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विश्व डाउन सिंड्रोम दिवस पर ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’के साथ रंगमंच से दिया एक प्रभावशाली संदेश….

चंडीगढ़, 21 मार्च, 2026: रंगमंच पर विशेष क्षमताओं वाले विशेष बच्चों ने अपनी अभिनय प्रस्तुतियों से रंगमंच पर नए रंग भर दिए। एक बेहतरीन और कलात्मक अदाकारी के एक ऐतिहासिक उत्सव के रूप में, स्माइलिंग डैंडेलियन फाउंडेशन ने, डिस्कवर एबिलिटी स्पेशल स्कूल और डाउन सिंड्रोम फेडरेशन ऑफ इंडिया के सहयोग से, शनिवार को यहां सेक्टर 16 स्थित पंजाब कला भवन में, अपनी अभूतपूर्व नाट्य प्रस्तुति ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’का सफलतापूर्वक मंचन किया। ये नाटक खास तौर पर विश्व डाउन सिंड्रोम दिवस के अवसर पर मंचित किया गया।

शुचि गुप्ता द्वारा डायरेक्ट किए गए इस नाटक में, बौद्धिक तौर पर विशेष क्षमताओं वाले 35 बच्चों और युवाओं ने मुख्य कलाकारों के रूप में अभिनय किया, और उन्होंने मंत्रमुग्ध दर्शकों के सामने एक क्लासिक हिंदी नाटक प्रस्तुत किया। ये नाटक सामान्य तौर पर प्रस्तुत किए जाने वाले नाटकों के समान ही पूर्ण अवधि का था। इस कार्यक्रम में माधवी कटारिया, स्टेट कमिश्नर फॉर पर्संस विद डिसेबिलिटीज ने मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थिति दर्ज कराई।

अपने दृष्टिकोण को साझा करते हुए, स्माइलिंग डैंडेलियन फाउंडेशन की संस्थापक शिवानी ढिल्लों ने कहा कि “यह प्रस्तुति एक सपना सच होने जैसा था। मैं सभी स्थापित पूर्वाग्रहों को चुनौती देना, सोच को बदलना और सीमाओं के बजाय उनकी क्षमताओं को उजागर करना चाहती थी। हमने उन पर विश्वास किया, और उन्होंने हमारी उम्मीदों से कहीं बढ़कर प्रदर्शन किया।”

भारत में अपनी तरह की पहली पहल के रूप में सराहा गया यह प्रदर्शन, संपूर्ण कलाओं की क्षमता का एक सशक्त प्रमाण था, जिसने बौद्धिक तौर पर विशेष क्षमताओं वाले व्यक्तियों और उनके साथियों को एक साथ लाकर एक सम्मोहक और यादगार नाट्य अनुभव तैयार किया।

मूल रूप से भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा लिखित, ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’एक प्रसिद्ध व्यंग्य नाटक है जो हास्य और व्यंग्य के माध्यम से बेतुके शासन और अंध न्याय की आलोचना करता है। विशेष कलाकारों द्वारा प्रस्तुत इस मंच नाटक को, कलाकारों के हृदयस्पर्शी और जोशीले रंगमंच प्रदर्शन ने काफी अधिक प्रभावशाली बना दिया।

विशेष रूप से, मंच तक पहुंचने का यह सफर समर्पण और आपसी सहयोग से भरा रहा। अभिभावकों ने अपने बच्चों के साथ एक महीने से भी अधिक समय तक घर पर ही अभ्यास किया, जिसमें वर्चुअल सेशंस और 15 दिनों के काफी गहन इन-पर्सन अभ्यास का सहयोग मिला। तैयारी की यह पूरी प्रक्रिया आनंद, सहजता और सुखद अप्रत्याशित पलों से परिपूर्ण थी, क्योंकि प्रतिभागियों ने अत्यंत उत्साह के साथ अपनी-अपनी भूमिकाओं को आत्मसात किया।

इस उपलब्धि पर अपने विचार व्यक्त करते हुए, डिस्कवर एबिलिटी स्पेशल स्कूल की सह-संस्थापक पूनम चौधरी ने कहा कि “जो कभी असंभव प्रतीत होता था, अब संभव हो चुका है—हमारे विद्यार्थियों ने मंच पर हास्य, ऊर्जा और आनंद का संचार कर दिया।”

बच्चों की टीचर इंदु बाला केसवानी ने कहा कि प्रतिभागियों का आत्मविश्वास और छिपी हुई प्रतिभाओं को उभरते देखना सभी के लिए दिल को छू लेने वाला अनुभव था।

नाटक की निर्देशक शुचि गुप्ता ने कहा कि “एक आर्ट बेस्ड थैरेपी (कला-आधारित चिकित्सा) प्रैक्टिशनर के तौर पर, इस नाटक समूह ने मेरी रचनात्मक क्षमताओं को लगातार चुनौती दी, ताकि मैं उन्हें सार्थक बातचीत के माहौल में शामिल कर सकूं। मुझे इतना मज़ा पहले कभी नहीं आया। मेरी इच्छा है कि और भी कलाकार इन प्रतिभाशाली बच्चों के साथ काम करने के लिए आगे आएं, जिनमें से हर कोई अपने आप में अनोखा है!”

परिवारों के लिए, यह प्रस्तुति एक भावनात्मक उपलब्धि साबित हुई। एक अभिभावक, मनिंदर कौर ने बताया, “अपनी बेटी को ‘कल्लू बनिया’ का किरदार निभाते देखना एक मंत्रमुग्ध कर देने वाला, जीवन में एक बार मिलने वाला अनुभव था। ऐसा लगा जैसे मैं उसे सचमुच चमकते हुए देख रही हूं।”

नाटक में अभिनय करने वाले बौद्धिक तौर पर विशेष क्षमता रखने वाले कलाकार अभय पुरंग ने कहा कि “इस नाटक के दौरान मुझे बहुत मज़ा आया। अब मैं एक हीरो हूँ और मैं आमिर खान की अगली फ़िल्म में काम करना चाहता हूं।”

डॉ.रेखा रामचंद्रन, प्रेसिडेंट, डाउन सिंड्रोम फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया ने इस पहल के व्यापक महत्व के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि “जैसा कि विलियम शेक्सपियर ने कहा है, ‘पूरी दुनिया एक रंगमंच है।’ जहां हम सभी जन्म से ही अभिनेता हैं, वहीं डाउन सिंड्रोम के साथ जी रहे लोग स्वाभाविक कलाकार होते हैं, जो अपनी भावनाओं को व्यक्त करने और नाटक में माहिर होते हैं। इस पहल ने उन्हें अनुभवी कलाकारों के साथ मिलकर अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए एक सार्थक मंच प्रदान किया है। इस असाधारण प्रतिभा को दुनिया के सामने लाना हमेशा से मेरा सपना रहा है, और इसे हकीकत बनाने के लिए मैं शिवानी का तहे दिल से शुक्रिया अदा करती हूं।”

अपनी कलात्मक सफलता से अलग, इस पहल ने एक बड़ा सामाजिक संदेश भी दिया, यह साबित करते हुए कि कला के क्षेत्र में सभी को साथ लेकर चलना न केवल संभव है, बल्कि यह एक परिवर्तनकारी शक्ति भी है। प्रतिभा और अभिव्यक्ति को सबसे आगे रखकर, इस प्रस्तुति ने प्रतिभागियों में आत्मविश्वास जगाया, दर्शकों में जागरूकता फैलाई, और विभिन्न समुदायों में इनक्लूसिव जुड़ाव के लिए एक ऐसा मॉडल तैयार किया जिसे कहीं भी दोहराया जा सकता है।

यह आयोजन ट्राईसिटी और उसके बाहर के सांस्कृतिक परिदृश्य में इनक्लूसिवनेस को नए सिरे से परिभाषित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था; इसने दर्शकों को प्रेरित किया और सामाजिक परिवर्तन के माध्यम के रूप में रंगमंच की शक्ति को एक बार फिर से स्थापित किया।