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धर्मात्मा का सम्मान ही धर्म का सम्मान है – आचार्य श्री सुबल सागर जी महाराज…

सरल हृदयी व्यक्ति गुणी जनों को देखते ही प्रीति से लबालब भर जाते है। उन्हें यह सम्यक् ज्ञान है कि धर्मात्मा का सम्मान ही धर्म का सम्मान है, धर्म धर्मात्मा के अंदर ही पलता है, धर्मात्मा के बिना धर्म नहीं होता है। यह संबोधन दिगम्बर जैन मंदिर सेक्टर 27बी में विराजमान आचार्य श्री सुबल सागर जी महाराज ने दिया और भी कहा कि हे भव्य जीव ! मुख की प्रसन्नता आदि के द्वारा अंतरंग में भक्ति और अनुराग व्यक्त होना ही प्रमोद/खुशी है। सज्जन पुरुष गुणीजनों को देखकर प्रसन्नचित्त हो जाते हैं, यही उनकी सज्जनता की पहचान है।

दुर्जन व्यक्ति साधु पुरुषों को देखकर खेद खिन्न हो जाते है, यही दुर्जन की पहचान है। अन्दर की आस्था को मुख-मण्डल पर प्रकट करने की कला का नाम प्रमोद-भाव है। जिनके अंदर प्रमोद भाव नहीं वे शुष्क सरोवर के समान है, मात्र जमीन के गड्ढे के समान जहाँ प्यासे को पानी नहीं, कमल की सुगंध नहीं। प्रमुदित भाव गद्गद् भाव भव्य प्राणीओं के ही होते हैं। दुर्जन तो सद्गुणी जनों के मिलने पर मुख मोड़ लेते हैं। भाग्यहीन को भगवान कहाँ? जिसके ह्रदय में सद्‌गुणियों के प्रति सम्मान नहीं, उसका हृदय क्या हृदय ? वह तो शुष्क पाषाण का टुकड़ा है जो अपने शुष्क भाव का त्याग नहीं करता, अपितु वह, तो पानी के अन्दर रहने पर भी सुखा ही रहता है।

धन देकर अन्य वस्तु जैसे स्वर्ण, चाँदी के आभूषण, भूमि बर्तन- क्षेत्रादि खरीदा जा सकता है, परन्तु विश्व की सम्पूर्ण विभूति खर्च करके भी गुण-ग्राहयभाव नहीं खरीदा जा सकता है। गुण ग्राहणता सर्वोपरि गुण है। जिसके जीवन में गुण ग्रहणता का भाव आ गया वह विश्व का सर्वश्रेष्ठ पुरुष बन जाएगा। यह जानकारी संघस्थ बाल ब्र. गुंजा दीदी एवं श्री धर्म बहादुर जैन जी ने दी |