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धर्म का फल ही सुख शांति है – आचार्य श्री 108 सुबल सागर जी महाराज…

चडीगढ़ जैन मंदिर में सभा को संबोधित करते हुए गुरुदेव सुबलसागर जी महाराज ने कहा कि, हे भव्य आत्माओं ! दिगम्बर भेष के धारी निर्ग्रन्थ साधु राग-द्वेष नहीं करते। वे हमेशा समता भाव में रहते हैं। अगर कोई भक्त श्रावक उनको नमस्कार करें, उनकी पूजा भक्ति करें, तो उनसे प्रसन्न होकर उनको वरदान नहीं देते, कोई दुष्ट व्यक्ति उनकी निंदा करें, उनको अपशब्द कहें, उनका सम्मान नहीं करें, तो वे उनको शॉप भी नहीं देते, वे तो हर परिस्थिति में समता रखते है। समता भाव से मतलब सबके प्रति समान परिणाम होना।

हाँ कोई दु:खी व्यक्ति को देखकर उसकी मदद करवाते है क्योंकि उनके पास तो कुछ होता नहीं है जो भक्त गण होते है उनके माध्यम से उसकी सहायता करवाते है, और उसे आशीर्वाद देते हैं, कि उसका कल्याण हो, उसका जीवन धर्ममय हो। ऐसा क्यों कहा गया है, तो कहते है धर्म के होने से ही पुण्य प्रबल होता है पुण्य से ही सुख साता रूप सब वैभव-सम्प्रति प्राप्त होती है। धर्म का फल ही सुख-शांति है।

जैन धर्म में दिगम्बर आम्नाय में साधु वस्त्रों को धारण नहीं करते, चारों दिशाएँ ही जिनके वस्त्र है, धरती ही जिनका बिछोना, अर्थात सोने का स्थान है, वन गुफाएँ पर्वत-मंदिर ही जिनके रहने का स्थान है। जिनका स्वयं का कोई स्थान नहीं होता वे तो चातुर्मास के चार माहों को छोड़कर हमेशा पद विहार करते रहते हैं, तीर्थ क्षेत्रों की भूमियों की वन्दना करने के लिए, वे तो अपने हाथ की अंजुलि बना कर ही श्रावक अर्थात् गृहस्थों के द्वारा दिया गया भोजन पान आदि को ग्रहण करते है, गृहस्थों लोगों के घर पर नवधा भक्ति पूर्वक जाकर श्रावक जो दे देता है अपने हाथों मे लेकर ग्रहण कर लेते हैं और हाँ 24 घंटे में एक बार ही आहार- पान आदि को ग्रहण करते हैं कोई साधु तो 48 घंटे में 1 बार या 72 घंटे में 1 बार या 5 दिन छोड़‌कर 1 बार ही आहार ग्रहण करते हैं, वह भी खड़े होकर 1 इतना ही नहीं गुरुदेव के गुरुदेव सुबलसागर जी महाराज के गुरु जिन्हें सारा जगत ‘’तपस्वी सम्राट” के नाम से जानता है वह तो 8 दिन छोड़कर या 10 दिन छोड़कर या 15 दिन बाद छोड़कर आहार ग्रहण करते थे वह भी आहार में मात्र पानी और छाछ बस। वह और कुछ नहीं लेते थे, और उनकी तपस्या इतनी कि लोग दाँतों तले अंगुलि चबाते थे उनकी तपस्या को देखकर।

और 2 माह बाद उत्कृष्ट से और 3 माह बाद मध्यम से और चार माह बाद जधन्य विधि से अपने सिर, मुछों और दाढ़ी के बालों को अपने हाथों से उखाड़ फेंकते है इन सबको करते हुए वे हमेशा मुस्कराते रहते हैं और अपनी साधना-स्वाध्याय-संयम-तप-त्याग-ब्रत-जप-ध्यान में लगे रहते है। भव्य लोगों का कल्याण हो तो उनको धर्म का उपदेश भी दे देते हैं, और निरंतर आत्मा के स्वरूप का ध्यान-चिंतन मनन करते रहते हैं सुख शांति को प्राप्त करते हैं।

यह जानकारी संघस्य बाल ब्र. गुंजा दीदी एवं श्री धर्म बहादुर जैन जी ने दी।