर दिया।
मल्हार उत्सव का मूल भाव वर्षा ऋतु से जुड़े संगीत, भाव और सौंदर्य को मंच पर साकार करना रहा है। इसी भावभूमि को आगे बढ़ाते हुए धनश्री पंडित की प्रस्तुतियों में सावन की रिमझिम, प्रिय मिलन की प्रतीक्षा, विरह की कसक और झूले की उमंग जैसे अनेक भावों की सुंदर अभिव्यक्ति देखने को मिली।
प्रस्तुति का आरंभ में विदुषी सुधा रघुरामन ने कर्नाटक शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा का परिचय कराया। उन्होंने अपनी प्रस्तुति की शुरुआत राग अमृतवर्षिणी में रचित कृति से की, जिसे आदि तालम् में प्रस्तुत किया गया। वर्षा और प्रकृति से विशेष रूप से जुड़े राग अमृतवर्षिणी की यह प्रस्तुति मल्हार उत्सव की विषयवस्तु के साथ विशेष सामंजस्य स्थापित करती दिखाई दी।इसके पश्चात उन्होंने भारतीयार की रचना को रागमालिका एवं तिस्रनडै एकतालम् में प्रस्तुत किया। इसके बाद ‘नंद नंदन’ मीरा भजन को राग शुद्ध सारंग एवं आदि तालम् में प्रस्तुत किया गया, जिसने कार्यक्रम में भक्ति भाव का सुंदर समावेश किया।
कार्यक्रम का समापन तिल्लाना एवं अभंग की प्रस्तुति से हुआ, जिसे वृंदावनी में आदि तालम् के साथ प्रस्तुत किया गया। प्रस्तुति में शास्त्रीय संगीत की गहराई के साथ लयात्मक ऊर्जा और भक्ति भाव का सुंदर संगम देखने को मिला।मल्हार उत्सव की दूसरी संध्या धनश्री पंडित ने ‘घिर रही काली घटा’ से किया, जिसे दादरा में प्रस्तुत किया गया। इसके बाद ‘हिंडोला’ को कहरवा में प्रस्तुत किया गया। ‘अब के सावन घर आजा’ को विलंबित दीपचंदी में प्रस्तुत करते हुए उन्होंने सावन से जुड़े विरह और प्रतीक्षा के भावों को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया। इसके पश्चात ‘सावन की ऋतु’ कहरवा, ‘मोरे बलमा नहीं आए’ दादरा/कहरवा, ‘झूला धीरे से झुलाओ’ कहरवा तथा ‘दिन बीत गए बालम’ दादरा (कहरवा) में प्रस्तुत किए गए।
इन प्रस्तुतियों के माध्यम से धनश्री पंडित ने अर्धशास्त्रीय संगीत की उस समृद्ध परंपरा को सामने रखा, जिसमें वर्षा ऋतु भारतीय संगीत और काव्य का एक अत्यंत भावपूर्ण एवं लोकप्रिय विषय रही है। उनकी मधुर एवं भावपूर्ण गायकी ने सभागार में सावन की मनोहारी अनुभूति को साकार कर दिया।ने एक ओर सावन, कजरी, ठुमरी और दादरा के माध्यम से वर्षा ऋतु की भावनाओं को स्वर दिया, वहीं दूसरी ओर कर्नाटक संगीत की शास्त्रीय गरिमा और विविधता से श्रोताओं को समृद्ध किया। दोनों कलाकारों की प्रभावशाली प्रस्तुतियों ने भारतीय संगीत की विविध परंपराओं को एक ही मंच पर खूबसूरती से प्रस्तुत किया। धनश्री पंडित की प्रस्तुतियों में तबले पर सिद्धार्थ चटर्जी तथा हारमोनियम पर ललित सिसोदिया ने प्रभावशाली संगत प्रदान की।


