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ग्रेटर चंडीगढ़ चैप्टर आफ इंडियन फर्टिलिटी सोसाइटी ने ए.आर.टी और सरोगेसी रेगुलेशन एक्ट 2021 पर चर्चा का किया आयोजन…

भारत में 10-14 फीसदी जोड़े बांझपन से पीड़ित हैं। आज आईवीएफ इंडस्ट्रियल दर्जे में तक पहुंच गया है भारत का असिस्टेड रिप्रोडक्शन टेक्नोलॉजी (ए.आर.टी) बाजार तीसरे स्थान पर है जो 28% की दर से सालाना बढ़ रहा है। इस क्षेत्र में तीसरे पक्ष के शामिल होने से इसके दुरुपयोग और शोषण की काफी संभावनाएं पैदा होती हैं और और इस क्षेत्र में कई नैतिक और कानूनी मुद्दे सामने आते हैं। एआरटी और सरोगेसी रेगुलेशन एक्ट 2021 का मुख्य उद्देश्य ए.आर.टी क्लीनिक विनियमन और उनका सुपरविजन करने के साथ एआरटी को एक कानूनी ढांचा प्रदान करना और इसके दुरुपयोग को रोकना है।

इंडियन फर्टिलिटी सोसाइटी के ग्रेटर चंडीगढ़ चैप्टर ने एक दिवसीय 17 वें एआरटी अपडेट का चंडीगढ़ में आयोजन किया जिसमें क्षेत्र के प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया और असिस्टेड रिप्रोडक्शन टेक्नोलॉजी और सरोगेसी रेगुलेशन एक्ट 2021 के विभिन्न पहलुओं . पर चर्चा की और जन जागरूकता के लिए इस महत्वपूर्ण विषय पर पैनल डिस्कशन भी आयोजित की गई जिसमें डॉ उमेश जिंदल, डॉ गुलप्रीत बेदी, विनीत नागपाल, डॉ के.डी नायर, डॉ कुलदीप जैन, डॉ एल.के धालीवाल, डॉ यशबाला , श्री गौरव अग्रवाल (एडवोकेट) आदि शामिल थे।

इंडियन फर्टिलिटी सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ के.डी नायर ने अधिनियम में मुख्य क्षेत्रों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कानून का उद्देश्य आईवीएफ केंद्रों को एक कानूनी ढांचा प्रदान करना है जिसके तहत वे असिस्टेड रिप्रोडक्शन तकनीकों का अभ्यास और सेवाएं प्रदान कर सकते हैं जिनमें डोनर एग्स और सरोगेसी आदि भी शामिल हैं।

कानून मूल रूप से डोनर और सरोगेट को सुरक्षा प्रदान करता है और सुनिश्चित करता है कि इन प्रक्रियाओं से उत्पन्न होने वाली किसी भी जटिलता के लिए वे कमीशनिंग दंपत्ति (बांझ दंपति जो इस प्रक्रिया को करवा रहें हैं ) से मुआवजे के लिए हकदार हैं । सरोगेट और डोनर्स के पक्ष में वे आईआरडीए द्वारा मान्यता प्राप्त बीमा पॉलिसियों को खरीद कर इसे सुनिश्चित कर सकते हैं।

उन्होंने आगे कहा कि दूसरा मुख्य उद्देश्य युग्मकों (शुक्राणु और अंडे) के दुरुपयोग को रोकना है, यह कानून वैज्ञानिक और नैतिक कार्यों के लिए काम करने के लिए एक सुरक्षित वातावरण प्रदान करता है लेकिन नियमों का पालन नहीं करने वालों के लिए सख्त दंड का भी अधिनियम में प्रावधान है।

ग्रेटर चंडीगढ़ चैप्टर ऑफ इंडियन फर्टिलिटी सोसाइटी के आर्गेनाइजेशन चेयरपर्सन व जिंदल आईवीएफ चंडीगढ़ निदेशक, डॉ उमेश जिंदल ने एसीटी अधिनियम के क्रियान्वयन में हो रही देरी के कारण मुख्य चिंताओं को उठाया उन्होंने कहा कि आई.आर.डी.ए. , व राज्यों आदि को केंद्रों को पंजीकृत करने और बीमा पॉलिसियों को प्रदान करने के लिए 6 महीने का समय दिया गया था लेकिन आईवीएफ केंद्रों में काम स्थिर होकर रह गया है। कई मुद्दों में स्पष्टता का अभाव है। तीन अगस्त को भारत सरकार की आधिकारिक राजपत्र अधिसूचना ने 17 राज्यों को कार्यान्वयन के लिए 3 महीने का और अतिरिक्त समय दिया लेकिन दूसरे राज्यों के लिए कोई भी स्पष्टीकरण नहीं दिया गया ? चंडीगढ़ शहर में अब तक कोई भी बोर्ड या उपयुक्त प्राधिकारी को अधिसूचित नहीं किया गया है। हम अब नए कानून से बंधे हैं और आज की स्थिति में न ही हम नए कानूनों के अनुसार काम कर सकते हैं और न ही पुरानी व्यवस्था के अनुसार।

डॉ गुलप्रीत बेदी निदेशक बेदी नर्सिंग होम ने मरीजों के दृष्टिकोण को नजर में रखते हुए कई मुद्दों पर प्रकाश डाला इनमें “पूरी व्यवस्था ठीक होने तक इलाज में हो रही देरी, वीर्य और अंडा डोनर के चयन पर कई प्रतिबंधों के कारण, डोनर के लिए बीमा कवर और इससे सम्बंधित हलफनामे और कानूनी सलाह व इन से बढ़ने वाले इलाज के खर्चे पर होने वाली बढ़ोतरी आदि पर विचार रखे । चर्चा के अन्य पहलुओं में एकल पुरुषों , एलजीबीटी में सरोगेसी के लिए प्रावधान, 3 साल के लिए सरोगेट के लिए बीमा कवर व परोपकारी सरोगेसी की अनुमति आदि शामिल थे ।

डॉ यशबाला ने प्रेस से इस कानून के प्रावधानों के बारे में जागरूकता पैदा करने का आग्रह किया और एआरटी प्रक्रियाओं की बढ़ती लागत से संबंधित चिंता को दूर करने को भी कहा।

जिंदल आईवीएफ की डॉ शीतल जिंदल ने भ्रूण और युग्मक के दुरुपयोग पर विचार रखे, ए.आर.टी और सरोगेसी रेगुलेशन एक्ट 2021 समर्थन करते उन्होंने कहा की डोनर्स और सरोगेट्स का शोषण करने वाले बेईमान तत्वों की भूमिका को रोका जाना चाहिए और सरकार ने इस कानून को अधिनियमित करते हुए एक अच्छा काम किया है।

सम्मेलन के आयोजन सचिव डॉ अनुपम गुप्ता ने वृद्ध माताओं और अजन्मे बच्चे की भलाई पर ध्यान आकर्षित करते हुए वृद्ध जोड़ों (पत्नी की आयु 50 से अधिक और पति की आयु 55 वर्ष से अधिक ) को इन सेवाओं के लाभ से बाहर करने का समर्थन किया । लेकिन साथ ही उन्होंने विषम उम्र वाले जोड़ों की दुर्दशा पर भी प्रकाश डाला जहां एक छोटी उम्र की महिला की शादी 55 साल से अधिक उम्र के पुरुष से करने के कारण इन सेवाओं का लाभ उठाने से वंचित कर दिया जाता है।

इंडियन फर्टिलिटी सोसाइटी के पूर्व अध्यक्ष डॉ कुलदीप जैन ने डॉक्टरों को आश्वस्त किया कि चिकित्सा नैतिकता के अनुसार काम करने वाले लोगों के लिए डरने की कोई बात नहीं है। कानून अभी भी विकसित हो रहा है और कानून को पूरी तरह से लागू होने में कुछ समय लगेगा।

डॉ एल के धालीवाल ने स्त्री रोग विशेषज्ञों और भ्रूण वैज्ञानिकों के प्रशिक्षण और अनुभव की आवश्यकताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आईवीएफ अब एक सुपर स्पेशियलिटी विषय है और इसमें कम से कम तीन साल के अनुभव/प्रशिक्षण की आवश्यकता है।

एडवोकेट गौरव गुप्ता ने हलफनामे प्राप्त करने की प्रक्रिया के बारे में बताया और यह भी बताया कि ये न केवल सरोगेट्स, डोनर्स बल्कि कमीशनिंग कपल और आईवीएफ सेंटर के हितों की रक्षा के लिए हैं , जिसमें किसी भी अप्रत्याशित जटिलताओं के लिए बीमा कंपनियों को भुगतान करने के लिए व्यवस्था हैं। लेकिन इसमें एकमात्र दोष अतिरिक्त लागत और कानूनी परेशानी है।

कार्यक्रम में क्षेत्र से 250 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया तथा इसमें राष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञों द्वारा युवा चिकित्सकों के लिए विशेष कार्यशालाएं भी आयोजित की गई ।

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