जिसके जीवन में असंतोष होता है, वास्तव में वही दरिद्र होता है—आचार्य कुलदीप पांडे….
पंचकूला, ( ): मोरनी रोड स्थित शिव धाम आश्रम द्वारा सेक्टर-15 के पंजाबी भवन पंचकूला में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान आज श्रद्धेय श्री सुधांशु जी महाराज के शिष्य आचार्य कुलदीप पांडे ने कृष्ण-सुदामा प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया।
आचार्य जी ने कहा कि श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता किसी प्रभाव या अभाव से नहीं, बल्कि श्रेष्ठ स्वभाव से थी। भगवान की दृष्टि में सुदामा जी कभी दरिद्र नहीं थे। शास्त्र कहते हैं कि जिसके जीवन में असंतोष होता है, वास्तव में वही दरिद्र होता है—”दरिद्रो यस्त्वसंतुष्टः”। सुदामा जी को धन की कोई लालसा नहीं थी, क्योंकि वे पूर्ण संतोष और वैराग्य से युक्त थे। वे प्रभु के दर्शन और भजन को ही जीवन का परम लाभ मानते थे। जब वे द्वारिका मिलने गए, तो उन्होंने प्रभु से कुछ नहीं मांगा। भगवान ने भी ऐसा दिव्य स्वागत कभी किसी संत का नहीं किया जैसा सुदामा जी का किया; उन्होंने अपने आंसुओं से सुदामा के चरण धोए। यह स्वागत सुदामा जी के जीवन के त्याग, तपस्या और निश्छल प्रेम का प्रतिफल था।
उन्होंने आगे बताया कि सुदामा जी की पत्नी के मन में यह भाव अवश्य था कि कृष्ण से मिलने पर कुछ सहायता मिलेगी, लेकिन सुदामा जी का ऐसा कोई विचार नहीं था। श्री कृष्ण यदि त्रिलोक का राज्य भी सुदामा को देते, तो भी वे उसे अस्वीकार कर देते, क्योंकि सुदामा की दृष्टि में ‘राम नाम’ ही दुनिया का सबसे बड़ा खजाना था।
कथा के विश्राम अवसर पर कल 04 अक्टूबर को सुबह 10:00 बजे भव्य हवन-यज्ञ का आयोजन किया जाएगा। इसके बाद दोपहर 12:00 बजे से विशाल भंडारे के साथ इस धार्मिक अनुष्ठान की पूर्णाहुति होगी।


