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विद्यार्थी बनकर जियो – आचार्य सुबल सागर जी महाराज…

चडीगढ़ दिगम्बर जैन महावीर मंदिर सेक्टर 27बी में धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा है हे भव्य धर्मात्मा! मनुष्य को सारा जीवन विद्यार्थी बन कर जीना चाहिए | स्कूल में पढ़े, कालेज में पढ़े, पढ़ लिख गए, सब कुछ हो गया, अब जीवन भर क्या करना है तो कहा कि जो कुछ पढ़ा है उसका उपयोग करो! लेकिन यहाँ आचार्य महाराज कह रहे कि, नहीं,हमें सारा जीवन विद्यार्थी बन कर जीना चाहिए। विद्यार्थी संस्कार जो आत्मा में पड़ जाऐगा वह इस समय तो काम आऐगा और पर भव में भी साथ जाऐगा । वहाँ भी यह संस्कार उसकी आत्मा के कल्याण में सहायक होता है।

इस विद्यार्थी संस्कार से आत्मा इतनी मंज जाती है कि आपका ज्ञानावरणी कर्म का क्श्योपर्म बढ़ जाता है और ज्ञानावरणी कर्म का क्षय करने के लिए निरंतर ही ज्ञानाध्याय करते रहना चाहिए। अगर हमें पढ़ाने वाला कोई योग्य व्यक्ति मिलता है तो हमें पढ़ने का अभ्यास करना चाहिए। यह अभ्यास ही आत्मा में लगी कालिक को धो देगा। ज्ञान किताबों में नहीं है अगर किताबों में होता, तो कोई भी उसको पढ़कर मोबाईल, टी.वी. आदि इलेक्ट्रानिक उपकरणों को बना लेता लेकिन यह ज्ञान तो हमारे दिमाग की उपज है जितना इसको माजते जाते है उतना-उतना यह वृद्धि को प्राप्त होता रहता है। जिस क्षेत्र में जितना ज्ञान का उपयोग किया जाता है वह उतना वृद्धि को प्राप्त है। इसलिए ज्ञान का निरंतर अभ्यास करना चाहिए।
और निर्दोष औषधि का दान करना चाहिए किसको उसको। व्यक्ति को इस संसार में सबसे प्यारा अगर कोई है तो वह है उसका जीवन। और कोई भी व्यक्ति अपने जीवन के में खतरे में आया देखता है तो उनको औषधी के माध्यम से ठीक करता है। हमेशा औषधीदान में तत्पर रहो। निरोग होना ही मनुष्य का प्रथम सुख है, कहा भी है –“पहला सुख निरोगी काया” जो व्यक्ति दूसरों को रोगी, पीड़ित देखकर उनकी मदद करते है, उनसे पुण्यवान कोई नही होता है औषधि दान से प्राण मिलते हैं। पर्चेन्द्रिय जीव के प्राणों की रक्षा करना जीवन दान है औषधि दान देने वाला व्यक्ति सदैव प्रसन्न रहता है परोपकार में उसे जो आनंद आता है, वह उसे सबसे बड़ा आनंद महसूस होता है। वैध चिकित्सक की तुलना भगवान से की गई है।

औषधिदान करने वाला नियम से इस भव में और पर भव सदा निरोगी होता है निर्दोष औषधी देने में हमें अच्छी तरह से पुरुषार्थ करना चाहिए। चार दानों में श्रेष्ठ दान औषधी दान कहां है, अपेक्षाकृत। क्योंकि इसी में आहार दान, ज्ञान दान, उभयादान समाहित है। औषधी दान देने से साधु स्वस्थ रहते हैं जिससे आहार अच्छे से हो जाता है आहार अच्छे से होने से ज्ञान में अर्थात स्वाध्यय, चिंतवन, मनन आदि में एकाग्रता आती है एकाग्रता होने से इस जीव को किसी भी प्रकार का भय नहीं होता है इसी से ध्यान की सिद्धि होती है अर्थात मोक्ष / अनंत सुखों को प्राप्त कर लेता है यह जानकारी संघस्थ बाल ब्रह्मचारी गुंजा दीदी एवं धर्म बहादुर जैन जी ने दी।