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पीएम ई-ड्राइव के तहत फेम II की तुलना में प्रति वाहन आधी सब्सिडी के साथ 11.3 लाख इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री हुई: सीईईडब्ल्यू….

नई दिल्ली, 16 दिसंबर 2025: भारत की इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) नीति एक नए चरण में प्रवेश कर चुकी है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के ग्रीन फाइनेंस सेंटर (जीएफसी) के आज जारी नए स्वतंत्र अध्ययन के अनुसार, पीएम ई-ड्राइव योजना ने अपने पहले वर्ष में फेम II की तुलना में प्रति वाहन आधी सब्सिडी के साथ 11.3 लाख इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री में सहायता दी। यह बाजार को सक्रिय करने से आगे बढ़कर व्यवस्था के स्तर पर एकीकरण (consolidation) की दिशा में एक निर्णायक बदलाव आने का संकेत है। प्रति यूनिट मांग प्रोत्साहन आधा होने के बावजूद, पीएम ई-ड्राइव ने फेम II की तुलना में सालाना 3.4 गुना अधिक ईवी बिक्री को सक्षम बनाया है। कम सब्सिडी के साथ यह तेज वृद्धि बताती है कि भारत का ईवी क्षेत्र परिपक्व हो रहा है, और लचीला होने के साथ अर्थव्यवस्था में दीर्घकालिक रूप से समाहित होने (long-term integration) के लिए तैयार है।

भारत का ऑटोमोटिव क्षेत्र, जिसका जीडीपी में 7.1 प्रतिशत का योगदान है और 3 करोड़ से अधिक नौकरियां देता है, तेजी से बदल रहा है। वित्त वर्ष 2019-20 की तुलना में इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री पंद्रह गुना बढ़ी है। यह वित्त वर्ष 2014-15 में 2,000 यूनिट ईवी थी, जो वित्त वर्ष 2024-25 में बढ़कर लगभग 19.6 लाख यूनिट हो गई, जिससे कुल वाहनों में ईवी का हिस्सा 7.49 प्रतिशत हो गया है। सीईईडब्ल्यू-जीएफसी के अध्ययन *’नेविगेटिंग इंडिया’ज इलेक्ट्रिक मोबिलिटी ट्रांजिशन: मार्केट डायनामिक्स टू पॉलिसी शिफ्ट्स’* (Report https://www.ceew.in/gfc/publications/navigating-indias-electric-mobility-transition) में राष्ट्रीय स्तर पर इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने के रुझानों का आकलन किया गया है और फेम II (वित्त वर्ष 2019-20-वित्त वर्ष 2023-24) के प्रदर्शनों की पीएम ई-ड्राइव (वित्त वर्ष 2024-25-वित्त वर्ष 2027-28) के परिणामों से तुलना की गई है। भारत में ईवी बाजार को स्थापित करने में फेम II की महत्वपूर्ण भूमिका थी, जबकि पीएम ई-ड्राइव कुशलता व निरंतरता के साथ इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने के लिए उसी आधार को आगे बढ़ाती है।

सीईईडब्ल्यू-जीएफसी का विश्लेषण बताता है कि भारत का ईवी बाजार संरचनात्मक रूप से विकसित हुआ है। शुरुआत में इलेक्ट्रिक वाहनों में (वित्त वर्ष 2019-20 – वित्त वर्ष 2020-21) ई-रिक्शा की संख्या अधिक थी, लेकिन स्थिति बदल चुकी है: इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों में वित्त वर्ष 2021-22 के बाद काफी उछाल आया है और वित्त वर्ष 2024-25 तक 11.5 लाख से अधिक यूनिट की बिकी के साथ यह सबसे बड़ा ईवी सेगमेंट बन गया है। यह ईवी के अनौपचारिक और व्यावसायिक उपयोग से आगे बढ़कर बड़े पैमाने पर घरेलू और उद्यमों में उपयोग की दिशा में बदलाव का संकेत है। ईवी मिश्रण भी बढ़ रहा है, कमर्शियल चार पहिया इलेक्ट्रिक वाहनों में वित्त वर्ष 2024-25 तक स्पष्ट वृद्धि देखी गई है, जो शहरी लॉजिस्टिक्स और शेयर मोबिलिटी में इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती संख्या का संकेत है। इसके अलावा, इलेक्ट्रिक बसें, अभी छोटा हिस्सा होने के बावजूद, एक स्थिर वृद्धि दिखाती है, जो संस्थागत रूप से अपनाए जाने की शुरुआती स्थिति का संकेत है।

कार्तिक गणेशन, फेलो और डायरेक्टर – स्ट्रैटजिक पार्टनरशिप्स, सीईईडब्ल्यू ने कहा, “फेम II से पीएम ई-ड्राइव की तरफ बढ़ना भारत की ईवी (EV) नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव है। प्रति-यूनिट कम प्रोत्साहन के साथ 11.3 लाख इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री होने से पता चलता है कि बाजार के कुछ हिस्से अपने दम पर खड़े होने लगे हैं। साथ में, वाहन श्रेणियों और राज्यों में दिखी भिन्नता बताती है कि क्यों देश भर में ईवी को एक समान रूप से अपनाए जाने की उम्मीद करने की जगह पर अगले चरण में नीतिगत सामंजस्य, बुनियादी ढांचे की तैयारी और लक्षित हस्तक्षेपों पर ध्यान देना जरूरी है।”

पीएम ई-ड्राइव चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए आवंटन को दोगुना करके 20 अरब रुपये देता है, और ई-ट्रकों व ई-एम्बुलेंस को भी शामिल करता है, आधार-सक्षम ई-वाउचर के माध्यम से स्थानीकरण को मजबूत बनाता है। इसके अलावा, इलेक्ट्रिक बसों और ट्रकों के लिए स्क्रैपेज-लिंक्ड प्रोत्साहन भी पेश करता है।

राज्यों और वाहनों श्रेणियों के स्तर पर ईवी अपनाने में असमानता

राष्ट्रीय स्तर पर अच्छे प्रदर्शन के बावजूद, इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने की स्थितियों में भिन्नता है। दिल्ली, गोवा और कर्नाटक जैसे उच्च आय वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों, इलेक्ट्रिक चार पहिया वाहनों और ई-बसों को अपनाने में भिन्नता दिखाई देती है, जहां इलेक्ट्रिक दोपहिया का इस्तेमाल कम आय वाले राज्यों की तुलना में लगभग पांच गुना ज्यादा है। बिहार और त्रिपुरा जैसे कम आय वाले राज्य अभी भी इलेक्ट्रिक तिपहिया वाहनों पर बहुत अधिक निर्भर करते हैं, जिनकी इन क्षेत्रों में 52 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी है।

सीईईडब्ल्यू-जीएफसी के अध्ययन के अनुसार, पीएम ई-ड्राइव के परिणामों में ईवी वाहन श्रेणियों में भी भिन्नता है। व्यावसायिक इलेक्ट्रिक तिपहिया वाहनों (L5 श्रेणी – जिनमें ई-रिक्शा और ई-कार्ट शामिल नहीं) ने 153 प्रतिशत उछाल के साथ वित्त वर्ष 2024-25 का लक्ष्य पार कर लिया, इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों ने 95 प्रतिशत लक्ष्य हासिल किया, जबकि इलेक्ट्रिक रिक्शा व ई-कार्ट केवल 5 प्रतिशत लक्ष्य ही हासिल कर पाए।

अपूर्व मिनोचा, रिसर्च एनालिस्ट, सीईईडब्ल्यू ने कहा, “मजबूती से स्थापित मांग के साथ, निरंतरता और व्यापकता के साथ अपनाए जाने के लिए भारत का ईवी परिवर्तन अब नीतिगत संकेतों की स्पष्टता और निरंतरता पर निर्भर करता है। वाहनों का यह इलेक्ट्रिफिकेशन कुछ क्षेत्रों और राज्यों से आगे बढ़कर एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) क्षेत्र, सार्वजनिक परिवहन, ग्रामीण बाजारों और अनौपचारिक परिवहन संचालकों तक पहुंचे, इसके लिए 2030 के ईवी लक्ष्य को औपचारिक बनाना, राज्य-स्तरीय महत्वाकांक्षाओं में अनुरूपता लाना, आंकड़ों की पारदर्शिता बेहतर बनाना, और वास्तविक उपयोग के आधार पर प्रोत्साहन को नए सिरे से तैयार करना महत्वपूर्ण होगा।”

ईवी को अपनाने की लय बनाए रखने और सभी क्षेत्रों में एक समान इस्तेमाल सुनिश्चित करने के लिए, सीईईडब्ल्यू-जीएफसी अध्ययन एक नेशनल पॉलिसी फ्रेमवर्क में स्पष्ट, श्रेणी-वार उप-लक्ष्यों के साथ 2030 तक 30 प्रतिशत ईवी को अपनाने के लक्ष्य को औपचारिक रूप से शामिल करने का सुझाव देता है। इसे भारी उद्योग मंत्रालय और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की तरफ से एक संयुक्त रोडमैप के जरिए समर्थन दिया जाना चाहिए, ताकि दीर्घकालिक बाजार संकेतों को मजबूत किया जा सके। क्षेत्रीय भिन्नताओं को घटाने के लिए, यह अध्ययन स्पष्ट और बेहतर अनुरूपता वाले राज्य-स्तरीय ईवी लक्ष्यों को लाने का सुझाव देता है। इसके अलावा विस्तारित पीएम ई-ड्राइव डैशबोर्ड और एक एकीकृत राष्ट्रीय डेटासेट के जरिए ईवी और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के आंकड़ों में अधिक पारदर्शिता लाने का भी सुझाव देता है, ताकि निगरानी करने और जरूरत होने पर बीच में सुधारात्मक कदम उठाए जा सकें। अंत में, यह अध्ययन पीएम ई-ड्राइव बजट को आवश्यकता के आधार पर तालमेल लाने – उच्च मांग वाले क्षेत्रों के लिए संसाधनों को दोबारा देना, जबकि कमजोर रहने क्षेत्रों के लिए प्रोत्साहन संरचना पर नए सिरे से विचार करना – की जरूरत बताता है, ताकि भारत का ईवी ट्रांजिशन न सिर्फ तेज हो, बल्कि निष्पक्ष भी हो, और एमएसएमई, सार्वजनिक परिवहन, ग्रामीण बाजारों और अनौपचारिक परिवहन संचालकों तक पहुंच सके।