फल चक्र, खाद्य प्रणालियों और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्रों के जरिए जलवायु परिवर्तन की पड़ताल….
विज्ञान और कला के जरिए जलवायु परिवर्तन पर सामूहिक प्रयासों (collective climate action) को बढ़ावा देने के उद्देश्य के साथ सस्टेना इंडिया कला प्रदर्शनी अपने तीसरे संस्करण के साथ लौट आई है। 15 फरवरी 2026 तक बीकानेर हाउस, नई दिल्ली में चलने वाली यह प्रदर्शनी क्लाइमेट थिंक टैंक काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) और प्रसिद्ध कलाकारों ठुकराल व टागरा का साझा प्रयास है। इस बार की प्रदर्शनी का शीर्षक “बिटर नेक्टर” है, जिसमें फल के विभिन्न चक्रों, खाद्य प्रणालियों और मौसम आधारित प्रचुरता की निगाह के साथ जलवायु परिवर्तन की पड़ताल की गई है।
इस वर्ष सस्टेना इंडिया का मुख्य विषय “बिटर नेक्टर” (Bitter Nectar) है, जो भोजन, स्वाद, श्रम और मौसमी प्रचुरता जैसी रोजमर्रा की चीजों को देखने के हमारे तरीके में बदलाव लाता है। इसमें तीन सस्टेना इंडिया फेलो को शामिल किया गया है, जिनके कार्य विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों और खाद्य सामग्रियों पर आधारित हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर निवासी *वेदांत पाटिल* एक फिल्म निर्माता और पीएचडी के छात्र हैं। वे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में दूध के नाजुक सफर पर निगाह रखते हैं। उनका काम दूध के पीछे के अदृश्य श्रम, बुनियादी ढांचे और पारिस्थितिकीय दबावों को सामने लाता है, जो दैनिक खपत के लिए इसकी आपूर्ति बनाए रखता है।
लद्दाख की रहने वाली *अनुजा दासगुप्ता* एक कलाकार और कृषि उद्यमी हैं। वे अधिक ऊंचाई पर रहने वाले समुदायों की एक-दूसरे पर निर्भरता, उनके मौसमी ज्ञान और जलवायु के प्रति सुभेद्यताओं की पड़ताल करती हैं। वे इसके लिए खुबानी (apricot) का इस्तेमाल करती हैं, जो इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
गुजरात के रहने वाले *मृगेन राठौड़* एक दृश्य कलाकार (visual artist) और शिक्षक हैं। वे गिर क्षेत्र के साथ बेहद गहराई से जुड़ी एक मूर्तिकला के जरिए आम के मोनोकल्चर, वन-पारिस्थितिकी तंत्रों और मानवों व पशुओं के विस्थापन की पड़ताल करते हैं।
जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान और अनियमित बारिश से पूरे देश में खाद्य तंत्र में चुपचाप लेकिन प्रभावकारी बदलाव आ रहे हैं। सीईईडब्ल्यू का हालिया शोध बताता है कि पिछले दशक में दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान बारिश में कमी का सामना करने वाली तहसीलों की संख्या सिंधु-गंगा मैदान, पूर्वोत्तर भारत और ऊपरी हिमालय के नाजुक क्षेत्र में केंद्रित है, जो कृषि के लिए अत्यंत प्रमुख क्षेत्रों में आता है। गर्मी बढ़ने से श्रमिकों, विशेष रूप से बाहर काम करने वाले और असंगठित क्षेत्र के श्रमिक, की काम करने की क्षमता (उत्पादकता) घट रही है। इससे परिवारों के सामने आय और आर्थिक मजबूती घटने की चुनौती आ रही है। 2025 में वैश्विक तापमान वृद्धि अस्थायी रूप से 1.5 डिग्री सेल्सियस की वह सीमा पार कर चुकी है, जिसे दूर भविष्य का एक निर्णायक मोड़ माना गया था। यह अब रोजमर्रा के विकल्पों और फैसलों पर असर डाल रहा है।
इस पृष्ठभूमि के साथ सस्टेना इंडिया प्रदर्शनी का तीसरा संस्करण फसलों व फलों के पकने, पोषण और मिठास को समझने की एक साधारण-सी लालसा दर्शाती है, और इसे आकार देने वाली जटिल सामाजिक-पारिस्थितिकी और राजनीतिक स्थितियों को सामने लाती है। गर्मी और विभिन्न फसलों के बीच अब पहले जैसा तालमेल नहीं रह गया है; अनियमित बारिश से फसलों या फलों के पकने में बाधा आती है, सर्दियां हल्की या समय से पहले आ जाती हैं, और लंबे समय से चला आ रहा कृषि का पारंपरिक ज्ञान अब डगमगाया हुआ है। इन अस्थायी अनियमितताओं के जरिए प्रदर्शनी यह पता लगाती है कि किस तरह से जलवायु प्रणालियों की समस्याएं अपना विस्तार करती हैं, जो श्रम, पारिस्थितिकी तंत्र, खपत और सामुदायिक जीवन को प्रभावित करता है।
ठुकराल और टागरा, क्यूरेटर, सस्टेना इंडिया ने कहा, “सस्टेना इंडिया प्रदर्शनी अपने तीसरे संस्करण में जलवायु परिवर्तन से जुड़े कुछ जरूरी सवालों की परत-दर-परत पड़ताल करती है। यह कला के माध्यम से फसलों और फलों के फलने-फूलने के चक्र से जुड़े बदलते ज्ञान को दिखाती है, जो अत्यधिक गर्मी, अनियमित बारिश और अनिश्चितता से प्रभावित हो रहा है। लद्दाख से लेकर केरल तक और असम से लेकर गुजरात तक, देश भर से हो रहे विभिन्न कार्यों को एक जगह पर लाकर यह प्रदर्शनी जलवायु कार्रवाई के एक साझा पारिस्थितिकी तंत्र को सामने रखती है। यह पराग संग्रह की बारीकियों में मिठास खोजने की हमारी लालसा की भी पड़ताल करती है।”
सस्टेना इंडिया के तीसरा संस्करण के दौरान विभिन्न तरह के चर्चा सत्रों, कार्यशालाओं, प्रदर्शनों और संवादात्मक गतिविधियों को शामिल किया गया है। सप्ताहांत (weekends ) में 15 से अधिक साझेदारों के साथ मिलकर बातचीत, वर्कशॉप, थिएटर और सीखने वाले अनुभवों के जीवंत कार्यक्रम शामिल किए गए हैं। इसमें श्रयाना भट्टाचार्य (लेखक और अर्थशास्त्री), अनिरुद्ध कनिसेट्टी (लेखक और इतिहासकार), प्रज्ञा कपूर (अभिनेत्री और फिल्म निर्माता), थॉमस जकारियास (शेफ), शुभ्रा चटर्जी (लेखक और निर्देशक), अनुपमा मंडलोई (इम्पैक्ट प्रोड्यूसर), और केविन केनेथ ली (मीडिया लीडर) जैसे कई वक्ता शामिल होंगे। इसमें ज़ीन-मेकिंग, अपसाइक्लिंग, मटेरियल लिटरेसी, डेटा स्टोरीटेलिंग और जलवायु केंद्रित लेखन जैसे कार्यों को भी सीखने का अवसर होगा।
मिहिर शाह, डायरेक्टर ऑफ स्ट्रैटेजिक कम्युनिकेशंस, सीईईडब्ल्यू ने कहा, “भू-राजनीतिक उथल-पुथल और नए सिरे से बन रही वैश्विक व्यवस्था के बीच, जलवायु परिवर्तन का जोखिम बरकरार है। 2025 रिकॉर्ड में तीसरा सर्वाधिक गर्म वर्ष के रूप में दर्ज किया गया। भारत आज जो भी उगाता है, जिसका सेवन करता है, और जिस पर निर्भर करता है, वे सभी जलवायु परिवर्तन से पहले से प्रभावित हैं। सस्टेना इंडिया का तीसरा संस्करण जलवायु से जुड़ी चर्चाओं को वास्तविक जीवन के अनुभवों के साथ जोड़ती है। यह दिखाता है कि कैसे खाद्य प्रणालियां और मौसम के साथ उसके तालमेल में आने वाली बाधाएं सीधे तौर पर समुदायों और आजीविकाओं को प्रभावित करती हैं। प्रभावी जलवायु कार्रवाइयों को इन वास्तविकताओं और इनमें छिपे ज्ञान को निश्चित तौर पर शामिल करना चाहिए, क्योंकि हमें और अधिक जलवायु समाधानों की तलाश है।”
सस्टेना इंडिया ने तीन फेलो के साथ जलवायु परिवर्तन के विभिन्न दृष्टिकोणों को दिखाने वाले दूसरे कलाकारों को भी शामिल किया है:
अभिनंद किशोर बहु-स्तरीय दृश्य संग्रह (layered visual archives) के जरिए कोच्चि में शहरीकरण और जलवायु से जुड़ी समस्याओं की पड़ताल करते हैं। इसमें शहर की नाजुक सीमाओं पर जल, भूमि, श्रम और बुनियादी ढांचे को दिखाने वाले दृश्य (विजुअल) शामिल हैं।
लक्षिता मुंजाल मूर्तिकला जैसे आसनों (sculptural seating objects) के माध्यम से सामग्रियों से जुड़ी स्मृति और गर्मी से अनुकूलन की पड़ताल करती हैं, जो शीतलन (कूलिंग) और देखभाल के रोजमर्रा के कामकाज में शामिल हैं।
सिद्धांत कुमार एक प्रदर्शनात्मक फिल्म (performative film) के जरिए शहर में श्रम, प्रदूषण और दृश्यता की पड़ताल करते हैं, जो निर्माण कार्यों पर पाबंदी, वायु गुणवत्ता और अनिश्चितता को दर्शाती है।
स्मिता मिंडा एनीमेशन के जरिए एक गहरा व्यक्तिगत नजरिया लाती हैं, जो जलवायु चिंता की भावनात्मक गंभीरता को दर्शाता है, क्योंकि यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी के बेहद निजी पलों तक पहुंच जाता है।
हरमीत सिंह रतन अपने पिता, एक साइन पेंटर, के साथ मिलकर देसी कीकर के पेड़ के साथ सामग्री आधारित संवाद के जरिए स्मृति, स्वाद और संरक्षण की पड़ताल करते हैं।
पूजा कलाइ कपड़ा उद्योग के कचरे (textile waste) और बुनाई की स्वदेशी पद्धतियों के साथ काम करती हैं। वे बेकार हो चुके धागों को नए सिरे से बुनकर सामग्री की अधिकता वाली प्रणालियों में देखभाल, निरंतरता और पारिस्थितिकीय संभावनाएं तलाशती हैं।
अंकुर यादव बंद हो चुके खनन स्थलों पर जलवायु से जुड़ी कविताएं लिखते हैं, जिससे पर्यावरणीय क्षति को समय और अपक्षरण के माध्यम से एक सतत प्रक्रिया के रूप में दिखाने में मदद मिलती है।
विस्तृत और युवा दर्शकों तक पहुंचने के लिए, सस्टेना इंडिया साझेदारियों की तलाश करती रहेगी, जिसमें छात्रों और शुरुआती करियर वाले लोगों के लिए विशेष कार्यक्रम शामिल रहेंगे।
Exhibition Details:
Sustaina India
Dates: 1-15 February 2026
Venue: Bikaner House, New Delhi
Preview Timings: 31 January, 5 PM onwards
Exhibition continues 1-15 February, 11 AM – 7 PM
सस्टेना इंडिया के बारे में
जलवायु परिवर्तन के चिंताजनक प्रभावों के बारे में वैज्ञानिक प्रमाण लगातार सामने आ रहे हैं। ऐसे में, हमें बेहतर भविष्य के लिए नए सिरे से कल्पना करने की जरूरत है। इसी को ध्यान में रखकर वार्षिक फेलोशिप, प्रदर्शनियों और सार्वजनिक कार्यक्रमों के माध्यम से कला, विज्ञान और नीति-निर्माण के बीच वैचारिक आदान-प्रदान बढ़ाने के लिए सस्टेना इंडिया की शुरुआत की गई है। यह ठुकराल व टागरा और काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) का अपनी तरह का पहला प्रयास है। सस्टेना इंडिया जलवायु से जुड़ी जागरूकता और सततशीलता की चर्चाओं को भारत के सांस्कृतिक ताने-बाने और अन्य क्षेत्रों में शामिल करने के लिए विभिन्न रचनाकारों को एकजुट करता है।


