AI समिट: कुप्रबंधन, ड्रामा, धोखाधड़ी और पुलिस की बर्बरता की कहानी…..
केंद्र सरकार ने 16 से 20 फरवरी 2026 तक दिल्ली में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर एक बड़े सम्मेलन ‘इंडिया AI इम्पैक्ट समिट’ का आयोजन किया। यह सम्मेलन प्रधानमंत्री मोदी की तेज़ी से गिरती हुई साख के बीच हुआ. प्रधानमंत्री पर एपस्टीन फाइलों में होने वाले खुलासों एवं अपने करीबी दोस्त गौतम अदानी के खिलाफ अमेरिका में चल रहे आपराधिक मुकद्दमे के नतीजे से बचने के लिए देश के ज़रूरी हितों से समझौता करने के आरोप हैं।
ऐसा लगता है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर यह सम्मेलन करने का मकसद प्रधानमंत्री की छवि को सुधारना था, लेकिन आयोजन के दौरान हुई भारी गड़बड़ियों के कारण यह सम्मेलन देश की बदनामी का सबब बन गया। भाजपा की प्रोपेगैंडा मशीन ने तो इसे बढ़ा-चढ़ाकर विदेशी निवेश लाने का एक ज़रिया बताया था पर वहां केवल कुप्रबन्धन, घटिया ड्रामेबाजी, धोखाधड़ी और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसक पुलिस कार्रवाई देखने को मिली।
आइए उन चार बड़ी घटनाओं को समझने की कोशिश करते हैं जिनके कारण यह सम्मेलन बदनाम हो गया और जिनके कारण हम दुनिया भर में मज़ाक का पात्र बन गए।
सबसे पहले, सम्मेलन में कुप्रबंधन की ऐसी मिसालें कायम की गई, जिसने ने मोदी सरकार की नाकाबिलियत और अक्षमता को जगजाहिर कर दिया। जैसे ही विदेशों से डेलीगेट्स और गणमान्य मेहमान दिल्ली पहुंचे, उन्हें पहले दिन से ही अफरा-तफरी और अव्यवस्था का सामना करना पड़ा। विशेषाधिकार प्राप्त भाजपाईयों के अपने सुरक्षा अमले के साथ आने-जाने की वजह से भारत मंडपम के रास्ते में भारी ट्रैफिक जाम था। जिसके कारण मेहमानों को बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ा। मंडपम पहुंचने के बाद भी विदेशी डेलीगेट्स रजिस्ट्रेशन और एक्रेडिटेशन काउंटर पर लम्बी लम्बी अव्यवस्थित लाइनों में घंटों लगे रहे। वहां विदेशी कम्पनियों के प्रमुख अधिकारी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जानकार लंबे समय तक खुले में खड़े रहे। वहां न बैठने का कोई इंतजाम था और न ही खाने पीने की व्यवस्था। इस कुप्रबंधन की वजह से हर कार्यक्रम देर से शुरू हुआ।
जब हर तरफ से शिकायतें आने लगीं, तो एक केंद्रीय मंत्री को भारत सरकार की तरफ से माफी मांगनी पड़ी। लेकिन सिर्फ माफी मांगना काफी नहीं था। अगले दिन समिट में सरकार के खराब मैनेजमेंट की चर्चा विदेशी प्रेस और मीडिया चैनलों में हर जगह थी।
अब यह तो जगजाहिर है कि पीएम मोदी हर समय अपनी व्यक्तिगत छवि चमकाने को पहली प्राथमिकता देते हैं। उनकी यह खासियत सम्मेलन के दौरान उनके ओछे व्यवहार में उस वक्त दिखी, जब वे समिट के आखिरी दिन विश्व की बड़ी टेक्नोलॉजी कम्पनियों के प्रमुखों के साथ स्टेज पर थे। अचानक से पीएम मोदी ने अपने बाएं और दाएं खड़े दो कम्पनी प्रमुखों के हाथ पकड़े और बिल्कुल अप्रत्याशित तरीके से झटके के साथ उनके हाथ आसमान की तरफ उठा दिए। प्रधानमंत्री के इस अजीब व्यवहार से सब हैरान रह गए। उनकी इस हरकत से हॉल में मौजूद लोग, जिसमें ग्लोबल टेक दिग्गज और वरिष्ठ व्यवसायी शामिल थे, सब सकते में आ गए। इस घटना से मोदी की एक ऐसे नेता की छवि, जो ज़मीनी काम से ज़्यादा ड्रामा में दिलचस्पी रखता है, और पुख्ता हो गई। उनके इस तरह के बर्ताव ने ऐसे निवेशकों को जो भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में निवेश करना चाहते थे, निराश ही किया होगा।
फिर गलगोटियास यूनिवर्सिटी के फ्रॉड ने तो रही सही कसर पूरी कर दी। इस यूनिवर्सिटी को सरकार ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में एक स्टार “नॉलेज पार्टनर” के तौर पर पेश किया था। अपने स्टॉल पर, उन्होंने चीन से खरीदा हुआ एक रोबोटिक कुत्ता “ओरियन” दिखाया और धोखाधड़ी करते हुए उस पर ‘मेड इन इंडिया’ का लेबल लगा दिया। भारतीय मीडिया चैनलों ने भी यूनिवर्सिटी के इस झूठे दावे को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में भारत की कामयाबियों के सबूत के तौर पर खूब बढ़ा चढ़ा कर बताया। लेकिन एक्सपर्ट्स और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट्स ने जल्दी ही यह चोरी पकड़ ली। वास्तव में ओरियन एक सस्ता चीनी रोबोटिक खिलौना था, जो भारत में नहीं बनाया गया था, बल्कि यूनिवर्सिटी ने इसे किसी चीनी कम्पनी से खरीद कर इसे अपनी खोज बता दिया। यह हद दर्जे की धोखेबाजी थी, जिसे दुनिया ने पकड़ लिया।
सम्मेलन के आयोजकों यानि भारत सरकार की मिलीभगत से गलगोटियास यूनिवर्सिटी के इस सरासर धोखे का ग्लोबल मीडिया में खूब मज़ाक उड़ाया गया। बीबीसी, अल जज़ीरा, एपी, ब्लूमबर्ग, ऐनबीसी, साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने बड़ी-बड़ी हेडलाइन चलाईं, जैसे कि “मोदी के एआई समिट में फ्रॉड “, भारतीय यूनिवर्सिटी चीनी रोबोट को अपना बताते हुए पकड़ी गई,”।” वगैरह, वगैरह।
मोदी सरकार की गलतियों की कहानी यहीं खत्म नहीं होती है। भारतीय युवा कांग्रेस के शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट करने वाले कार्यकर्त्ताओं पर दिल्ली पुलिस के बेरहमी से हिंसक बल का इस्तेमाल पूरी दुनिया ने देखा।
भारतीय युवा कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ता समिट के आखिरी दिन पीएम मोदी द्वारा ट्रंप के समक्ष पूरी तरह सरेंडर करने के प्रति विरोध जताने के लिए पहुंचे। यह कार्यकर्ता यह बताना चाहते थे कि भारत के प्रधानमंत्री कॉम्प्रोमाइज़ हो चुके हैं। इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नीचे काम करने वाली दिल्ली पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट करने वालों पर बेरहमी से हिंसक बल का इस्तेमाल किया। उनके विरुद्ध आपराधिक कानूनों की कुछ सख्त धाराओं के तहत मुकद्दमें दर्ज किए गए। यहां तक कि भारतीय युवा कांग्रेस के प्रमुख उदय भानु चिब, जो प्रोटेस्ट की जगह पर मौजूद नहीं थे, को भी गिरफ्तार कर लिया गया। कोर्ट को कुछ समय में ही समझ आ गया कि पुलिस की कार्रवाई सही नहीं थी, फिर तो उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया।
इस एक घटना से दुनिया भर के देशों में यह संदेश पहुंचा कि आज के भारत में असहमति के लिए कोई जगह नहीं है और अगर कोई सरकार के किसी भी जन-विरोधी और भारत-विरोधी काम के खिलाफ शांति से प्रोटेस्ट करने के अपने संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करने की हिम्मत करता है, तो उसे बुरी तरह कुचल दिया जाएगा।
भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का राजनीतिक विंग है। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि संघ के संस्थापक सदस्य मुसोलिनी के फासीवाद के विचार और हिटलर के नस्लीय शुद्धता के सिद्धांत से बड़े प्रभावित थे। 1947 से पहले, RSS ने भारत के महान स्वतंत्रता संग्राम का विरोध करने के लिए मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन किया था। आजादी के ठीक बाद, इसने संविधान और उसमें निहित बराबरी के अधिकार, सबको साथ लेकर चलने और समाजवाद की अवधारणा का ज़ोरदार विरोध किया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मुख्य विचारधारा में 1925, जब इसकी स्थापना हुई थी, से आज कोई बदलाव नहीं आया है। इससे यह साफ़ है कि संघ के बुनियादी सिद्धांतों का भारतीय संविधान के कई प्रावधानों के साथ जबरदस्त टकराव हैं। पिछले 12 सालों में, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत के शासन पर अपनी पकड़ मज़बूत की है, तो उनका छिपा हुआ एजेंडा भी धीरे-धीरे सामने आ रहा है। पीएम मोदी संविधान में दिए गए मूल्यों को सुनियोजित ढंग से कमज़ोर और खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं। इससे देश के संविधान और इसके सामाजिक ताने बाने को बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है।
आज देश के लोग उलझन की स्तिथि में हैं क्योंकि भाजपा सरकार भी अपने मे प्रेरणास्रोत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरह ही साम्प्रदायिक और विभाजनकारी सोच में डूबी हुई है। इसी कारण से मोदी सरकार भी भारतीय संविधान के उन सभी मानवतावादी नियमों के साथ भी टकराव में खड़ी नज़र आती है, जो आधुनिक भारत के मूल्यों एवं ‘विविधता में एकता’ और ‘सर्व धर्म सद्भाव’ के सिद्धांत पर आधारित हैं। संवैधानिक मूल्यों और अपनी कोर विचारधारा के बीच इसी टकराव की वजह से भाजपा सरकार पिछले 11 सालों से ज़्यादा समय में देश के आमजन के लिए एक भी समानतावादी नीति नहीं बना पाई है। ठीक इसी टकराव की वजह से ही भाजपा सरकार ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट’ जैसा शॉर्ट-टर्म प्रोग्राम भी ढंग से आयोजित नहीं कर पाई, और वह एक के बाद एक गलती करती चली गई।
हमें कोई शक नहीं है कि एक तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा की विचारधारा और दूसरी तरफ संविधान में दिए गए मानवतावादी मूल्यों के बीच इसी टकराव के जारी रहने से आज देश में कन्फ्यूज़न, अफ़रा-तफ़री और उथल-पुथल मची हुई है।
इससे हम भारतीयों के पास बस एक ही विकल्प बचता है, कि अब चुनावों के माध्यम से इन संविधान-विरोधी ताकतों को सत्ता से उखाड़ फैंका जाए वरना देश कभी भी प्रगति और विकास की राह पर नहीं चल पाएगा।
राजीव शर्मा
जनरल सेक्रेटरी और मुख्य प्रवक्ता, चण्डीगढ कांग्रेस


