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सच्चा धर्म ही रक्षा करने वाला है – आचार्य श्री सुबल सागर जी महाराज..

मोक्षमार्ग में चलना है तो कुछ ऐसा सेवन करना होगा जो मार्ग में थकावट न पैदा करे और आत्मा को शक्ति दे। ऐसी वस्तु है धर्म । शरीर का भोजन अन्नपान है तो आत्मा का भोजन है धर्म । सर्वप्रथम दया धर्म का पालन करना चाहिए। पाप का त्याग कर पुण्य बढ़ाने वाली क्रियाएँ जैसे जप, तप, नियम व्रत संयम आदि आचरण करने का नाम धर्म ही पाप से दुःख होता है और धर्म से सुखा होता है, यह बात सभी लोगों में जन प्रसिद्ध है। इसलिए पाप को छोड़कर सुख की इच्छा करने वाले को सदा धर्म का आश्रय लेना चाहिए।

अब कहते है कि धर्म किसे कहते हैं तो कहा है” धम्मो दया विसुद्धो” अर्थात् धर्म वह है, जो दया से विशुद्ध है। यही धर्म संसारी जीवों के आंशिक कुछ अंश में पापों को नष्ट करने वाला और आत्मा में राग भाव की हानि करने वाला कहा है। इसी राग के अभाव से आत्मा शनै: वीतराग पद को प्राप्त कर लेता है। आत्मा का शुद्ध स्वभाव ही धर्म हो और उस धर्म की -प्राप्ति कराने वाले हमारे भाव भी धर्म ही है क्यों कि जैन धर्म भाव प्रधानी है अप्रेक्षाकृत पूर्व जन्म में जितने महान महा पुरुष हुए थे उन्होंने धर्म का पालन किया था इसी एक लिए शत्रु पुरुष उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाऐ। पूर्व में किए गए धर्म ने उनकी रक्षा की इसलिए पाप का त्याग रूप धर्म हमें हमेशा धारण करना चाहिए ।

यह जानकारी संघस्थ बाल ब्र. गुंजा दीदी एवं धर्म बहादुर जैन ने दी