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निराकूलता ही शांति का द्वार – आचार्य श्री 108 सुबल सागर जी महाराज…

चंडीगढ़ दिगम्बर जैन मंदिर में विराजमान आचार्य श्री 108 सुबल सागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुआ कहा कि हे धर्म प्रेमी बन्धुओं! सुख का कारण निराकुलता है। आकुलता से रहित होना ही सुख है। इस संसार में रहने वाला प्रत्येक प्राणी आकुलता से घिरा हुआ है कहीं किसी वस्तु की व्यक्ति की, इच्छाओं की, भोग- उपयोग की सामग्री की व्यापार की आदि किसी न किसी प्रकार से यह व्याकुल रहता हैं। इन सब की प्राप्ति कैसे हो, इसी संकल्प विकल्प में सारा जीवन गुजर जाता है।

इन संकल्प-विकल्प का मन में आना हमारी मन के विकार रूप क्रिया है। मन का उलझा रहना, तरह- तरह की कल्पना में डूबा रहना मन की अस्थिरता का प्रतीक है। अस्थिर मन का व्यक्ति शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से कमजोर होता है इसके मन में अपने काम को लेकर उत्साह, उमंग, आनंद नहीं रहता है। मन में हमेशा नकारात्मक विचार ही अपना घर बनाए रहते हैं। दृष्टिकोण सही न होने के कारण यह हर एक हर व्यक्ति में कमी खोजता रहता है। अपनी तुलना दूसरे से करता है तुलना करते हुए यह भी नहीं देखता कि हमारी स्तिथि क्या है और सामने वाला की क्या है। विवेक, बुद्धि तो जैसे लुप्त हो गई है अपने सामने किसी को कुछ भी नहीं समझता है। इस प्रकार के संकल्प विकल्प में पड़ा हुआ व्यक्ति अपना तो नुकसान करता ही है और अपने परिवार के सदस्यों को सुख-दुःख के बारे में भी नहीं सोच पाता है। ऐसे व्यक्ति समझाते हुए पूज्य गुरुदेव जी कहते है कि “मन चंगा तो कसौटी में गंगा” अर्थात् हर समय हमें अपने विचारों में सोच वाला व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में अपने आपको संभाल कर रखता है। वह हमेशा दूसरों का भला कैसे हो इसका भी विचार करता है कि दूसरों का भला करने वाले व्यक्ति का कभी बुरा नहीं होता है।

अगर कभी बुरा होता है तो वह उससे भी सीखता है हताश नहीं होता है। वह बुरे को भी बुरा [मीठा) बनाकर ग्रहण करता हैं। सकारात्मक सोच से ओत-प्रोत व्यक्ति का व्यक्तित्व उसे चारों तरफ से आगे बढ़ने का मौका देता है। ऐसा व्यक्ति ही दूसरों को सुख-शांति देकर अपना जीवन सफल करते है। वह हर वक्त दूसरों की मदद सेवा के लिए तैयार रहते है। मन को हमेशा प्रसन्न रखता है क्योंकि मन के उत्साहित होने पर उसके सब काम अच्छे ही होते है। मन में उत्साह रखने वाला ही संकल्प विकल्प से दूर बस अपने काम को लक्ष्य बना कर आगे बढ़ता जाता है और आकुलता से रहित होकर निराकुल रहता है और निराकुलता ही सच्चा सुख है। यह जानकारी बाल ब्र. गूंजा दीदी एवं श्री धर्म बहादुर जैन ने दी।