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दूसरों के दोषों को ढाकना अच्छा है – आचार्य श्री 108 सुबल सागर जी महाराज…

चण्डीगढ़ दिगम्बर जैन मंदिर में चातुर्मास में अपनी साधनारत आचार्य श्री सुबल सागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते कहा कि हे धर्म पिपासु भव्य आत्माओं ! दूसरों के दोषों की ओर दृष्टि रखना बहुत बुरा है और दूसरों के दोषों को न कहना उत्तम बात है पर हित में तत्पर रहने वाले उस श्रेष्ठ पुरुष का कभी भी अहित न हो, जिसकी कि जिह्वा दूसरे के दोष कहने में मौनव्रत धारण करती है। गुरुदेव अपने शिष्यों को समझा रहे हैं कि कभी भी हमें दूसरों के गुप्त दोषों को उजागर नहीं करना चाहिए, उस व्यक्ति का समय गलत चल रहा है इसलिए उसे ऐसा करना पड़ रहा है जब उसका समय अच्छा आऐगा तो उसे स्वयं अपनी गलतियाँ का अहसास होगा और वह उसे सुधार कर एक अच्छा इंसान बन सकता है।

गुरूदेव, कहते है की कोई व्यक्ति गलत नहीं होता, समय उसे ऐसा करने को मजबूर कर देता है समय ठीक होते ही सब ठीक हो जाता है इसलिए अगर हमें किसी भी व्यक्ति में दोष आदि अवगुण दिखते है तो हमें उन्हें ढाकना चाहिए। और अगर हममें इतनी सामर्थ्य है तो उसका सहयोग करना चाहिए उन दोषों के दूर करने में। जो मनुष्य ऐसा करता है वह बहुत ही महान वा श्रेष्ठ व्यक्तित्व का धारी होता है।

आज वर्तमान समय में मनुष्य अपने तो दोषों को देखता नहीं है और अंगुलि करता है दूसरों की तरफ। यह एक अंगुलि तो दूसरे की तरफ होती है और लेकिन शेष चार अंगुलियाँ तो स्वयं की तरफ, यह उसको है नजर नहीं आती। यह इसी बात का संकेत है कि सामने वाला जितना दोषी है उससे चार गुना अधिक दोषी तो वह अंगुलि करने वाला है। अपने स्वयं के दोषों की तरफ अगर तरफ अगर हमारी दृष्टि हो जाऐ तो हम उसे सुधार कर भगवान बन सकते हैं।

इसलिए हमें अपनी दृष्टि को हमेशा सकारात्मक रखना चाहिए, क्योंकि कहते है कि जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि। इस संसार में प्रत्येक मनुष्य के अंदर कुछन कुछ दोष होते है और प्रत्येक मनुष्य के अंदर के अंदर कुछन कुछ गुण भी होते है तो फिर क्यों न हम भी गुण ग्रहण का भाव रखें। करते क्योंकि जिसकी दृष्टि जैसी होगी वह ही उसके पास वृद्धि को प्राप्त होगा निर्णय हमारा है हम क्या चाहते है। यह जानकारी बाल ब्र. गुंजा दीदी ने दी।