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सामुदायिक परिवार की संस्कृति श्रेष्ठ संस्कृति – आचार्य श्री 108 सुबल सागर जी महाराज…

चडीगढ़ दिगम्बर जैन मंदिर में विराजमान आचार्य श्री सुबलसागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुआ कहा कि हे ज्ञानी आत्माओं ! चिंता चिता के समान है जिस व्यक्ति को चिंता रूपी रोग लग जाता है वह व्यक्ति जिंदा रहते हुए भी मरे हुए के समान हैं। -प्राचीन काल में यह चिंता बहुत कम होती थी क्योंकि लोग सामुदायिक परिवार में रहते थे एक-दूसरे के साथ प्यार, वात्सल्य, स्नेह के साथ सबका उठ‌ना बैठना होता था। एक-दूसरे के काम में पूर्णत: सहयोग के भाव रहते थे। आपस में सभी लोग एक दूसरे की भावनाओं के साथ जुड़े होते थे। परिवार में सदस्यों की संख्या अधिक होती थी सभी लोग मिल जुल कर काम करते थे।

परिवार मे आय कम होती थी लेकिन प्यार, स्नेह के कारण सभी लोग खुशी के साथ रहते थे। किसी भी प्रकार का तनाव, चिंता, डिप्रेशन आदि नहीं होते थे। सभी के शरीर मेहनती थे शारारिक व मानसिक रूप से सभी स्वस्थ्य रहते थे। शुद्ध आहार पानी होता था। माता-भाभी आदि घर की स्त्रीयाँ अपने हाथ से घर के सभी सदस्यों का भोजन तैयार करती थी। प्यार, प्रेम के साथ सभी को भोजन परोसती थी जिससे उस भोजन के द्वारा सभी को सुख-शांति का अनुभव होता था। और जिस घर में प्रेम वात्सल्य सुख- शांति- वैभव हो वहाँ तो लक्ष्मी जी व सरस्वती जी का निवास बना ही रहता है। और चिंता का तो नामोनिशान ही नहीं रहता था।

लेकिन आज वर्तमान परिवेश में सभी लोग एकल परिवार में रहने लगें है जिसे अकेले ही सारे कार्यों की जिम्मेदारी एक ही व्यक्ति पर है अब वह क्या-क्या करें, सभी कुछ करते हुए भी वह सुख-शांति का अनुभव नहीं कर पा रहा है। सुख चैन से वह भोजन भी नहीं कर पा रहा हैं । 20वीं शताब्दी में हमारे देश ने तकनीकि क्षेत्र में बहुत विकास किया है घर बैठे ही सारे काम हो जाते है। किसी से आपस में प्यार सहयोग की भावनाऐं नहीं रही। सभी अपने- अपने में मस्त है, और कोई समस्या आने पर वह घबरा जाता है किसी को कुछ बता भी नहीं सकता है। अकेले ही समाधान करने का साहस भी नहीं है ऐसी स्थिति आने पर वह टेंशन में चला जाता है। और यह टेंशन या चिंता उसे मुर्दे के समान बना देती है।

इन सबसे दूर होने के लिए आपस में दृष्टिकोण का सही होना बहुत आवश्यक है। सकारात्मक दृष्टिकोण के माध्यम से हम अपने को तथा दूसरों को सुख-शांति का अनुभव करा सकते है। परस्पर में सहयोग, प्यार आदि के होने से हम इस तरह की समस्याओं से बच जाते हैं दुनियाँ में चारों और सुख शांति का सामराज्य फैले, इसके लिए हमारी सोच का हमारी वाणी का और हमारी व्यवहार का सभी के प्रति सहज व सरल होना परम आवश्यक है। गुरुदेव कहते है कि देना सीखो, चाहे वह प्यार हो, सम्मान हो, आत्मविश्वास हो या प्रिय वचन हो।

यह जानकारी संघस्थ बाल ब्र. गुंजा दीदी एवं श्री धर्म बहादुर जैन जी ने दी