लाइव कैलेंडर

September 2026
M T W T F S S
 123456
78910111213
14151617181920
21222324252627
282930  

LIVE FM सुनें

India News24x7 Live

Online Latest Breaking News

पराधीनता ही दुःख है – आचार्य श्री सुबल सागर जी महाराज…

इस संसार में नरक के समान अगर कोई दुःख है तो वह है पराधीनता। 1947 में हमारा देश अंग्रेजों से स्वतंत्र हुआ, स्वतंत्रता प्रत्येक जीव को अच्छी लगती है आज के समय नौकरी करना ही सबको पसंद आती है लेकिन यहाँ जो पराधीनता है वह मनुष्यों को समझमें ही नहीं आती है दूसरों के नीचे रहकर धन कमाना कहाँ की सवतंत्रता है कही आ नहीं सकते, कहीं जा नहीं सकते, अगर जाना है तो उतने समय या दिन का भुगतान कट। कंपनी मालिक के नीचे रहकर सुनना भी पड़ती है जो हमारे मन के अनुकूल नहीं होता है तो हमारे भाव खराब होते हे और पाप का ही बंध होता ही पहले के समय में प्रत्येक व्यक्तिअपना स्वयं का धंधा करता था। नुकसान भी उसका होता था और मुनाफा भी । बनिया बुद्धि सीखों हम जैन धर्म में उत्पन्न हुए है दूसरों के यहाँ नौकरी करने के लिए नहीं हुए है हम अपनी बुद्धि से ऐसा काम करें, कि दूसरों को नौकरी दे सके, उनके सहायक बन सकें। बनिया बुद्धि वही है जो अपनी बुद्धि से नऐ-2 कार्य करें दूसरों को सिखाएं आज हमारे लोग पढाई करने विदेशों की तरफ भाग रहें है और वही नौकरी करने लग जाते हे अपनी बुद्धि के विकास से हम अपने देश-परिवार – राज्य को तो आगे नहीं करते है विदेशों में अपनी सम्पत्ति लगा कर उनकी आय बढ़ाते है। हम अपने देश में अपने बुद्धि के विकास से ऐसे काम करे जिससे अपने देश राज्य परिवार सबका नाम बढ़े। हम दूसरों को काम देकर अपने परिवार का पालन-पोषण कर सके। अपने देश को समृद्धशाली बनाएं।

आध्यात्मिक स्तर से देखा जाए तो मन की कोई भी इच्छा पराधीन बना देती है इतना ही नहीं शरीर की एक मात्र आवश्यकता जो भोजन पानी की है वह भी आत्मज्ञ साधुओं को पराधीन लगती है साधु भोजन करते हुए भी अपने आपको पराधीन समझता है। क्यों कि उसे 24 घंटों में अपने शरीर की स्थिति बनाने रखने के लिए श्रावक के घर पर आहार पानी के लिए जाना पड़ता है लेकिन वह भी इसमें अपनी स्वाधीनता | आत्मसम्मान का ध्यान रखते हुए नवधा भक्ति पूर्वक ही आहार करते हैं। 24 घंटे अपने-आप में रहते हुए 1 बार दिन में आहार के लिए जाते हुए साधु हमेशा के लिए स्वाधीन होने की साधना करते है। वे ऐसा ही विचार करते है कि वह अवसर कब आए जब आहार मांगना भी न पड़े। पूर्ण अपनी आत्मा की स्वतंत्रता को प्राप्त हो आए। श्री महावीर दिगम्बर जैन मंदिर में चातुर्मास कर रहे आचार्य श्री 108 सुबल सागर जी महाराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुआ कहा। यह जानकारी संघस्थ बाल ब्र. गुंजा दीदी एवं श्री धर्म बहादुर जैन जी ने दी।